अंगार

My thoughts may be like 'अंगार'

84 Posts

1246 comments

राजेंद्र भारद्वाज


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

२३ मार्च- शहीद दिवस

Posted On: 23 Mar, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (13 votes, average: 4.38 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

51 Comments

प्यार दो, प्यार लो

Posted On: 13 Feb, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.58 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others मस्ती मालगाड़ी मेट्रो लाइफ में

54 Comments

भारतीयों अरहर छोडो

Posted On: 4 Nov, 2015  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others social issues मस्ती मालगाड़ी में

0 Comment

फेसबुकिया कीड़ा

Posted On: 6 Sep, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता मेट्रो लाइफ में

4 Comments

बांटो खुशियाँ होली में

Posted On: 26 Mar, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 1.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others मस्ती मालगाड़ी में

2 Comments

कहाँ है राजकमल उर्फ कांतिलाल गोडबोले

Posted On: 29 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others मस्ती मालगाड़ी में

4 Comments

Page 1 of 912345»...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा:

अब इसमें कोई क्या कर सकता है कि हमारे देश की कानून और न्याय-प्रणाली ही ऐसी है कि कभी-कभी तो व्यक्ति के मरने के बाद उसके अपरधों की सज़ा घोषित होते पाया गया है । जिन रिश्तों के माध्यम से संजय को कथित रूप से हथियार मिला था, वे सभी मुम्बई बम-कांड में सैकड़ों निरपराध लोगों की हत्या के आरोपी/दोषी हैं । हो सकता है कि संजय उनके असली चेहरों से नावाक़िफ़ रहे हों, परन्तु रिश्तों की सज़ा भी तो भुगतनी ही पड़ती है । लोन बेटा लेता है, और उसकी अनुपस्थिति में वसूली के लिये बैंक और पुलिस बाप को उठा कर ले जाते हैं । ऐसा ही दूसरे अपराधियों के रिश्तेदारों के साथ भी होता है । यहाँ मामला एक राइफ़ल का नहीं बल्कि उसके सप्लायरों के साथ जुड़े रिश्तों का है, जो मामले को संवेदनशील बनाता है । विगत वर्षों में कानून के हाथ प्रभावशाली गर्दनों तक पहुँचने लगे हैं, अन्यथा पहले तो ऐसे मामले कभी उभर भी नहीं पाते थे । विचाराधीन कैदी के रूप में न्यायिक हिरासत में काटे गए दिन सामान्यत: सज़ा में काउंट नहीं होते, तथापि विद्वान न्यायाधीशों का विवेकाधिकार होता है कि वे किसे ऐसी परिस्थितियों के योग्य मानते हैं । हमें कानून को न्यायोचित फ़ैसले लेने के लिये एप्रीशियेट करना चाहिये, शेष अपना-अपना विचार है, और अपनी-अपनी राय, जो हम सभी का अधिकार है । धन्यवाद !

के द्वारा:

गुरुदेव ये तो सबकी अपनी-२ सोच और समझने की बात है| आप जघन्य बलात्कार की तुलना हथियार घर में रखने से कर रहे हैं| मैंने संजय दत्त की गलती का न तो समर्थन किया है और न ही उसकी सजा के खिलाफ हूँ| मेरा कहना तो यही है कि संजय दत्त को उसके किये की सजा पहले ही मिल चुकी है| यदि ज्यादा सजा भी देनी थी तो पहले ही दे दी जानी चाहिए थी| किश्तों में सजा देने का औचित्य समझ से परे है| आप कुछ सजा आज दो, फिर कुछ सालों बाद थोड़ी और दो, फिर और दो...., ये कैसी न्याय व्यवस्था है? ये मत समझिए की पुलिस या क़ानून ने कोई बड़ा तीर मारा है, संजय दत्त सजा इसलिए भुगत रहा है की उसने खुद कन्फैशन किया है, यदि शातिर अपराधी होता तो उसका गुनाह साबित करना ही मुश्किल होता| आरुषि और हेमराज के कातिलों को पहचानते हुए भी क़ानून आज तक सजा नहीं दे पाया क्योंकि सबूत ही नहीं हैं| मैं फिर यही कहूँगा कि संजय दत्त एक पेशेवर अपराधी नहीं है और न ही उसकी पृष्ठभूमि ऐसी है| एक मानवमात्र होने के नाते उससे जाने-अनजाने में बड़ी भूल तो हुई है और उसकी सजा भी उसे मिली है| क़ानून व्यवस्था और सजा संभवतः इसलिए हैं कि अपराधी को सुधारा जाय और शायद संजय दत्त को पहले ही उसके किए की पर्याप्त सजा मिल चुकी है| इतने सालों बाद एक बार फिर से इस सजा का कोई औचित्य नहीं है|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

चुनावी अपील शीर्षक और इसे पढ़ें न पढ़ें, समझें न समझें ये आपका व्यक्तिगत अधिकार है| इतनी क्लिष्ट भाषा में चुनाव प्रचार हमने नहीं पढ़ा/सुना आजतक ..पहले तो मुझे थोडा शक हुआ कि भैया जी को इस बार कांग्रेस का टिकट मिल ही गया! मैंने भी सोचा एक वोगस वोट तो भैया जी के लिए मार ही सकता हूँ. पर मेरे सारे मंसूबे पर पानी फेर दिया आपने यह कहकर कि आप भी आम मतदाता हैं. फिर लगा कि अब पढ़ लेते हैं कुछ दुःख दर्द साझा किये होंगे! फिर तो मजा ही आने लगा और पूरा ही आलेख पढ़ डाला ! मैंने समय जाया नहीं किया गड्ढे में गिरकर बल्कि हिच्खोले खाने में बड़ा मजा आ रहा था ...अंत में शाश्वत सत्य वाला वाक्य चुनाव में अपने ख़ास-ख़ास नेताओं को विजयी बनाएं और अपने-२ काम करवाएं, सारी दुनिया से हमें क्या लेना? आपको अपने घर के बाहर थोड़ी जगह घेरनी हो, अपना हाउस टैक्स कम करवाना हो, अपनी नालियां साफ़ करवानी हों, चोक सीवर खुलवाना हो तो आपका ख़ास आदमी ही काम आएगा| अपनी-अपनी सोचो और बगल वाले को किलसने दो|- प्रणाम करता हूँ भाई जी इसी प्रकार बीच बीच में दर्शन दे दिया करें. हमेशा बेस्ट ब्लॉगर बने के फ़िराक में न रहें!...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

काश कि शहीदों का भी उसी प्रकार पुनर्जन्म हो पाता, जैसा इस ब्लाग का हुआ है । 'शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा' । उम्मीद है कि अगले बरस भी हम आज ही के दिन आज के इसी ब्लाग पर अपने सपूतों को ठीक इसी प्रकार श्रद्धांजलि दे रहे होंगे । धन्यवाद ! (आपने सही समय पर निकाल कर बिल्कुल सही चीज़ सबको दिखाई है । अब आशा रहेगी कि आप महानुभाव का शुभागमन 'जागरण-चलचित्र-गृह' में आज ही लगी फ़िल्म 'शोले' का शो देखने हेतु भी अवश्य होगा, और आप वहाँ उपस्थित मूर्ख समुदाय (जिसमें आप भी हैं) को अपने दो शब्दों से भी नवाज़ेंगे । बस इतना ध्यान रहे कि बसन्ती मेरी है, और मेरी ही रहेगी । इसमें कोई कम्प्रोमाइज नहीं होने का, क्या !)

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

बात तो आपकी सोलह आने प्रैक्टिकल लगती है, परन्तु फ़िर भी यही कहूँगा कि इस मामले में थोड़े परिवर्तन के साथ अपनी पिछली नीति पर ही लौट जाइये, अर्थात 'कमेंट की कोई चिन्ता नहीं' वाली नीति पर, तो सुखी रहेंगे । परिवर्तन का अर्थ यह कि आपकी पिछली वाली नीति में यह खामी थी कि आपका भाव न कमेंट लेंगे, न देंगे वाला था । उसमें आपका भाव समाज से कट कर रहने वाला था, जो एक सांसारिक व्यक्ति के लिये लाभदायक नहीं होता । आपको कमेंट मिले या नहीं, परन्तु कम से कम अपनी जानपहचान वालों की पोस्ट पर जाकर उन्हें आप अपना कमेंट अवश्य दें, तो फ़िर सारा समीकरण देर-सबेर खुद-ब-खुद दुरुस्त हो जाएगा । हाँ, यह सबकुछ तभी चल पाएगा जब आपके पास मंच को देने के लिये पर्याप्त समय हो । आजकल सक्रिय हैं तो मेनटेन कर सकते हैं । हमें नहीं भूलना चाहिये कि हम कोई लेखक-वेखक नहीं हैं, बल्कि ब्लागर सोसाइटी में भी काफ़ी सतह पर रेंगने वाले जीव हैं । आज नेट पर पूरी दुनिया का दुर्लभ साहित्य मुफ़्त में उपलब्ध है । जिसे सचमुच पढ़ने की ललक है, वह कम से कम सोशल नेटवर्किंग साइट्स का पाठक तो नहीं ही है । हम कोई ऐसे नेता भी नहीं हैं, जिसके भाषण को लोग बिना अपनी सुनाए सुनते ही चले जाएँ । कुछ लोग जो सचमुच बहुत ही स्तरीय लिखते हैं, उन्हें जानने वाले उन्हें चुपके से पढ़ कर निकल लेते हैं । कमेंट इसलिये नहीं देते, क्योंकि दूसरा भी उन्हें कभी घास नहीं डालता । ब्लाग लेखन सिर्फ़ विचार अभिव्यक्ति और उसके आदान-प्रदान का माध्यम भर है, और टिप्पणियों का आदान-प्रदान इसका अविभाज्य आभूषण । जहाँ तक हो सके, प्रेम की गंगा बहाते चलो, और कुछ नहीं रखा कहीं भी । यहाँ गुलज़ारी के लिये शिवानियों और गुलशन नन्दाओं की नहीं, बल्कि मिश्रित प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो लेखक, पत्रकार और साहित्यकार से अधिक एक अच्छे इंसान के गुणों से सम्पन्न हों, सामाजिक मेल-मिलाप वाले नेचर से परिपूर्ण । आपकी हास-परिहास वाली टिप्पणी पर इतना गम्भीर भाषण झाड़ दिया, हम भी कभी नहीं सुधरने वाले ।

के द्वारा:

चलिये पकड़ा कान ! दोबारा यह राज़ होठों पर नहीं आएगा । लेकिन यह सीख ज़रूर देना चाहूँगा, कि एक 'लेडी-किलर' वाली सूरत पाकर भी आखिर आप खुदा की इस नेमत से अब तक महरूम क्यों रहे, आपको संज़ीदगी के साथ इसका विश्लेषण करना चाहिये । मैंने बहुतों को आपके क़रीब आते महसूस किया, और फ़िर उसी शिद्दत के साथ छिटक कर दूर होते भी इन्हीं आँखों ने देखा । क्यों ? इसलिये, क्योंकि आप किसी क्षुधा-पीड़ित जैसे भाव में आ जाते हैं, गोया अभी नहीं, तो कभी नहीं । अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है, झुर्रियों के कुछ और लटकने से पहले ट्राई मारने का अभी ढेर सारा वक़्त है । हो सके तो इस 'अमृत-वाणी' के पठन के बाद कमेंट डिलीट कर दें, फ़्री में दूसरे इस टिप का कहीं नाजायज़ फ़ायदा उठा गए, तो फ़िर आपका क्या होगा ?

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

आदरणीय श्री सिंह साहब,  सर्वप्रथम तो आप मुझे परम आदरणीय कहकर संबोधित न किया करें क्योंकि मैं स्वयं को इतना काबिल नहीं समझता हूँ| आप सिर्फ राजेन्द्र जी भी कहेंगे तो भी पर्याप्त है| रही बात अपने राजकमल जी की तो चूंकि मैं स्वयं जेजे पर बहुत कम सक्रिय हूँ तो मुझे पता नहीं कि वो कब से गायब हैं या कोई ऐसी क्या बात हुई है जिससे कि आहत होकर उन्होंने इस मंच को छोड़ दिया है| इसमें कुछ नया नहीं है, ऐसा बहुत लोगों के साथ हो चुका है| मैं नाम तो नहीं लूँगा पर बहुत से अच्छे लेखकों को ये महसूस हुआ है कि उन्हें इस मंच पर यथोचित सम्मान नहीं दिया गया और उन्होंने इस मंच को छोड़ दिया| हो सकता है कि उनके कुछ निजी कारण भी रहे हों| नए लोगों को बढ़ावा देना जेजे की नीति रही है और इसमें उनकी कुछ गलती भी नहीं है क्योंकि उनके लिए अच्छे लेखकों से कहीं ऊपर अपने व्यवसायिक हित पहले हैं| लेकिन हम लोगों को जोड़ने में जेजे का योगदान तो रहा ही है, यह बात भी सत्य है और इस मंच को छोड़ने वाले भी इस पर नजर जरूर रखते होंगे|  शायद राजकमल जी भी इधर की खबर जरूर रखते ही होंगे, ऐसा मेरा अंदाजा है| इसलिए आपके सन्देश उन तक जरूर पहुँच रहे होंगे लेकिन शायद वे किन्हीं निजी मजबूरियों के चलते जवाब न दे पा रहे हों| रही बात उनके मोबाइल नं० 9876543210 की तो ये कोई नंबर है ही नहीं| ये तो 9 से 0 तक की उलटी गिनती है| ये नं० भी उनके शरारती दिमाग की ही उपज है|  मैं उम्मीद करूँगा कि जल्द ही उनके दर्शन होंगें| शुभकामनाओं सहित

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

परम आदरणीय श्री राजेंद्र जी,उर्फ़ जुबली कुमार जी, पहले आपका velentine वाला लेख पढ़ा तो राजकमल महोदय उर्फ़ गुरुदेव की याद ताजा हो आई थी, पर मैंने वहां जान बूझकर जिक्र न किया. पुन: मेरी नजर आपके इस आलेख पर पड़ी ...और मैं अपने आपको रोक न सका ... आपके द्वारा दिया गया नंबर 'स्विच ऑफ' बतला रहा है! एक बार पुन: मेल लिखूंगा. मैं उन्ही का मुरीद हूँ और वे सबको स्नेह भी प्रदान करते थे.... शाही जी जब जे जे से नाराज होकर मंच छोड़कर चले गए थे तो उन्हें वापस लेन का श्रेय गुरुदेव को ही जाता है ... शाही जी तो लौटकर आ गए और कभी कभी दर्शन दे दिया करते हैं. पर वो कहते हैं न- अपनों का चोट ज्यादा गहरा होता है. गुरुदेव सबको बताकर ही इस मंच को छोड़ गए हैं, वे फेसबुक पर भी कहाँ नजर आते है? मुझे भी उनकी याद बहुत सताती है, क्योंकि उन्होंने मुझे बहुत ही सहारा दिया ...उत्साह बढ़ाया और मैं लिखने लगा! अगर आपको उनका कोई सुराग मिले तो अवश्य बताएं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

आदरणीय राजेंद्र जी, हार्दिक अभिनन्दन! के साथ नव वर्ष 2013 की शुभकामनायें तथा सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बनने की बधाई। अब आपके आलेख ज्यादा से ज्यादा लोग पढेंगे भी और सोचेंगे भी क्योंकि सोच ही तो बदलनी है. स्त्री पुरुष दोनों की बराबरी की मांग लगातार है . फिर बदनामी केवल औरतों (महिलाओं) की ही क्यों हो! वह भी संभ्रांत घरों की महिलाओं की ... जो 'बदनाम' हैं वह 'मशहूर' हैं और जो गुमनाम हैं उन्हें ही बदनामी का डर है. हमारी मानसिकता में बदलाव जरूरी है और हर मौकों पर इन दुष्कर्मियों की अवहेलना, प्रतारणा होनी चाहिए ... देखें कब तक परिवर्तन आता है और हमारा समाज इन बुराइयों के प्रति सजग हो पाता है. घटनाएँ अभी भी घाट रही है बल्कि लगता है दिल्ली वाली घटना के बाद इस तरह की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है ..वह भी कही पुलिस कर्मियों द्वारा तो कही सेना के जवानों द्वारा ... कहाँ जा रहा है हमारा समाज ... त्वरित सजा नहीं मिलने का ही यह परिणाम है ... निश्चित ही इसके लिए हमारी न्यायिक प्रक्रिया जिम्मेवार है! आपने शशि थरूर के पहले इस बात को सबके सामने रखकर निश्चित ही एक स्वस्थ अवधारना स्थापित करने की कोशिश की है! आप बार बार बधाई के पात्र हैं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

योगेश जी आपके विचार बहुत सार्थक हैं| सच में बलात्कारियों का नाम और पूरी जानकारी वेबसाइट और अन्य माध्यमों से समाज में प्रचारित करने का प्रावधान होना ही चाहिए ताकि लोग उनसे बचे और उनका बहिष्कार करें| हैरत की बात है कि इस लिव इन रिलेशनशिप और समलिंगी संबंधों के बढ़ते फैशन के बावजूद बलात्कार के मामले अभी भी छुपाये जाते हैं और सरकार और क़ानून भी इसमें सहयोग देता है|  जब युवतियां वर्षों तक लिव इन रिलेशनशिप में रहती हैं और समय-२ पर पार्टनर भी बदलती रहती हैं तब क्यों उनको बदनामी का डर नहीं लगता? जब पूनम पांडे और शर्लिन चोपड़ा जैसी युवतियां पैसे और शोहरत के लिए निर्वस्त्र होने को तैयार है तब क्यों उनको बदनामी का डर नहीं लगता? जब सारी अभिनेत्रियाँ पैसे के लिए स्वेच्छा से अपने कपडे उतारने को तैयार हैं तब क्यों उनको बदनामी का डर नहीं लगता? यानी कि जो व्यभिचार आप अपनी इच्छा से करते हैं उससे आपको पैसा और प्रसिद्धि मिलती है, और जो व्यभिचार आपकी इच्छा के विरुद्ध होता है उसे आप छुपाते है कि इससे आपकी बदनामी होगी| ऐसी मानसिकता क्यों है? ऐसी ही सोच समाज की भी है| स्वैच्छिक व्यभिचार को तो समाज ने स्वीकार कर लिया है पर इच्छा के विरुद्ध व्यभिचार को समाज बदनामी से जोड़ता और छुपाता है| इस सोच और मानसिकता को बदलने की जरूरत है| आपको भी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये..

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

राजेंद्र जी नववर्ष की शुभकामनाये.. आपका लेख पढ़ा .. आपने काफी उम्दा तरीके से अपनी बातें कही.. इस लेख से उन लोगों को विचार बदल सकता है जो ये मानते हैं कि बलात्कार पीडिता का नाम जाहिर नहीं करना चाहिए .. काफी हद तक आपने समझाने कि कोशिश की है कानून बनाने पर जोर देने के साथ अगर लोग मानसिकता बदलने पे जोर लगाये तो इन घटनाओं पे लगाम लगेगी.... बदनामी बलात्कारी की होनी चाहिए ना की पीडिता की.. अमेरिका में एक मेगन नाम का कानून है जिसमें उन बलात्कारियों का नाम और पूरी जानकारी वेबसाइट और अन्य माध्यमों से प्रचारित करने का प्रावधान है.. ताकि लोग उनसे बचे और उनका बहिष्कार हो.. भारत की पुरानी मानसिकता इसके उलट है जब पीडिता का नाम जाहिर होता है तो उसकी बदनामी समझी जाती है.. नाम छिपाने से इस मानसिकता को और बल मिलता है.. महिला को बलात्कार की घटना को एक बुरे हादसे की तरह लेना चाहिए.... ये सब बदलने में वक्त लगेगा ... और महिलाएं ही इस तरह की मानसिकता को बदल सकती जहाँ वो अपनी वर्जनाये और अपनी शक्तियां पहचानेगी ... आजकल कुछ सरकारों एक चलन सा शुरू कर दिया है कि पीडिता को या परिवार को मुआवजे के तौर कुछ रकम देने का.. ये भी अपने आप में समस्या है ...जब कि पीडिता को इन्साफ और सही इलाज़ कि जरूरत है..

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

लात्कार या छेड़-छाड के मामलों में हमारे समाज की यही गलत अवधारणा ही इस दिनोंदिन बढ़ती समस्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है| इस गलत मानसिकता की वजह से ही बलात्कार या छेड़-छाड के अधिकाँश मामले सार्वजनिक नहीं हो पाते और दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है| यह तथ्य दीगर है कि बलात्कार और छेड़-छाड की कई घटनाएं घरों में, रिश्तेदारों, पड़ोसियों या करीबी परिचितों द्वारा होती हैं पर इसी पीड़ित की बदनामी वाली मानसिकता की वजह से इस तरह के अधिकांशतः मामले सामने नहीं आ पाते| कई मामलों में तो अपराधी पीड़ित का फोटो या वीडियो बनाकर उसे निरंतर ब्लैकमेल करता रहता है| इसका परिणाम यही होता है कि बलात्कारी या छेड़छाड़ करने वाला और निर्भय होकर लगातार पीड़ित का शोषण करता रहता है| यानी कि जिस जुर्म की सजा पहली बार में ही अपराधी को मिल जानी चाहिए, वही जुर्म बार-बार होता रहता है| सही और सार्थक सवाल उठती पोस्ट !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सिंह साहब, सादर अभिवादन|  आप लेख पढकर इसका विश्लेषण करते हैं, इसके लिए आप प्रशंसा के पात्र हैं| मैं भी आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ कि बदलाव में समय लगता है और बदलाव आ भी रहे हैं … महिलाएं मुखर होने लगीं हैं...और होना भी चाहिएऑ मैं तो सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और बलात्कार के लिए अपराधी की बदनामी और सजा होनी चाहिए, पीड़ित उसके लिए शर्मिंदगी क्यों उठाए? जहां तक लोगों द्वारा प्रतिक्रियाओं का सवाल है, इस मंच पर प्रतिक्रियाओं, ज्यादा पठित, अधिमूल्यित, चर्चित आदि का खेल इस मंच पर बहुत पहले से देखता आया हूँ और किसी समय खुद भी उसका हिस्सा रहा हूँ| इस बीच में बहुत से अच्छे लेखक इस मंच से दूर भी हो गए| मैं स्वयं भी कभी-कभार ही लिखता हूँ जब कि कोई ऐसा विषय सामने आता है| प्रतिक्रियाओं की मैं अपेक्षा नहीं करता क्योंकि मैं खुद भी प्रतिक्रियाएं करने से बचता हूँ| उसका कारण यही है कि इसी मंच पर मैंने लोगों को प्रतिक्रियाओं में उलझते, लड़ते-झगडते और अभद्र भाषा का प्रयोग करते भी देखा है| कई बार तो स्थिति बहुत ही शर्मनाक होते भी देखी है| लेकिन कभी आप जैसे साथी विचारात्मक प्रतिक्रया देते हैं तो उसका जवाब अवश्य देता हूँ| ये मेरे विचार हैं, जरूरी नहीं कि सभी उससे सहमत हों, हो सकता है कि आप के विचार और सुझाव बेहतर हों|  आपने अपने स्पष्ट विचारों से अवगत कराया, इसके लिए मैं आपकी प्रशंसा करता हूँ| धन्यवाद....

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

आदरणीय राजेंद्र जी, सादर अभिवादन! मैंने आपका पिछला आलेख भी पढ़ा था ... प्रतिक्रिया नहीं दी ...अभी तक शायद किसी ने नहीं दी! मैंने भी चुप रहना ही बेहतर समझा... आपके विचार क्रांतिकारी हैं ... आपके सवाल भी वाजिब हैं, पर बदलाव में थोड़ा समय तो लगता है. बदलाव आ रहे हैं ... अब महिलाएं मुखर हुई है ..पुलिस थाने से लेकर मीडिया में भी बयान देने लगी है ... आज ही आपने देखा/सुना होगा-- एक महिला जो प्रदर्शन करने गयी थी, पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले गयी और उसके साथ दुर्व्यवहार किया ...वह मीडिया के सामने आयी... मुंह खोली ...पुलिस की तरफ से खंडन भी किया गया ...पर अब जांच बैठा दी गयी ... मेरा मतलब है कि परिवर्तन हो रहा है ..धीरे धीरे! पहचान छिपाने का कारण स्पष्ट है ... बदनामी! पर यह गुमनामी जो करामत दिखा गयी है वह हम सबके सामने है! मैंने अपनी राय रक्खी है ...आशा आप इसे अन्यथा न लेंगे!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

"आज ही समाचारों में पढ़ा कि आरोपी राम सिंह और मुकेश के घर वालों का उसके गाँव ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया है और वे भी अपने लड़कों की करतूत पर शर्मिंदा हैं| इस तरह तरह का नजरिया और मानसिकता सरकार और समाज बलात्कार के प्रत्येक मामले में क्यों नहीं अपनाता? सरकार इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में मान रही है, वाकई यह केस ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ है| लेकिन उन मामलों का क्या जहां छह माह या साल भर की बच्ची से बलात्कार और हत्या होती है? जहां विक्टिम इस लायक ही नहीं होता कि उसे यह महसूस भी हो सके कि उसके साथ क्या हुआ और किसने किया| क्या ऐसे मामले ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं है, बल्कि ये तो उससे भी कहीं जघन्य और वीभत्स श्रेणी के अपराध है|" व्यवस्था पर विचारणीय आलेख; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय सिंह साहब नमस्कार, मुझे पता है कि अन्ना हजारे की आलोचना से बहुत से लोग नाराज हो सकते है| मैं भी अन्ना हजारे का सम्मान करता हूँ लेकिन उनकी उम्र और उनके पूर्व में किये सामाजिक कार्यों की वजह से| लेकिन अब जो वे कर रहे हैं वो सही नहीं है| क्या कभी अरविन्द केजरीवाल के मुंह से अन्ना हजारे की आलोचना किसी ने सुनी है? फिर अन्ना हजारे को भी वक्तव्य देते समय इसका ख़याल रखना चाहिए और उनके आंदोलन का खुलकर साथ नहीं दे सकते तो उनकी आलोचना तो कम से कम नहीं करनी चाहिए| अरविन्द केजरीवाल बहुत ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का सामना करने में बखूबी सक्षम है किन्तु एक अन्ना की आलोचना से वे हतोत्साहित हो सकते हैं| मीडिया केजरीवाल का कुछ हद तक साथ तो दे रहा है पर उससे ज्यादा उनकी मुहीम पर उंगलियां भी उठा रहा है| मीडिया समूह भी अब राजनीतिक दलों से प्रेरित दिखते हैं| धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

'ईमानदार होना अपनी जगह है और दिमागदार होना अपनी जगह|' सौ टके की बात कही है आपने । क्या करें, आज समाज पर इन्हीं घरघुस्सू और बड़बोलू लोगों का दबदबा है, क्योंकि इनकी ही जनसंख्या बहुमत में आ चुकी है । अरविन्द केजरीवाल का काम नि:संदेह क़ाबिलेतारीफ़ है । 'वचनं किं दरिद्रता' वाले लोग समाज को कुछ नहीं देते, लेकिन वाहवाहियाँ बटोरने में पीछे नहीं रहते । एक दिन तो कलई उतरती ही है । रही राधा की बात, तो बड़ा जटिल प्रश्न है । आज का पूर्णतया ढोंगी बन चुका सामाजिक परिवेश हर मामले में या तो 'एक्स्ट्रीमिस्ट', नहीं तो फ़िर 'एक्टीविस्ट' के रूप में खुद को एक्सपोज़ करने का अभ्यस्त होता जा रहा है । विरोधाभासों की भरमार हो चुकी है । एक तरफ़ समाज खुद को पहले से अधिक प्रगतिशील और आधुनिक समझने के भ्रम में है, तो वहीं धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, उच्छृंखलता और असहिष्णुता में भी बेशुमार इज़ाफ़ा होता जा रहा है । राजकपूर की 'राधा' तबसे आजतक हमारा 'संगम' कराती आई, लेकिन शायद ही किसी को इसमें कोई अटपटापन दिखाई दिया हो । कुछ लोग, जो राजनीति, मीडिया, धर्म सम्प्रदाय की अपनी-अपनी दुकानदारियों से जुड़े हो सकते हैं, हमेशा ही उन्हें किसी न किसी मुद्दे की तलाश रहती है, जिसे उछालकर अपनी दुकान पर भीड़ जुटा सकें । हर प्रकार की दुकानदारी में बड़ा कम्पटीशन हो गया है । चिल्ला-चिल्ला कर भीड़ को अपनी दुकान की तरफ़ इशारा कर बुलाना पड़ता है, तब जाकर कहीं बोहनी का जुगाड़ हो पा रहा है । यह 'आज की राधा' वाला नया शिगूफ़ा भी कुछ ऐसी ही खुराफ़ात की उपज है । धन्यवाद !

के द्वारा:

आदरणीय भाई जी ,..सादर अभिवादन उत्तम पोस्ट पर आंशिक सहमति है ,...इतिहास गवाह है कि आंदोलनों और व्यग्र जनमानस का लाभ अवसरवादियों ने उठाया है ,.अरविन्द जी की अवसरवादिता स्पष्ट है ,..उनकी देशभक्ति पर कोई प्रश्न नहीं है लेकिन क्या किसी ने तब नेहरू गिरोह ,.मुलायम .लालू ,.चौटाला अजीत पर प्रश्न उठाया था ,..उसका परिणाम क्या मिला !!....देश मूरखों का है ,..कुछ बुद्धिजीवी सदैव खेल खेलते हैं ,...हमारा सत्यानाश हो चुका है साढे सत्यानाश होने देने में कोई बुराई भी नहीं है ,......हाल के घटनाक्रम से एक कांग्रेसी धड़े का समर्थन अरविन्द जी को प्राप्त दिखता है ,...शेष समय ही बताएगा ,...देश को किसी अरविन्द की भी जरूरत नहीं है ,....देश को व्यापक जागरण और मोदी जैसे समर्थ ईमानदार नेता की जरूरत है ,.युवाओं को राजनीति में अवश्य आना होगा ,....लेकिन क्या एनजीओ के मार्फ़त बंदरबांट करने वाले नेता ही बचे हैं ,....भूषण एंड कंपनी के कारनामे और सोच जगजाहिर हैं ,..क्या हम उन्हें चुनेंगे जो पहले से ही कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग मानते हैं ,..फोर्ड फौंडेशन से अनुदान और जिंदल जैसे चोरों से इनाम लेने वाले समय पर लाइन बदल सकते हैं . बहुत अच्छी विचारणीय पोस्ट के लिए हार्दिक आभार ....सादर

के द्वारा:

आदरणीय श्री राजेन्द्र भरद्वाज जी, सादर अभिवादन के साथ मैं आपका जोरदार समर्थन करता हूँ. मैंने देखा है टी वी चैनलों पर आइ ए सी के कोई भी प्रवक्ता बैठते हैं पैनेल डिस्कसन के लिए तो नेता लोग खासकर कांग्रेसी (सकील अहमद) बहुत ही असहज महसूस करते हैं और उन्हें नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते! आज टीम केजरीवाल सबके (भ्रष्ट लोगों के) लिए चुनौती बने हुए हैं. हमें उन्हें नैतिक समर्थन तो देना ही चाहिए और भगवान् से उनके और उनके परिवार की सुरक्षा की दुआ भी मांगनी चाहिए. बनद निर्भीक है और किसी से नहीं डरता. अंत में आप की ही बात - "इसके लिए एक नहीं कई अरविन्दों को सर पे कफ़न बाँध कर सामने आना पडेगा| सिर्फ उपदेश और सलाह देने से काम नहीं चलेगा, इसे राजनीति में आकर और अमल में लाकर साबित भी करना होगा| जनता को अपने सच्चे प्रतिनिधि को पहचानना होगा| हर कांग्रेसी और भाजपाई को ईमानदारी से इस बात को समझना चाहिए कि इस देश और इसकी जनता का कद उनकी पार्टी से कहीं ऊंचा है और व्यक्ति विशेष या परिवार विशेष के तलवे चाटने के बजाय देश और देश की जनता की सेवा कर अपना जीवन सार्थक करना चाहिए|" जय हिन्द! जय भारत!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिए आभार ,बिलकुल सच लिखा है भाई ,,,,,,,,,,,,,,,,,| अगर सब कुछ सही होता तो शायद जिन्ना इस देश के पहले प्रधानमंत्री होते और इस देश और नेहरु परिवार का इतिहास और वर्तमान, दोनों ही कुछ और ही होते| लेकिन जवाहरलाल नेहरु का लालच और महत्वाकांक्षा इस देश और जिन्ना दोनों पर भारी पडा और महात्मा गांधी जो कि जवाहरलाल नेहरु को अत्यंत प्रिय मानते थे, ने जवाहरलाल नेहरु को प्रधानमंत्री बनाने में सहयोग दिया| एक ही पल में देश के दो टुकड़े हो गए, आजादी के सिपाही जिन्ना देश के दुश्मन बन गए और इस देश का इतिहास ही बदल गया| देश भारत और पाकिस्तान दो विभिन्न सम्प्रदायों के देश में बाँट दिया गया|

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

मैं यकीन से कह सकता हूँ कि यदि आज ये आरक्षण व्यवस्था समाप्त हो जाय तो समाज से न केवल ये वर्ग भेद की विसंगति दूर हो जायगी बल्कि लोग अपने कार्य में मेहनत कर सफलता प्राप्त करने की और प्रेरित होंगे और देश सामाजिक-आर्थिक आधार पर सुदृढ़ भी होगा| जो समय बीत गया वो बीत गया, अब ऐसा नहीं है बल्कि ऐसा माहौल बनाया जा रहा है| देश को सामाजिक रूप से सुदृढ़ बनाना है तो देश की जनता को आर्थिक आधार पर संरक्षण दिया जाय न की जाति के आधार पर और शिक्षित किया जाय| अनिश्चित काल तक चलने वाले इस आरक्षण रूपी पट्टे से न तो देश का भला होगा और न ही जनता का|सही कहा आपने , ये सिर्फ समाज को बांटने का एक तरीका है ! प्रभावित करता हुआ लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

दलितों का सवर्णों से विवाह करवाने का मतलब यह नहीं है की दलितों की ब्रीड अच्छी हो जाएगी...इसका तात्पर्य यह है की इस प्रकार जातिवाद ख़त्म हो जायेगा जो की आरक्षण का मूल कारण है|अगर सभी लोग जातियां तोड़ कर एक जाती की दूसरी जाती में विवाह करेंगे तभी तोह यह जातिवाद ख़त्म होगा|जातिवाद ख़त्म होगा तभी तो आरक्षण समाप्त होगा| महोदय कृपया आप अपने आस पास के दलितों के अलावा पूरे समाज के दलितों की स्तिथि का ज्ञान करें तब आप कुछ कहे| आप कह रहे हैं की आरक्षण को समाप्त कर दें तो वर्ग भेद की विसंगति स्वतः समाप्त हो जाएगी,पहले आप वर्ग भेद की विसंगति को समाप्त करने का सार्थक प्रयास करे आरक्षण व्यवस्था ही स्वतः समाप्त हो जाएगी| आप में तो सत्य स्वीकारने की हिम्मत तो है हे नहीं|अतः हमारा बौद्धिक स्तर आंकने से पहले आप अपने गिरेबान में झांकें एवं आप अपने बौद्धिक स्तर का उत्थान करें| आरक्षण को लेकर देश में जो असंतोष व्याप्त है उसके लिए आप केवल दलितों को ही उत्तरदाई क्यों ठहरा रहे हैं?

के द्वारा: rajanbheem1 rajanbheem1

सर्वप्रथम तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि यह लेख मैंने अपने आस-पास के उन दलितों के विचारों के आधार पर लिखा है जो कि पढ़-लिख कर अच्छी पोजीशन पर आ चुके हैं और नहीं चाहते कि उनके लिए दलित शब्द का विशेष तौर पर संबोधन किया जाय|  दूसरे यह कि विश्व में शायद हमारा देश एकमात्र होगा जहां कि लोग अपने को विकसित बताने में हिचक महसूस करते है बल्कि अपने को पिछड़ा साबित कर कोई न कोई लाभ प्राप्त कर लेना चाहते हैं| यही कारण है कि अब कई अन्य जातियां भी अच्छी स्थिति में होने के बावजूद अपने लिए आरक्षण व्यवस्था चाहती हैं|  आपकी कुंठा और आपके विचारों से बिलकुल स्पष्ट है कि कई वर्षों से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था के बावजूद स्थिति जस की तस है| आरक्षण से शायद आपका आर्थिक विकास हो गया हो पर आपका बौद्धिक स्तर वहीं का वहीं है वरना आप लेख के मूल भावों को सही प्रकार से समझ पाते| अगर मैं भी आपकी ही भाषा में बात करूं तो जैसा कि आपने लिखा है कि...... दादा पडदादा ने जो कु:कर्म किये हैं उसका हर्जाना तोह भरना ही पड़ेगा…......यदि आपके जैसी ही सोच समाज की अन्य जातियों में भी बनी रहे तो आप सोच सकते हैं कि स्थिति क्या होगी| हमारे देश के राजनीतिज्ञों में सोच के अभाव के चलते ही आज आरक्षण समर्थक और विरोधी आपस में लड़ रहे हैं और नेता अपना उल्लू साध रहे हैं| लेकिन इस सब के बावजूद भी समाज का एक बड़ा तबका दलितों को अपने बीच में जगह देता है और इसकी वजह है उनका बौद्धिक स्तर विकसित हो जाना, न कि आरक्षण|  आपका कहना है कि दलितों के विवाह सवर्णों के साथ हो जाने से दलितों की ब्रीड सुधर जायगी तो आप स्वयं ही इस बात का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि दलितों की ब्रीड कैसी है| अगर आपने लेख ध्यान से पढ़ा होता तो देखते कि मैंने मेहनत और परिश्रम से ब्रीड में सुधार की बात कही थी न कि किसी जाति विशेष में रिश्ते बनाकर|  कृपया पुनः लेख को पढ़ें और समझें| इसीलिए मैं पुनः कहता हूँ कि दलितों को आरक्षण की नहीं बल्कि अच्छी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे कि उनका बौद्धिक विकास हो| धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

आरक्षण से देश का भला नहीं होगा तोह क्या जातिवाद से भला हो जायेगा दलितों पे ऊँगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झाँक के देखो……..आज जो देश में आरक्षण की स्तिथि पैदा हुई है वो सब आप ही के कु:कर्मो का नतीजा है……दादा पडदादा ने जो कु:कर्म किये हैं उसका हर्जाना तोह भरना ही पड़ेगा…आरक्षण कोई भीख या खैरात नहीं है बल्कि यह तो हर्जाना है आपके के कु:कर्मो का रही बात इमानदारी की अगर आप या आप के पूर्वज ही इतने इमानदार होते तो आज देश में आरक्षण की स्तिथि ही पैदा नहीं होती.अगर आरक्षण को ख़त्म करना है तो पहले जातिवाद को ख़त्म करो..पता नहीं क्यों इन सबको जातिवाद दिखाई ही नहीं देता…या यह सब कूप मंडूक हैं. जातिवाद ख़त्म करने की हैसियत है ही नहीं या ख़त्म ही नहीं करना चाहते और दोष दे रहे हैं दलितों को…… अपनी बहु बेटियों का ब्याह दलित समाज के लडको से और उनकी लडकियों से अपने लडको का ब्याह करवा दो… ब्रीड भी अच्छी होगी जातिवाद भी ख़त्म हो जायेगा….जातिवाद ख़त्म हो जायेगा तो आरक्षण भी अपने आप ख़त्म हो जायेगा…. आरक्षण का जनक ही जातिवाद है….जातिवाद के जनक आप जैसे संकीर्ण मानसिकता वाले ढोंगी लोग….

के द्वारा: rajanbheem1 rajanbheem1

श्री राजेन्द्र जी मैं आप की उस बात से बिलकुल असहमत हूँ की जो दलित आज आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो गए है वो अब कोटे की चाह नहीं रखते अगर उनमे इतना त्याग आ गया होता तो कब तक देश में वास्तविक गरीबो को उसका लाभ मिला होता.. दूसरी बात आपने कही की की ब्रीड सुधार की , उसके लिए हमारी सरकार की हम दो हमारे दो की निति जिम्मेवार है ,उस निति को पढ़े लिखे लोग तो मानते है , पर अनपढ़ चाहे जिस जाति के हो और धर्म विशेष के लोग मानने से इनकार कर जाते है , जिसके कारण कूड़ा करकट टाइप के जींस समाज में बढ़ रहे है , सबसे ज्यादा घाटा उन शादियों से हो रहा है जिसमे एक ही परिवार के लोगो के बिच शादी करा दी जा रही है ... क्योकि इससे reccesive genes को भी domonant में बदलने का मौका मिल रहा है अतः ब्रीड सुधार करना है तो ऐसी शादियों को धर्म सीमाओं को तोड़कर रोक लगवानी पड़ेगी... मैंने भी इसी विषय पर लेख लिखा है आपको लेख पर आमंत्रित करता हूँ ,बस निवेदन है की पूरा लेख पढ़ने के बाद ही आप उसमे क्या सुधार किये जा सकते है उस पर अपनी राय जाहिर करे ... http://drbhupendra.jagranjunction.com/2012/09/05/%E0%A4%90%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/#comment-326

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

राजेंद्र जी Namaskar, बहुत ही उम्दा विश्लेषण किया है अपने. मैं भी भारत के ओलंपिक अभियान पर एक ब्लॉग लिखना चाहता था, लेकिन लगता है अपने वो सब लिख दिया जो मेरे दिल में था. हलाकि लेखनी से मजबूर हूँ तो शायद इस विषय पर कुछ लिख ही दूंगा, लेकिन फिर कहना चाहूँगा की अपने मेरा मन का लगभग ९० प्रतिशत लिख दिया है. हलाकि ये सच है की हमारे देश में क्रिकेट के बराबर किसी और खेल को तवज्जो नहीं दी जाती लेकिन इन घटिया प्रदर्शनों पर आप किस हौसला अफजाई की उम्मीद लगा सकते है? जहा तक होसला देने की बात है तो मुझे लगता है भारत के खिलाडियों को तो काफी समर्थन था, न केवल देश में टीवी के माध्यम से बल्कि लन्दन में भी, इसके विपरीत क्या उन अफ्रीकन और छोटे छोटे द्वीपों जैसे देशो को कोनसा समर्थन और कितनी सुविधी मिलती होंगी जिन्होंने अपनी उपस्थिति मेडल टेली में स्वर्ण पदको से कराइ है?

के द्वारा: kapil_cosmos kapil_cosmos

आदरणीय शाही जी प्रणाम| आप तो जानते ही है कि पुरानी शराब और पुराने चावल जिस तरह से अपने ब्लेंड, स्वाद और सुगंध के लिए विख्यात हैं उसी तरह से उत्कृष्ट लेखन कभी भी पुराना नहीं होता| यही कारण है कि आज भले ही कितने ही चेतन भगत या विक्रम सेठ पैदा हो गए हों, मुंशी प्रेमचंद का लेखन आज भी इन पर कहीं भारी पड़ता है| आज भी पुराने नगमें आजकल के बरसाती गानों पर भारी पड़ते हैं और आगे भी रहेंगे| मैं स्वयं कितनी ही पुरानी किताबें कई-२ बार रिपीट कर देता हूँ पर हर बार पढ़ने पर और भी ज्यादा आनंद प्राप्त होता है| और खुरापातियों को तो सदैव गड़े मुर्दों को तो उखाड़ने में ही असीम आनंद का अनुभव होता है| सो यह तो हमारा अधिकार है| और अपने लेखन का कमाल देखिये कि आप तो सप्ताह के ब्लॉगर पद पर विराजमान हैं ही पर आपकी टांगों पर लटककर मैं भी आपके साथ टॉप ब्लॉग पर भी लटक गया हूँ| है न मजेदार बात| "ये हवा कौन सी गलियों से गुजरेगी हमें इसका कुछ-२ गुमान तो है, कब हसीन गलियों से ये गुजरेगी बस इसी का इन्तजार भर है...."

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

भाई राजेंद्र जी, इस डबल घसीटे पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ, समझ नहीं पा रहा । मेरा तो निवेदन होगा कि इन स्वायल्ड और आउटडेटेड पांडुलिपियों की बजाय अपनी मारू और बेजोड़ सृजनशीलता के नमूनों से मंच को लाभान्वित करते, तो ज़्यादा अच्छा था । आपकी खुद की लेखनी में जो जादू है, मैं मानता हूँ कि उसकी मिसाल खोज पाना भी दुर्लभ है । अब इन गड़े मुर्दों को चैन से सोने दें, तो ही बेहतर । आप और दारोगा जी का प्यार है, जो मुझे सिर चढ़ाए घूमते रहते हैं । प्रिय वाहिद जी के शब्दोँ में 'नि:शब्द' हूँ, फ़िर भी, 'अजी बस शुक्रिया' । यारों ने मेरे वास्ते क्या-क्या नहीं किया, सौ बार शुक्रिया, अरे सौ बार शुक्रिया, तुम जैसे मेहरबां का सहारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों … कोटिश: आभार !

के द्वारा:

च्च च्च ! लगता है पूंजी फंसा बैठा अपनी. अब तो माल खाली होने तक वापसी की भी कोई गुंजाइश नहीं दिखती. बड़ी बुरी खबर सूना दी. मैंने भी उस मोहल्ले का जायज़ा लिया था कभी धंधा जमाने की फ़िराक में, लेकिन दाल नहीं गली. पहली ही लारी गिरवाई, कि तभी समझ में आ गया की खालिश मरभुक्खों का मुहल्ला है. कमबख्त उधार खाकर डकार तक नहीं लेते. एक ब्रिटिश कोलंबिया मार्का डोगे, और उसके मिरगिल्ले से दिखने वाले एक शागिर्द किसी दूकानदार को वहां ढंग से दूकानदारी नहीं करने देते. पहले ही दिन शटर उठाते ही मोहल्ले की आचारसंहिता लेकर हाजिर हो जाते हैं, और टेबुल के नीचे से उधार नहीं खिलाने पर तरह तरह की धमकियां देना शुरू कर देते हैं. मोहल्ले का बॉस उजड्ड गंवार और अड़ियल टट्टू है, थोड़ा मूर्ख भी. ले देकर काफी दूर बैठे एक ताऊ जी हैं, जिन्हें देख देख कर दूकानदार धंधे से लगे रहते हैं, लेकिन उनकी भी कोई ख़ास चलती नहीं है. भाई अगर कुछ कमा कर निकल गया तो ठीक, वरना भगवान भला करे अपने मुन्ने का .

के द्वारा:

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

ये तो बस चंद उदाहरण मात्र हैं, वास्तव में रोज ही फेसबुक और कई अन्य सोशियल साइट्स पर न जाने कितने ही लोग आपस में बिना किसी बात के आपस में लड़-झगड रहे हैं| आश्चर्य की बात तो यह है कि अधिकांशतः लोग न तो आपस में कभी एक-दूसरे से मिले हैं और न ही परिचित है| इसके अलावा ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो कई वर्षों बाद अपने पुराने परिचितों से फेसबुक के माध्यम से मिले पर यहाँ पर बिना बात के आपस में उलझ गए जबकि इससे पूर्व उनका आपस में कोई मनमुटाव ही नहीं था| मुझे मोहम्मद रफ़ी के गाये एक गाने की चंद पंक्तियाँ याद आती हैं कि- क्या हुआ है, हुआ कुछ नहीं है, बात क्या है, पता कुछ नहीं है… सोसिअल सितेस जितनी लाभदायक हैं उतनी ही खतरनाक भी !ि

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

श्रद्धेय रतूड़ी जी, सादर प्रणाम ! शायद आप मुझे जानते हों । वही डोगा ब्रीड वाला, जो अपने कानों पर पंजा मारते आप लोगों की दावत में बेशर्मी के साथ घुस जाने की गुस्ताखियाँ किया करता था, और एकाध चूसी हुई झटकने के बाद ही वहाँ से डोलता था । इस बीच ब्रीडेड बनने की कोशिश भी की, लेकिन फ़ितरत भी कभी किसी की बदली है भला, बिरादरी वाले की गंध मिलते ही लार टपक पड़ी, आ गया । सोशियल मीडिया को बहुत कमतर करके आंका है आपने । अभी-अभी वही पढ़ रहा था । बात वहीं नहीं रह गई है । जबसे एक कानून की किताब वाले चाँद मार्का ऐय्याश महामहिम की डुगडुगी बजाई है, पहले से ही निशाने पर चल रहा सोशियल मीडिया अब पूरी तरह टार्गेटेड हो चुका है, और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मदद और संचार मंत्रालय के माध्यम से सरकार पर हाबी भ्रष्ट अमलों की नींद हराम करने वाले इस सोशियल मीडिया की कई विदेशी साइट्स को भारत में ब्लाक भी करवा दिया है । इस सरकारी कदम से भिन्नाए किन्हीं कथित अन्तर्राष्ट्रीय जागरूक नागरिकों के एक ग्रुप ने भी एलान-ए-जंग का बिगुल फ़ूँकते हुए कांग्रेस पार्टी के वेबसाइट को डाउन कर दिया है, और भारत सरकार के गोव डाट इन पर समाप्त होने वाले कई साइट्स का कमांड अपने हाथ में लेते हुए उन्हें भी शीघ्र ही डाउन कर देने की धमकी दे डाली है, यदि सरकार उन सोशियल साइट्स से प्रतिबंध नहीं हटाती है, तो । सरकार की दिक्कत ये है कि विज्ञापनों की कृपा से नवाज़ कर प्रिंट मीडिया की चिथड़ाउड़ाऊ खबरों को तो काफ़ी हद तक नियंत्रित कर लेती है, परन्तु इंटरनेट पर कुकुरमुत्तों की तरह फ़ैलती जा रही खबरिया साइट्स पर उसका कोई ज़ोर नहीं चल पा रहा । आगे-आगे देखते हैं, होता है क्या …? उम्मीद है अच्छी पक और छन रही होगी । थोड़ा लिखना बहुत समझना । कुछ लोग जो तालीमात हासिल करने विदेश गए थे, उनका कोई अता पता हो तो हमें भी बताइयेगा । आदाब !

के द्वारा:

देश के लिए शहीद हुए तीनो महापुरुषों को मेरा शत शत नमन . काश इस क़ुरबानी को आज के नेता ,मंत्री और विधायक याद कर पाते ! अगर उन्हें इसका जरा भी अंदाजा होता की देश को आजाद करने के लिए ये भारत माँ के सपूतों ने अंग्रेजों द्वारा कितना जुल्म सहा और अंत में हसते हँसते फांसी पर चढ़ गए आज अपना देश इन्हीं वीर सपूतों की क़ुरबानी का फल आजादी के रूप में भोग रहा है और भोग में इतना मशगुल है की देश की सुरक्छा एवं प्रभुसत्ता को बचाने के लिए ख़रीदे जानेवाले हथियारों की दलाली खाता है वर्षों तक सुरक्छा में काम आनेवाले अहम् हथियार केवल इसलिए ख़रीदे नहीं जाते क्यूंकि नेताओं एवं मंत्रियों को उसका कमीशन नहीं मिला सुदूर आकाश में बैठे ये वीर सपूत अपनी क़ुरबानी पर अफ़सोस करते होंगे कीजसी अपने देश को आजाद करने के लिए वे शहीद हुए उस देश के हीं विद्वान् अफसर एवं नेता अपने ही देश को इस तरह बर्बाद करेंगे . जरुर इस गंभीर मसले पर चर्च होनी चाहिए .एक अछे देशप्रेम से जुड़े यादगार दिन को ताजा करते हुए आपने एक सुन्दर लेख लिखा है बधाई

के द्वारा:

अशोक जी लालू प्रसाद यादव को तो मैं एक मदारी के जमूरे से ज्यादा नहीं समझता जो कि सिर्फ जनता के मनोरंजन के लिए होता है| इस देश का दुर्भाग्य ही है कि कोई योग्यता न होते हुए भी ऐसे लोग लोकतंत्र के मंदिर में घुसने में सफल हो जाते है| रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने पूरे देश की जनता को उसी प्रकार बेवकूफ बनाने की कोशिश की जैसे कि वे अपने भोले-भाले बिहारी मतदाताओं को बनाते रहते हैं| कांग्रेस की घटिया और सत्ता के लोभ की राजनीति ने रेल मंत्रालय को कोटे का पद बना दिया है और इसका चुग्गा कभी लालू तो कभी ममता को फेंक कर वह अपनी कुर्सी का हिलता पाया थामे रहती है| एक सौ इक्कीस करोड की जनता का दुर्भाग्य है कि रेल मंत्रालय जनता के हित के लिए नहीं बल्कि सत्ता का एक हिलता पाया है| यदि ऐसा न होता तो देश की जनता के हित में रेल मंत्रालय योग्यता के आधार पर दिया जाता| आपका धन्यवाद|

के द्वारा:

सादर प्रणाम, बिलकुल उपयुक्त विषय पर लेखनी चलाई है आपने। देशहित में सोचने और करने वालों के लिए राजनीति में क्या स्थान है ये हमें मालूम हो गया है। रेलवे के सुधार हेतु अपेक्षित क़दम उठाने के प्रयास में दिनेश त्रिवेदी को अपने पद से ही हाथ धोना पड़ गया है। ईमान से कहूँ तो रेल बजट के पहले मैंने कभी दिनेश त्रिवेदी की सूरत भी नहीं देखी थी और अपने बजट में उन्होंने जिस तरह से रेलवे के उन्नयन का ख़ाका पेश किया है वो निश्चय ही सराहनीय हैं मगर इस क़दम ने उन्हें त्यागपत्र देने पर भी विवश कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम से राजनीति का कुत्सित चेहरा एक बार फिर से उजागर हो गया है। हालाँकि कि रेलवे को बेहतर बनाने के लिए प्रायोजन का प्रयोजन भी किया जाना चाहिए था। कोई आईडिया एक्सप्रेस, टाटा दूरंतो इत्यादि ट्रेनें चला कर रेल बजट का आवश्यक हिस्सा प्राप्त किया जा सकता था मगर ये बिना रीढ़ के जंतु कोई बदलाव नहीं होने देना चाहते क्यूंकि उन्हें उनके वोट बैंक को क्षति पहुँचती दिख रही है जबकि असलियत में ऐसा नहीं नहीं है। कुंठित मानसिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के कार्य अब किसी भी राजनेता के एजेंडे में नहीं हैं और जिनके में हैं उनका हाल दिनेश त्रिवेदी जैसा है। सार्थक विषय पर लेखन हेतु आपका हार्दिक आभार,

के द्वारा:

आपने केंचुआ नाम सही रखा है और ये केंचुए जब जब चुनाव रुपी बरसात आता है ये इस देश की प्रजातंत्र को रीढ़ हिन् प्राणी बनाने का कम शुरू कर देते हैं रेल बजट पेश करने वाले रेल मंत्री त्रिवेदी का कहना है वे रेलवे एवं देश की चिंता ज्यादा करते हैं इसीलिए वे ऐसा बजट पेश किये हैं इस पर भूतपूर्व रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव की टिप्पणी भी आपने जरुर सुना होगा अपने समय में वे रेलवे को फैदे में दिखा रहे थे पर नागरिक सुरक्छा समय से रेलों को चलने की कवायद और साफ सफई का उन्होंने कितना ख्याल किया यह जग जाहिर है यह बात समझ से परे है की जो रेल २ महीने से लेकर चार महीने पहले हिन् यात्रिओं से आरक्छन के नाम पर पैसा वसूल लेती है उस धनराशी पर बैंकों से इतना ब्याज मिलता होगा जिससे रेल को चलने का खर्चा तो बखूबी निकल जाता होगा हाँ नयी रेल लाईने बिछाना सिग्नलिंग प्रक्रिया में सुधर एंटी कोलिसन डिवाईस इस तरह की आधुनिक तकनिकी सुविधा के लिए जरुर रेलवे को धन की आवश्यकता है लेकिन इतने महत्वपूर्ण मौके पर भी किसी नेता या मंत्री के जबान से यह नहीं निकला की जो देश से बहार अपना पैसा पड़ा है वह किस दिन किसके कम आएगा कांग्रेस ने कसम खायी है वह काला धन और भ्रष्टाचार के माध्यम से kamaye पैसा कभी देश में नहीं लाएगी और मिला जुलकर बिपक्छ भी यही चाहता है ऐसी घटनाएँ बताती हैं की सभी नेताओं का हिन् कला पैसा टैक्स चोरी का पैसा स्विस बैंक में जमा है और धीरे धीरे ये नेता इन पैसों को कहीं और जमा कर रहें है इसका खुलासा भी बहुत जल्द हो जायेगा , अंत में धन्यवाद एक अच्छा ब्लाग लिखने के लिए

के द्वारा:

सिनेसरा जी नमस्कार, मुझे आश्चर्य हो रहा है कि आपको इस मंच पर अच्छे लेख पढने को नहीं मिले और वो भी ऐसे समय में जब कि आप खुद इस हफ्ते की बेस्ट ब्लॉगर चुनी गई हैं| इस मंच पर हर हफ्ते एक बेस्ट ब्लॉगर चुना जाता है, इसके अलावा दो टॉप ब्लॉग्स, दस सर्वाधिक् चर्चित, दस सर्वाधिक पठित, दस अधिमूल्यित और कितने ही अच्छे-२ लेखों से ये मंच हमेशा भरा पडा रहता है| यहाँ कोई घमासान नहीं मचा है बल्कि एक सार्थक मुद्दे पर बहस हो रही है| यदि आप इससे परिचित या सहमत नहीं हैं तो आपको इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए और सिर्फ अच्छे लेख पढ़ने और लिखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए| इस मंच को आपसे बहुत सी श्रेष्ठ रचनाओं की उम्मीद है| आपको हार्दिक शुभकामनाएं और धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

संतोष जी नमस्कार, आपका कहना दुरुस्त है कि एक अवैतनिक लेखक की अपेक्षा ही यही होती है कि जो उसने लिखा है उसका उचित विश्लेषण और सम्मान हो, इससे उसे आत्मसंतुष्टि मिलती है| लेखक का स्वाभिमान आहत होना तब स्वाभाविक ही होता है जब कि कम स्तर की रचना को उससे ऊंचे स्तर पर रखा जाय| पर जैसा कि आपने लिखा है, ये मंच अब काफी विस्तृत हो चुका है और ऐसे में कई बार एक बेहतर रचनाएं उचित स्थान न मिलने के कारण बिना पाठकों की नजर में आये गुम भी हो जाती हैं| ऐसे में एक लेखक की मेहनत व्यर्थ चली जाती है| मुझे पूरा विशवास है कि शाही जी की यह सब देख पढ़ रहे होंगे और आपकी-हमारी भावनाओं को भी समझ रहे होंगे| इस होली पर उनसे एक शानदार रचना की अपेक्षा भी है|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

वाहिद भाई आपने बिलकुल सही कहा कि जे जे के लिए अपने व्यवसायिक हित साधना ही परम उद्देश्य है। पर यह स्वाभाविक ही है क्योंकि जेजे एक व्यासायिक ग्रुप का पोर्टल है| उन्हें तो अपनी साईट पर ज्यादा से ज्यादा एक्सेस और हिट्स की संभावनाएं बढानी ही हैं| पर हाँ इस जेजे के मंच पर ऐसा माहौल जरूर विकसित हो गया है जहां कि निस्वार्थ और सकारात्मक लेखन करने वालों की भावनाएं आहत हो रही हैं| नए लोगों को चुग्गा डालने का फायदा ये है कि वे जल्दी बकरे बन जाते हैं और पुराने ब्लौगरों से ज्यादा मंच पर नजर आने लगते हैं| पर साथ ही इस मंच का एक इनडाइरेक्टली सकारात्मक पहलू भी रहा है कि हमें बहुत से अच्छे लेखकों से भी परिचित होने का अवसर मिला है| एक आपसी सौहार्द्रपूर्ण माहौल का दायरा भी बना है, भले ही वो हमने खुद ही बनाया है पर माध्यम तो यही मंच बना| पर हाँ, शाही जी जैसे विनोदी स्वभाव के व्यक्ति के इस कदर आहत हो जाने के पीछे निश्चित है कि कहीं न कहीं उनकी भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है वर्ना वे यूं अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त न करते| हमें अब इस बात को समझ जाना चाहिए कि जेजे की भी अपनी मजबूरियाँ हैं कि उनको को इन सब बातों के लिए फुर्सत नहीं है, यह सब हमें स्वयं ही टैकल करना पड़ेगा, अगर इस मंच पर मौजूदगी बनाए रखनी है तो| वरना जै राम जी की|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

आकाश जी, चूंकि यह मंच सार्वजनिक है इसलिए किसी पर अपने विचार थोपना तो संभव नहीं है पर विचार प्रकट करने में कोई बुराई नहीं है| मैं पहले भी कहता आया हूँ कि ये प्रतिक्रियाओं का निरर्थक खेल सिर्फ आपसी विवाद को ही जन्म देता है, इससे कुछ भी सकारात्मक नहीं मिलता| ये ठीक उसी प्रकार है जैसे कि दो मूंगफली बेचने वाले पूरे दिन आपस में ही एक-दुसरे को मूंगफली बेचते रहे और शाम तक कमाई कुछ नहीं की| मेरा विचार है कि या तो लेख पर प्रतिक्रियाएं पब्लिश ही न हों या फिर जेजे उनकी स्क्रूटनी की जिम्मेदारी ले| प्रिंट मीडिया में ...यानी कि अखबारों या पत्रिकाओं में प्रतिक्रियाओं की या तो गुंजाइश ही नहीं होती या चुनी हुई प्रतिक्रियाओं को ही प्रकाशित किया जाता है| सीधे-२ लेख पर मनमाफिक प्रतिक्रया दे सकने और व्यक्तिगत आक्षेप करने की ये सुविधा कई बार कलह और विवाद को बढाने का काम करती है| पर ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं.....हो सकता है कि बहुत से लोगों को इस प्रतिक्रियाओं के खेल में मजा भी आता हो| जैसी स्थिति आपने बताई है, मैं स्वयं कई बार इसका सामना कर चूका हूँ| फिर भी मैं कहता हूँ कि जब आपमें लिखने का पैशन है तब आप लिखते रहें, कोई क्या कहता है इसकी परवाह न करें| धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

आदरणीय , योगी जी नमस्कार, जहां तक मेरा विचार है, जो भी लेखक गंभीरता पूर्वक सार्थक लेखन करते हैं, वे अपने लेखों के सम्मान की अपेक्षा भी रखते हैं| सम्मान से तात्पर्य सिर्फ पुरस्कार आदि से नहीं है बल्कि उसका उचित विश्लेषण व मूल्यांकन लेखक को आत्मसंतुष्टि देता है| इसके अतिरिक्त यदि लेखक से कमतर व्यक्ति को वह सम्मान मिलता तब उसकी आत्मा का आहत होना स्वाभाविक ही होता है| इसी लिए कई साहित्यकार सिर्फ धन या पुरस्कार के लिए समझौता नहीं करते बल्कि उचित सम्मान न मिलने पर पुरस्कारों को ठुकरा भी देते हैं| इस मंच पर ऐसा कोई धन या पुरस्कार तो ठुकराने के लिए नहीं है पर कई काबिल लेखक उचित सम्मान न मिलने की वजह से धीरे-२ मंच से दूर हो गए हैं या उनकी इस मंच पर उपस्थिति बहुत कम हो गई है| आपकी ही तरह मेरा भी मानना है कि श्री शाही जी को इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि आपको और हमें पता है कि वे कितने उच्च श्रेणी के लेखक हैं और जब लिखते हैं तो उनके चाहने वाले उन्हें ढूढ़ ढूंढ कर भी पढ़ ही लेते हैं ! सच है कि अगर वो ये मंच छोड़ते हैं तो निश्चित रूप से इस मंच को कमी खलेगी ! धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा:

कब से प्रतीक्षा थी कि आप भी इस मसले पर कुछ कहें। आपने नीर-क्षीर का अलगाव बहुत ही बेहतरीन ढंग से कर दिखाया है। जे जे द्वारा अपने हितों को साधना और ब्लॉगरों के सम्मान की उपेक्षा करना निरंतर होता जा रहा है। इन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं कि क्या सही है और क्या ग़लत। इनके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने व्यवसायिक हित साधना ही परम उद्देश्य है। आदरणीय शाही जी जैसे विनोदी स्वभाव के व्यक्ति द्वारा उठाया गया क़दम स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि जे जे की दृष्टि में निःस्वार्थ ब्लॉगिंग करने वालों की क्या छवि है। इनकी महानता तो देखिये कि लेख के माध्यम से व्यथा व्यक्त करने के बावजूद इन्होने व्यक्तिगत रूप से अपना रटारटाया स्पष्टीकरण शाही जी को मेल कर दिया। यदि उन्होंने आकाश जी की पोस्ट स्वयं इसे नहीं डाला होता तो हम सब इससे कभी वाकिफ़ नहीं हो पाते। बेहयाई का इससे अच्छा नमूना मैंने कभी नहीं देखा। साफ़ है कि इन्हें अपना अनमोल समय दे कर ब्लॉगिंग में योगदान करने वाले ब्लॉगरों के सम्मान और भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। इनके इस रवैये को तानाशाही की संज्ञा देने में कोई गुरेज़ नहीं। आपने जिस साफ़गोई से अपने विचारों को प्रस्तुत किया है उसके लिए आप बधाई के पात्र है। आपकी स्पष्टवादिता को नमन है।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

आदरणीय श्री राजेन्द्र जी, ये तो कुछ भी नहीं जब हमारे दिल को ठेस पहुंची तो हमने अपने हिसाब से शिकायत की.हमें उसका फल ये मिला की कुछ आदरणीय सम्मानित ब्लागर जी को टापिक मिल गया लेख लिखने का.और वो हमारी ही बुराई कर बैठे,..इनका तो सीधा सा मतलब तो यही जान पड़ता है की जैसे राजनीति में नेता चाहे जैसा हो बस उसे ही वोट दो चाहे वो देश राज्य का जो भी करे..वैसे ही उनका यहाँ भी यही तात्पर्य था की चाहे जो भी बस लेखन करते जाओ शिकायत मत करो.भले जागरण की तरफ से अपमान हो या कोई नौसिखिया ब्लागर गाली दे.क्या कहे ऐसे लोगों के ऐसे विचारों का..मै जब इस मंच पर वापस आया तो मैंने देखा की यहाँ बहुत से ऐसे ब्लागर जुड़ गए है जो मुखौटा पहने हुए है.उनकी अपनी कोई असली पहचान नहीं जान पड़ती.लेकिन कहने को महान रचनाकार है..सच्चाई और महानता तो लेखो और प्रतिक्रिया से ही समझ में आ जाता है अगर आपको थोडा भी ज्ञान हो..मगर जो लोग हमारी बुराई करते है वो इनका कुछ नहीं करते क्यूंकि कमेन्ट का व्यवसाय जो है..मै लगभग २ साल से ब्लोगिंग में हूँ मैंने कभी कमेन्ट की लालसा में न कोई पोस्ट की न किसी को कमेन्ट किया..और ब्लागर धर्म का बाखूबी निर्वहन किया..मेरे भी एकाध पोस्ट में लोग गरजने को कोशिश किये लेकिन मैंने उन्हें गरजने नहीं दिया क्यूंकि मुझे कमेन्ट नहीं चाहिए ये तो मेरा एक पैशन है लेखन.. जैसा की मैंने अपनी जीवनी यहाँ आप सब से साझा की थी तो ये भी आपको मालुम होगा की बहुत बार बहुत लोगों ने आग्रह किया था तभी मैंने उसे सही समय पर पोस्ट किया था..मै अपनी सफाई तो नहीं दूंगा क्यूंकि मेरे ब्लॉग पर जिनके भी कमेन्ट है वो शायद मुझे अच्छे से समझते होंगे यही मेरा पुरस्कार है...क्या खुद पर होने वाले जुल्म को सहना महानता है..अगर ऐसा कोई कहता है तो आज के समय में वो धूर्त है... बहुत ज्यादा लिख चूका हूँ. बस इतना कहूँगा इधर तीन या चार दिनों के पोस्ट को जब आप खंगाल कर देखेंगे तो शायद आप खुद हथ्प्रध रह जायेंगे... धन्यवाद आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari Aakash Tiwaari

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा:

वाहिद भाई प्रणाम, जो स्थिति आपकी है कमोबेश वही स्थिति मेरी भी है| आप तो जानते ही हो मुझे लेख लिखने के लिए रात्री में ही समय मिल पाता है और बिना किसी रीटेक के एक ही बार में लेख लिख देने में रात भर का जागरण हो जाता है| कल क्षणभर को यह लेख फीचर में आकर हट गया तो मैं निराश था कि इतनी रात जाग-२ कर लेख लिखा और लोग पढ़ भी नहीं पाए| आपसे ही पता चला कि यह लेख टॉप ब्लॉग में टंगा पडा है| इसके लिए जेजे की सम्पादकीय टीम बधाई की पात्र है| काफी दिनों बाद यह लेख लिखा तो इसका कारण चुनाव हैं| चुनावी प्रत्याशी अपने भविष्य के लिए चिंतित हैं, चुनाव आयोग अपने कामों के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है, अन्ना और बाबा अपनी मुहिम छेड़े हुए हैं, सबको अपनी-अपनी पडी है पर आम जनता से किसी को मतलब नहीं है| खासतौर पर उत्तराखंड के चुनावकर्मी इस खराब मौसम में अपनी ड्यूटी लगने पर परेशान फिर रहे हैं| मैंने तो बस जनता के दुखड़ों का संकलन भर करने की कोशिश की है| ...और हाँ ये भी सच है कि मेरा भी अगला लेख लिखना कब संभव हो, कह नहीं सकता| प्रतिक्रिया के लिए थैंक्स....

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

अंगारचंद के विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ राजनीती में अब दिखावे के आलावा कुछ नहीं बचा है कथनी और करनी में कितना फर्क है यह इस देश की जनता अछि तरह जान चुकी है कितने चुनाव आजादी के बाद हुए हर चुनाव में नेताओं ने तरह तरह के वादे किये पर उनको पूरा कितनों ने किया हाँ जो नेता लखपति थे वे अरबपति बन गए और करोड़पतियों की तो गिनती नहीं देश में विकास जरुर हुवा है काम भी बहुत हुवा है पर जिसको समग्र विकास कहें ऐसा कुछ नहीं हुवा कहा जा रहा है चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र और सशक्त संस्था है पर इस आयोग का क्या हाल किया सलमान खुर्शीद ने जब चुनाव आयोग ने एतराज किया उनके मुस्लिम आरक्छन के एलान पर उनका कहना था एतराज हीं किया है न कोई फाँसी की सजा सुनाई है क्या ? अब भला इतने वरिष्ट नेता इस तरह का बयां देंगे उससे क्या पता लगता है क्या सचमुच चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संस्था है नहीं कतई नहीं यह भी सरकार के मर्जी का कम करता है वर्ना जो धर पकड़ हो रहें हैं उनका खुलासा होता की किस पार्टी के कार्यकर्त्ता कौन सा रुपया कहाँ ले जा रहें हैं हो सकता है केवल विरोधी दलों के पैसों को ये पुलिसवाले पकड़ रहे हों यहाँ तो सीबीआई भी उनके खिलाफ कार्रवाई करती है जिनको सरकार या कांग्रेस ने सबक सिखाना हो या धमकाकर अपने पक्छ में वोट लेना हो समर्थन लेना हो आज अचानक यूपी में छापे क्यूँ पड़ने लगे अब तक ये छापे क्यूँ नहीं पड़े थे जब तक मायावती इस सरकार का समर्थन करती रही ये चुप रहे भ्रस्ताचार होने दिए और मायावती ने इन नेताओं को गले लगाया और चुनाव की तारीख तय होते हिन् २५ नेता भ्रष्ट हो गए ऐसा क्यूँ ? अब तो बिचारे वे नेता बलि के बकरे बने अब तक तो वे माननीय मायावती के घर हप्ता पहुंचाते रहे और आखिर में धरे गए ऐसे माहौल में आम आदमी तो यूँ हीं तमाशबीन बनकर सब कुछ देखता रह जायेगा सहता रह जायेगा और इस चुनाव में फिर से उन्हें हीं जिताने का काम करेगा क्यूंकि वोट देना उसका कर्तव्य है जनता का पैसा लूटना नेताओं का कर्तब्य एवं अधिकार दोनों है अतः आम आदमी बने रहना ज्यादा ठीक है बनिस्पत इस चुनाव में टिकट लेकर चुनाव लड़ना और किसी अछि छाबिवाले नेता की कल्पना करना कोरी बकवास है जैसे चलता है चलता रहेगा और चुनाव आयेंगे जायेंगे यही नेता हमसबपर राज करेंगे

के द्वारा:

अब जब अपने इज्जतदार अंगार चंद भाई (आम) गरीब की जोरू और बेटी की तरह से अपनी इज्जत की फ़िक्र करने लग जाए तो फिर उन से भी आर्डिनरी लोगों का क्या होगा ?...... सन्नी लियोन का जिस्म ढकने वाली बात गुदगुदा गई ..... सभी बाते अच्छी लगी किस का जिक्र करु और किस को छोडू हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

प्रिय राजकमल जी नमस्कार, ईमानदारी से कहूँ तो (पहले भी कई बार कह चूका हूँ) आपकी कलम और आपकी सक्रियता की बराबरी करना मेरे क्या इस जेजे पर किसी के भी बस की बात नहीं है| आप न केवल मजेदार लेख लिखने में बल्कि अन्य लेखों को पढ़ने और प्रतिक्रियाएं करने में भी नं वन हो....बल्कि इस मामले में ईमानदार भी हो.....क्योंकि भले ही मैंने कई बार आपके कमेंट्स का जवाब तक नहीं दिया, फिर भी आप नियमित प्रतिक्रियाएं करते रहते हो| आदरणीय बाजपेई जी की प्रतिक्रिया ने वाकई मुझे प्रेरित किया है| हालांकि जेजे ने प्रतिक्रिया की क्रिया को और भी कठिन बना दिया है, पर फिर भी अपनी और से मैं कोशिश कर रहा हूँ| Please bear with me....

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

क्या खूब लिखा है ? ! वोह बीते दिन याद है वोह पल छीन याद है नहीं गुजार सके तेरे संग जो वोह कमेन्ट याद है कभी वोह भी समय था कि हम आपके (ब्लॉग ) घर के एक कोने में उपेक्षित से पड़े रहते थे ..... ना आप हमे बुलाते थे और ना ही चाय पानी पूछा करते थे –सच में बहुत मजा आता था ..... और हद तो तब हो जाती थी जब हमे उसी हालत में छोड़ कर अगले दौरे (पोस्ट ) पर निकल पड़ते थे ..... लेकिन क्शुक्र है कि आदरणीय वाजपेई जी का जोकि अब आप सभी घर आये हुए लोगों का हाल चाल पूछ लिए करते हो –आप भी लगे रहो –हम तप लगे ही है –और लड़की देखने कि तैयारी चल रही है ..... (जब भी फिल्म कि समीक्षा पोस्ट करनी हो तो फर्स्ट डे – फर्स्ट शो देख कर ही पोस्ट किया करे ताकि हम फिल्म को देखने या ना देखने का उचित फैसला ले सकने के काबिल हो सके –शुभकामनाये )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

सचिन भाई नमस्कार, विद्या बालन आपकी पसंदीदा हीरोइन है तो इसके लिए विद्या बधाई की पात्र है| मैं भी इससे सहमत हूँ कि विद्या ने परिणीता, मुन्नाभाई.....और पा जैसी फिल्म में चेलेंजिंग रोल किये हैं| पर एक बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई कि हमारी अभिनेत्रियां अपना बेस्ट वेश्या के रोल में ही क्यों देती हैं? माना कि एक कलाकार का काम नए-२ तरह के रोल करना होता है पर क्या उनकी समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या एक अभिनेत्री को अपना अभिनय साबित करवाने के लिए नग्नता, सैक्स और अश्लील संवादों का सहारा लेना जरूरी है? अगर कला के नाम पर हम इससे सहमत हैं तो क्यों मकबूल फ़िदा हुसैन जैसे महान कलाकार को इस देश से भागना पड़ा जो कि कला के नाम पर देवी-देवताओं की अश्लील पेंटिंग बना रहा था| सच्चा कलाकार तो वही है जो अपनी कला से बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह दे| ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं कृपया इसे अन्यथा न लें| आपका धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

राजेन्द्र जी, आपका लेख बेहद सार्थक है. जिस सिल्क स्मिता के जीवन पर यह फिल्म बनाई गई है मैंने इस फिल्म के आने से पहले उसके विषय में कभी कुछ नहीं सुना था. निश्चित तौर पर मेरे जैसे बहुत लोग हैं जो सिल्क स्मिता को जानते ही नहीं थे. लेकिन फिर भी मैं इतना जरूर जानती हूं कि वह कोई समाज सेविका या नोबल प्राइज विजेता नहीं थी.इसके अलावा वह कोई ऐसी शेख्सियत भी नहीं रही होंगी जिसने अपने कर्म और त्याग के कारण समाज का कुछ भला किया होगा. फिर ऐसे में उसकी जीवन लीला पर्दे पर प्रदर्शित करने का आश्य सिर्फ पैसा कमाना था. सिल्क स्मिता का नाम देकर सिर्फ इस पिक्चर ने एक एक्स्ट्रा अंक बटोरा है. यह सिर्फ एक फूहड़ और अश्लील फिल्म से अधिक और कुछ नहीं है.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

नमस्कार भाई राजेंद्र जी , मैंने अभी पिक्चर देखी नहीं है, इसलिए ज्यादा कुछ कह पाना संभव नहीं है, मगर विद्या बालन मेरी पसंदीदा हेरोइन है और हमें नहीं भूलना चाहिए की विद्या ने आज के जमाने मैं भी परिणीता जैसी सामाजिक और मुन्नाभाई जैसी साफ़ सुथरी फिल्मों के अलावा पा फिल्म मैं अमित जी की माँ का चेलेंजिंग रोल निभाया था और एक एक्टर का काम ही होता है नए - नए चेलेंज का सामना करना, इसलिए मेरे विचार से विद्या वालन को इसके लिए दोषी ठहराना उचित नहीं होगा ! और बाई होलीवुड की फिल्मो से यदि हम तुलना करें तो उन जैसी नग्नता दिखाने के लिए वोलिवुड को एक जन्म और लेना होगा ! बाकी इस बात से मैं सहमत हूँ की फिल्मों मैं अश्लीलता तो बढ़ी है इन दिनों .....

के द्वारा: allrounder allrounder

राजेंद्र जी कमाल का लिखा हे आपने / हम सब आपकी बात से सहमत हे / सरकार में चमचा गिरी करने वाले बिना जनाधार वाले नेता अपनी पार्टी का जनाधार ख़तम करने पर तुले हे / सोशल साइट्स पर सेंशरशिप लगा कर वो इमर्जेंशी की याद दिलाना चाहते हे / उस समय के कुछ चमचों ने संजय गाँधी / इंदिरा गाँधी को गुमराह किया ,नतीजा क्या मिला १९७७ में पूरी कांग्रेस की लुटिया डूब गयी / जहाज के डूबते ही वो गुमराह करने वाले तत्व चूहों की तरह भाग निकले / आज सरकार की निंदा करने वाले सरकार के एक दोस्त के भांति काम करते हे / सरकार अपनी गलती सुधार कर अगले चुनाव में फिर आने का विश्वास कर सकती हे / सचमुच सोशल साइट्स आज देश में एक मार्ग दर्शक कर कार्य करती हे / सरकार के पास कोई जादू की छड़ी नहीं कि वह हर बात की खबर रखे , केवल जागरूक नागरिक ही सरकार के आँख कान मुहं का काम कर सकते हे / सरकार में कुछ लोग आज भी जनता को गाँधी के तीन बन्दर की तरह देखना चाहते हे जो आँख , कान व् मुहं को बंद कर उनकी कार्यवाही को असहाय सी देखती रहे / सचमुच शोशल साइट्स ने आज आम जन को वो प्लेटफोर्म दिया हे जिसमे वो अपनी बात सरकार वो आम जन तक पहुंचा सकता हे / आज हमारे जन प्रतिनिधियों को इतनी फुरशत नहीं कि वो संसद में हमारी बात उठायें तथा उसे हल करने का काम करें / असल में आज सोशल साइट्स पर कमेन्ट डाल कर , लोगों की समस्याओं को उठाकर एक सही मायने में जनप्रतिनिधि का कार्य करते हे / साथ ही वह सरकार , ब्युरोकेसी ,न्यायपालिका , को ससक्त बनाने का काम करते हे / एक तरह से वो समय पर सरकार को चेता कर उसका काम हल करने में मदद करते हे / राजीव गाँधी जी जब लोगों के बीच जाते थे तो लोकल लोगों से उनकी समस्या जान उन्ही से उसका हल पूछते थे / आज हमें लोगों के बीच का नेता चाहिए न कि एयर कंडीशन में बैठा नेता / बेक डोर से सरकार चलने वाले नेता भला आम जनता के दर्द को क्या समझें

के द्वारा: satish3840 satish3840

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

वाहिद भाई सही कहते हो| आपने सही कहा की आपके ऋषिकेश आगमन पर भी मैंने आपसे इस विषय पर चर्चा की थी| दरअसल सीधी और सच्ची बात यही है की जब तक हम किसी भी समस्या के निराकरण के प्रति नैतिक रूप से इमानदार नहीं होंगे, तब तक कोई भी समस्या हल हो ही नहीं सकती| किसी सेलेब्रिटी के एक दिन सड़कों पे दौड़ने से कोई समस्या हल नहीं हो जाती| इसके लिए तो तो एक विचारधारा बनानी होती है जो की आन्दोलन का रूप ले सके| अपने घर में महंगे-२ कुत्ते-बिल्लियों को गले लगाने वाले लोग जंगली पशुओं का शिकार करते हैं, गमलों में खरीद-२ कर पौधे लगाने वाले अपने फायदे के लिए जंगल के जंगल साफ़ करवा देते है| यदि मनुष्य ने इस ईको सिस्टम की जिसका की वह खुद भी अभिन्न अंग है, रक्षा नहीं की तो यह मानव जाति के लिए भी अच्छा नहीं होगा|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

राजेंद्र जी नमस्कार, प्रकृति से प्रेम करेंगे तो बदले में प्रेम ही पाएंगे . पर आज समय बदल गया है किसी को प्रकृति से या फिर बेजुबान जानवरों से कोई लेना देना नहीं रह गया है . अपने फायदे के लिए जब इंसानों का कत्ले आम हो रहा है तो फिर ये बेजुबान जानवर क्या है ?? इंसान जो बोल सकते हैं. अपने हक के लिए लड़ सकते हैं . न्याय मांग सकते हैं जब उनकी कोई सुनवाई नहीं तो इन बेजुबान जानवरों की कौन सुनेगा . ये तो बेचारे बोल नहीं सकते अगर अपने बचाव के लिए लड़ेंगे तो पागल करार कर दिए जायेंगे और गोली का शिकार हो जायेंगे ....... अपने सही कहा की जान लेना हल नहीं है पर जो जल्दी हो जाये आजकल वाही हल रह गया है ... इन बेजुबानो को भी जीने का उतना ही हक है जितना इंसानों को तो कृपया इनको भी जीने दे ... धन्यवाद .......... और क्षमा चाहूंगी पता नहीं मनोरंजन जी को दी गई प्रतिक्रिया आपकी प्रतिक्रिया के साथ कैसे पोस्ट हो गई है . पता नहीं ....

के द्वारा: mparveen mparveen

गुरुवर को प्रणाम अर्पित तथा सादर समर्पित भी है। ऐसे तो काम नहीं बनने वाला। आने दीजिए अगले बड़े त्यौहार को। *************** भईया, देर लगी आने में हमको, शुक्र है फिर भी आये तो, आस ने दिल का साथ ना छोड़ा, वैसे हम घबराये तो; आपसे ज़्यादा कहने कि ज़रूरत नहीं है आप थोड़े में ही मेरी बात को समझ लेते हैं। आपसे "असहमत" तो शायद ही कभी हुआ हूँ और इस विशेष लेख पर, जिससे मैं पूर्व में भी रूबरू हो चुका हूँ, असहमत होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मैं वहाँ आया था तब भी आपने इस विषय पर मुझसे मौखिक चर्चा की थी। अंततः लेख के अंत में लाल रंग और इटैलिक्स में लिखे आपके नोट पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। भारत जैसा देश जहाँ बुद्ध, महावीर, गाँधी जैसे अहिंसा के पथ प्रदर्शक पैदा हुए हैं वहाँ इस तरह के अमानवीय कृत्यों से दूरी बना कर रखना ही श्रेयस्कर होगा ख़ास तौर से तब जब उन जंतु विशेष की प्रजाति पर विलुप्तता का ख़तरा मंडरा रहा हो। सादर प्रणाम।

के द्वारा:

संतोष जी आप ऐसा न कहें, हालांकि मै इस काबिल तो नहीं कि किसी की विशेषताओं का विश्लेषण कर सकूं पर मेरा मानना है कि हर इंसान बुद्धिजीवी होता है और उसमें बहुत क्षमता होती है| बस इतना है कि ये मैन टू मैन वैरी करता है कि वो अपने चरित्र का कौन सा पहलू एक्सपोज करता है| आपने स्वयं लिखा भी है.....मेरे विचार से सब संवेदनशील होते हैं ,..रूचि के विषय अलग अलग हो जाते हैं.... आपने ब्लागिंग का नशा होने का जिक्र किया है तो वो शुरू-२ में सबके साथ होता है....इसका जिक्र मैंने अपने लेख 'बुरा मानो या भला' में भी किया था| फिर भी चाहे कुछ भी हो ये एक सार्थक और रचनात्मक क्रिया तो है| इस मंच के माध्यम से हम अपना सन्देश, अपने विचार देश-विदेश के बहुत से लोगों तक तो पहुंचा ही पा रहे है| और यकीन मानिए इसका इम्पैक्ट भी होता है| आपकी भावनाओं के लिए धन्यवाद|

के द्वारा:

आपकी पारखी नजरों से तो कुछ भी बच नहीं पाता है| आपने पिछली बार भी इस पोस्ट पर बड़ा सार्थक और जानकारी बढ़ने वाला कमेन्ट दिया था| आपने इन निर्दोष जानवरों के प्रति अपनी संवेदना जिस प्रकार प्रकट की है वो आपकी पहचान है| रही बात अफ्रीकी नस्ल के हाथी की फोटो की तो आपकी बात सही है| ये फोटो केवल इसलिए डाली थी की तस्कर का मतलब लोगों को समझा सकूं| लेख की शुरुआत में ही मैंने लिखा भी है-...... टस्कर का अर्थ होता है-गजदंतों वाला| विशेषकर अफ्रीका के सभी हाथी चाहे वह नर हो या मादा, टस्कर ही होते है........ वैसे भी अगर मैं इस असली हाथी की तस्वीर खींचने जाता तो इस लेख को कौन लिखता भला? इसलिए नेट से ये फोटो ले ली| रही बात मेरे ब्लॉग अवतार की तो जैसा की मैंने पहले भी कहा है की यहाँ पर मुझे कोई नाम नहीं कमाना है, बस सार्थक सन्देश देने की कोशिश है| आप जैसे कुछ पुराने लोग जानते हैं कि मैं कौन हूँ, और लोगों को मैं अपनी पहचान नहीं, सन्देश देना चाहता हूँ| इसलिए कृपया "राज" को राज ही रहने दें| और कृपया आपने को वयोवृद्ध कहकर हमारे आदर्श देवानंद जी का अपमान न करें| आपके विचारों में अभी भी २५ साल के नौजवान की सी शोखी और शरारत है| आपने श्रद्धेय गोपाल प्रसाद व्यास जी की वो कविता तो पढ़ी ही होगी- हाय न बूढा कहो मुझे तुम, शब्दकोष में प्रिये और भी बहुत गालियां मिल जाएंगी ..... क्या कहती हो दांत झड रहे, अच्छा है वेदान्त आएगा, दांत बनाने वालों का भी, अरी भला कुछ हो जाएगा...

के द्वारा:

आपका अन्त में दिया गया सुझाव ही रामबाण विकल्प है राजेंद्र जी । बड़े हर्ष का विषय है कि आपने एकबार फ़िर अपने इस दस्तावेज़ी प्रस्तुतिकरण के माध्यम से सीधी सच्ची भाषा में अपना प्रकृति एवं जन्तु प्रेम ज़ाहिर किया । हाथियों का प्राकृतिक कारीडोर जो उनका पुश्तैनी आवागमन का मार्ग हुआ करता था, हर जगह आबादी बसाकर हमने उजाड़ दिया है, जिसका बदला हाथी हर जगह कन्फ़्यूज्ड होकर मनुष्य से ले रहे हैं । झारखंड का भी यही हाल है । कई उन्मत्त हाथियों को पहचान के लिये 'लादेन' जैसे नाम देकर अन्त में उन्हें मार डाला गया । है तो यह मानववादी अत्याचार ही, इसमें कोई संदेह नहीं है । लेकिन आपने ऊपर जिस टस्कर की तस्वीर दिखाई है, वह तो अफ़्रीकी नस्ल के हाथी की है । उसका झुन्ड यहां कहां से बन गया । क्या यही वह टस्कर है ? कृपया ज़रूर स्पष्ट करें । उस बड़े गोलाकार कान वाले हाथी के अतिरिक्त आपकी शेष हाथियों की तस्वीरें भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ी प्रजातियों की हैं । कहीं आप भी 'मस्त' तो नहीं हो गए ? कल ही आपको कहीं पानी में घुसकर ठंडाते देखा था । थोड़ी शंका इसलिये भी हो रही है, क्योंकि आपने अपने ब्लाग अवतार की भी चिंदियां फ़ाड़कर मदहोशी में उसे चिरकुट जैसा बना डाला है । इस वयोवृद्ध को यदि भ्रम हुआ हो तो क्षमा करेंगे, परन्तु आज आपकी फ़ोटू देखकर मुझे लैला-मजनूँ का ॠषिकपूर याद आ गया । यानि 'चाक़ गिरेबां…… खाक़ बसर' ! धन्यवाद ।

के द्वारा:

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

प्रिय राजकमल जी ….आपको भी नमस्कार+शुक्रिया +आदर सहित अभिनन्दन और आभार| ये तो आपकी विनम्रता ही है हुजूर की आपने ही इस बन्दे को जुबली कुमार बना दिया .......इस उपाधि के बाद अब फीचर्ड की तो फिर बात ही क्या है| वैसे तो आप जानते ही हैं की कार्य की अधिकता और जिम्मेदारी बढ़ जाने के बाद जेजे के लिए समय कम है, पर बासी कढ़ी भी छौंका लगा के और राजकमलिया कमेन्ट के तडके के बाद खूब स्वाद देगी, इसका मुझे यकीन है| मुझे पता है की जेजे पर आपकी सक्रियता का जवाब नहीं है और आप जैसे ही कुछ और जागरूक लेखक/पाठक इस ग्रुप में जागरूकता और जीवन्तता बनाए रखते हैं| मेरे पिछले लेख पर जितने लोगों ने रेटिंग दी उतनी रेटिंग मुझे इससे पहले अपने किसी भी लेख पर तब भी नहीं मिली थी जब मैं खूब सक्रीय था| इससे इस प्लेटफार्म पर लोगों की जागरूकता का पता चलता है| समय की कमी की वजह से किसी को न तो प्रतिक्रिया दे पाता हूँ और न ही अपने लेख पर प्रतिक्रिया का जवाब दे पाता हूँ, पर इस लेख पर दो दूनी चार और चार दूनी आठ भी करना पड़े तो करूंगा क्योंकि मैं चाहता हूँ की लोग इस विषय पर गंभीरता से सोचें| नये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की कॉमन बधाई दे कर आप बच नहीं सकते, जब भी त्यौहार आएगा मैं आपको और आप मुझे बधाई देना| ईश्वर आपको यूंही प्रसन्न बनाए रखे| धन्यवाद|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

प्रिय राजेन्द्र जी, सस्नेह, सादर वन्देमातरम| अश्विनी जी के इस लेख को मंच पर रखके आपने बहुत बड़ा उपकार किया है|हमारा देश आजाद भी नहीं हुआ था, इसके पहले ही इसके विभाजन की रुपरेखा बन गयी थी|१० फीसदी से भी कम सहभागिता वालो ने भारतीय उपमहाद्वीप को लगभग एक चौथाई काटकर रख दिया|रही सही कसर चाचा के लचर नेतृत्व और बापू की समझौतावादी कुत्सित राजनैतिक विचारधारा ने पूरी कर दी|भारतीय महाकाश में उगने वाले मार्तंड और शशि को इन दोनों राहू केतुओं ने ग्रस रखा है|बरगद के नीचे कोई भी पौधा नहीं उगता किन्तु सुखद छाया की अवश्य प्राप्ति होती है|इनके तले न तो कोई पौधा उग पाया और न ही छाया की प्राप्ति हो सकी|...जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

के द्वारा:

के द्वारा:

सम्माननीय चन्द्रजीतजी, अबोध भाई, विजेन्द्र जी, संतोष जी, भरोदिया जी, आकाश भाई, मनोज जी.....आप सभी का शुक्रिया कि आप जैसे बुद्धिजीवी लोग मेरी तुच्छ रचनाओं को पढते हैं और प्रतिक्रिया भी देते हैं,.....मैंने हालांकि प्रतिक्रियाओं के जवाब देना बंद कर दिया है क्योंकि इससे मित्रों में तल्खी बढ़ने लगी थी.....पर कभी-२ आप लोगों की भावनाए चुप्पी तोड़ने पर मजबूर कर देती हैं| संतोष भाई, आप की प्रतिक्रियाएं आपके मित्रवत स्नेह की पहचान हैं, ....अबोध जी तो मुझे आसमान पर पहुंचा देते हैं,....भाई आकाश तिवारी जी से बहुत समय बाद संपर्क हुआ, बड़ी खुशी हुई........और आप लोग ये न समझें कि मैं आपकी रचनाएं पढता नहीं, बस कमेन्ट करने से बचने लगा हूँ,...उम्मीद है कि आप बुरा नहीं मानेंगे.....आप सभी साथियों का हार्दिक धन्यवाद...

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

मेरा तो सुझाव है कि जैसे ही कोई नया ब्लॉगर जेजे पर ज्वाइन करता है उसे शाही जी की रचना ‘टॉप ब्लॉगर’ इंस्ट्रक्शन मैनुअल के तौर पर पढ़ने को देनी चाहिये जिससे कि वो बकरा न बन पाए| चलते-चलते यही कहना चाहूँगा कि प्रतिक्रियाएं करते समय अपने विचार जरूर व्यक्त करें पर अपनी भावनाओं पर भी काबू रखें| ये संभावना जरूर लेकर चलें कि आपकी भाषा किसी को भी आहत कर सकती है विद्वान् श्री राजेन्द्र जी यह आपके लेखन की विशिष्टता है या आपकी पोस्ट को पढने की मेरी जिज्ञाषा की मुझे अपलक { बिना पलक झपकाए ] सारा लेख कई बार पढना पड़ता है | आपने आत्मीय श्री शाही जी की रचना का जिक्र किया है | उनके लेखन का निराला अंदाज बहुत कुछ सीखने का अवसर देता है | व्यक्तिगत रिश्तो में भी उनकी गरिमा ,सहजता व संवेदनशीलता के कई ज्वलंत उदहारण मुझे देखने को मिले है | मेरा इस मंच के सभी सम्म्मानित ब्लागरो से यह अनुरोध है की श्री राजेन्द्र जी की इस पोस्ट को स्वयम पढ़े व इसके लिंक को उन लोगो तक भी पहुचाये जो ब्लागिंग करते है या करना चाहते है | बहुत बहुत बधाई ५\५

के द्वारा:

भईया, आपकी आज की बातें अक्षरशः सहमत कर रही हैं मुझे। किसी भी लेख में व्यक्त विचार उस ब्लॉगर विशेष के व्यक्तिगत विचार होते हैं। उससे सहमति या असहमति होना स्वाभाविक है वो चाहे आंशिक रूप में हो या पूर्ण रूप में। आप ही के पीछे-पीछे मैंने भी इस यथार्थाभासी दुनिया में क़दम रखा था और मैं यहाँ के रवैयों और चालचलन से पूर्णतया अनभिज्ञ था। मुझे केवल पोस्ट करना आता था और उसके नीचे की प्रतिक्रियाएं पढ़ना। शनैः-शनैः आपके कथनानुसार मैं उस भट्ठी में तपा और सारी तिकड़मबाज़ियाँ सीख गया और एकाध अवसरों पर उनका प्रयोग भी किया पर अंततः समझ आ गया कि गीतोपदेश का अनुकरण करते हुए अपने परम धर्म अपने कर्म को अंजाम देते रहो और फल की चिंता न करो। रही बात प्रतिक्रियाओं की तो चाहे किसी भी हद तक असहमति हो, विरोध करना भी हो तो शिष्ट भाषा में करें, मर्यादा के भीतर रह कर करें तो वो न सिर्फ़ हमारी लेखन की कला का बेहतरीन मुज़ाहिरा पेश करेगी बल्कि हमारे अच्छे इंसान होने की बानगी भी होगी। हमें याद रखना चाहिए कि ये भी एक सामाजिक मंच है और सामाजिक आचरण की सीमाओं का पालन करना ही हमारे, दूसरों के और इस मंच के हित में होगा। आभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

प्रिय वाहिद, सबसे पहले तो आपकी इस बात पर कि ....द्विदलीय प्रणाली किसी भी प्रकार से संभव नहीं है हमारे देश में.....मैं कहना चाहूंगा कि असंभव तो कुछ भी नहीं होता, किसने सोचा था कि ७४ वर्षीय अन्ना हजारे कहीं से आकर देश की सर्वोच्च संस्था संसद को अकेले दम पर झुका देंगे,...आने वाले समय में क्या होगा हम कैसे कह सकते है? आपकी दूसरी बात को तो मैंने भी कहने की कोशिश की है, कृपया फिर से पढ़ें- .....यदि देश में द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणाली संभव न हो तो कम से कम चुनाव आयोग ऐसे कड़े क़ानून बनवाए कि इस तरह की खरीद-फरोख्त, दल-बदल की संभावना ही खत्म हो जाय और ये राजनीतिक ब्लैकमेलिंग न हो| यदि दल-बदल पर ऐसा क़ानून बनाया जाय कि एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शामिल होने के लिए ३ या ५ साल से पहले अनुमति न मिले तो फिर देखिये कौन कोई पार्टी छोड़ता है और कैसे सौदेबाजी होती है? इसी तरह से मिली-जुली सरकार बनाने में भी ऐसे नियम बनाएँ जांय कि मंत्री सिर्फ प्रमुख पार्टी के ही बनाए जांय, कोटा सिस्टम न रहे....... रही बात शिक्षित लोगों के राजनीति में आने और घोटाले करने की तो उस पर मैं कहना चाहूंगा कि आप सभी लोगों ने इस बात को पकड़ कर बाल की खाल निकालना शुरू कर दिया है,...चूंकि आप लोग इस समय वही बात कह रहें हैं जो कि हमारे संविधान में भी है, इसलिए इस पर मैं बहस नहीं करना चाहता, पर व्यक्तिगत रूप से मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ| उत्तराखंड में आपसी खींचतान के चलते कुछ राजनीतिक दलों ने मिलकर एक निपट अनपढ़-गंवार दिहाड़ी मजदूर को चुनाव में खड़ा कर विधायक बनवा दिया, ये इस व्यवस्था का मजाक है...... आप और अन्य लोगों ने भी भ्रस्टाचार का सीधा-२ तात्पर्य घोटालों से लगाया है जबकि मेरा मानना हे कि घोटाले भ्रस्टाचार के कई रूपों में से एक रूप है| इसीलिये सांसदों के आचार-व्यवहार को भी लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात की जा रही थी| क्या इस लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर लालू जैसे गंवार, बिहार के कई कार्टून, शरद यादव जैसी भाषा बोलने वाले लोग जो कार्टूनपंती करकर लोगों को हंसाते रहते है, समय-समय पर जूत-पत्थरम करते है, वो भ्रष्टाचार नहीं है? क्या सिर्फ घोटाले करना ही भ्रष्टाचार है? क्या ये नौटंकी और हंसी-ठट्ठा करने के लिए उनको संसद में भेजा है जनता ने? शरद यादव ने सदन में लंबा-चौड़ा भाषण दिया और सारे सांसद हँसते रहे, यहाँ तक कि उनका समय समाप्त होने पर भी अन्य सांसद उन्हें और बोलने के लिए प्रेरित करते रहे और वे लोगों को हंसाते रहे| अगर इन लोगों ने कोई घोटाला नहीं किया तो क्या इनका आचार भ्रष्ट नहीं है? कृपया शब्दों को सही समझें, मेरे पूरे लेख में भ्रस्टाचार और सदाचार/नैतिकता की बात है, घोटालों की नहीं| यदि भ्रष्ट आचरण सुधार लिया जाय तो घोटाले अपने-आप ही नहीं होंगे, यही मैं कहना चाहता था| और यदि आपको (और कुछ और लोगों को भी) लगता है कि पढ़े-लिखे लोग घोटाले भी बड़े करेंगे तो क्यों नौकरियों में पढ़े-लिखे लोग ले रहे है? क्यों मंत्रालयों में आई ए एस सचिव रखे हुए हैं? क्योंकि सरकार यही लोग चलाते हैं, मंत्री तो आते-जाते रहते हैं पर सचिव वही रहते हैं......आपकी बात अगर सही है तो सदन में सारे अनपढ़ बिठा दिए जांय और घोटाले होंगे ही नहीं| ये तुलना हास्यापद है.....

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

भईया, आपको स्पष्टीकरण देना मेरा कर्तव्य है पर आपके संबोधन पर मुझे आपत्ति है| द्विदलीय प्रणाली जिसकी आप हिमायत कर रहे हैं वो किसी भी प्रकार से संभव नहीं है हमारे देश में| हाँ उसके स्थान पर ये हो सकता है कि बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उग आये राजनीतिक दलों को जो राजनीती कम और सौदेबाज़ी ज़्यादा करते हैं उन पर रोक लगे और केवल चार या पांच प्रमुख दल ही हों| हमारे देश को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है पर यही बड़ा होना उसकी सबसे बड़ी विडम्बना साबित हुआ है| और पढ़े लिखे तथा युवाओं को राजनीती में आने की जो बात आपने कही है मैं उसमें एक संशोधन करना चाहता हूँ कि जिस प्रकार किसी भी उच्च स्तरीय सरकारी पेशे में आने के लिए प्रतियोगी परीक्षा होती है तो राजनीतिज्ञों के लिए क्यूँ नहीं हो सकती| जो उस परीक्षा में खरा उतरे वो ही लोक या विधान सभा का चुनाव लड़ने का पात्र माना जाए| भले उसकी शैक्षिक योग्यता कुछ भी हो| सिर्फ़ पढ़े-लिखे लोग ही देश को संवार सकते हैं ऐसा सोचना अनुचित होगा, क्यूंकि अनेक लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और लगन के बूते अपने कार्यक्षेत्र में बड़ा नाम किया है| जाहिल तो छोटे-मोटे घोटाले ही कर सकता है मगर उच्च शिक्षित लोग केवल उच्च स्तरीय घोटाले ही करेंगे ये तय है| कुछ समय पूर्व ही अमेरिका से लौटे एक दंपत्ति में तकरार हुई और उच्च शिक्षित पति ने कैसे पत्नी के टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे ये आप को भी याद होगा| आशा है आप मेरा तात्पर्य समझ गए होंगे और संदेह के बादल छंट गए होंगे| साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

आदरणीय राजेंद्र जी ,.सादर नमस्कार आपने मेरी प्रतिक्रिया पर अपने विचार रखे ,..आपका हार्दिक धन्यवाद ,..पहली बात मैं अल्पबुद्धि जीवी हूँ ......इसलिए आपका मंतव्य नहीं समझ सका ... क्षमा चाहता हूँ ,..मैं अन्ना भक्त नहीं हूँ ,..सिर्फ समर्थक हूँ ,...मैंने एक बात लिखी थी शायद आपने ध्यान नहीं दिया ." ये मामला अविश्वास का है ,..मैं तीन नहीं कमसे कम ५३ लोगों से बात कर चूका हूँ ,.. ....नैतिकता सामने वाले को देखकर होती है ,...सामने वाले से मेरा मतलब व्यवस्था से है .....हमारे सामने सत्ता प्रतिष्ठान करोंडो लूट रहे हों ,..और हम कहें कि हम प्यासे रहेंगे लेकिन नल लगवाने के लिए २०० रुपये नहीं देंगे,..हम आम लोग हैं किसी को नोच नहीं सकते .,...सिर्फ भड़ास निकाल सकते हैं ..रही बात गांधीवादी अन्ना के साथ जुड़ने की तो मैं मानता हूँ कि ,...न मैं अन्ना न तू अन्ना सारे देश में एक ही अन्ना ,..यह एक लहर है जिसका पानी कहीं और से आया ,...जश्न के इस माहौल में मैं अभी भी निराश हूँ ,..कुछ कारण हैं ...फिलहाल अभी तक IAC को पूरा समर्थन है और जनलोकपाल पारित होने तक रहेगा,.... बाकि आपके विचारों का मैं तहे दिल से सम्मान करता हूँ ,......अमेरिका की हालत क्या है सब जानते हैं ? ....मैं ग्रेजुएट नहीं हूँ ,..भ्रष्ट कोई भी हो सकता है ,...सारे IAS सेलेक्शन के बाद देश सेवा के लम्बे चौड़े प्रवचन देते हैं,....काम मिलते ही असली काम में लग जाते हैं ,....आपसे एक प्रार्थना है ,.. आपकी जिन बातों से मेरी सहमति है कृपया उनको जरूर ध्यान से पढ़े ,....सादर आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

राजाओं के भी श्रेष्ठ इंद्र जी सादर प्रणाम ! डायरी के अंदाज़ में भी बड़ी सधी बातें कह डालीं, अज़ब इत्तफ़ाक़ ही है । जनता कई बार इसी स्टाइल में सोचती है, अत: आपके आलेख को जनवाणी कहना भी मेरे विचार से कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का दर्ज़ा खुद संविधान ने दिया है, तो उसकी आंखें यदि देर से ही सही, अपनी ज़िम्मेदारियों के सापेक्ष खुली हैं, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिये । यह तो आपने भी माना है कि हमारे देश में लोकशाही की खाल में राजशाही शासन चला रही है । वैधानिक खाल ओढ़े इस अवैध शासन को उखाड़ फ़ेंकना समय की ज़रूरत है, और मीडिया उसमें बेहतर योगदान हेतु अब खुद को आगे कर चुका है । टीआरपी की भी यदि बिल्कुल नहीं सोचेगा, तो आखिर खाएगा क्या ? घोड़े को ज़िंदा रहने के लिये घास से दुश्मनी करनी ही पड़ती है । साधुवाद !

के द्वारा:

राजेन्द्र जी, 1.   आपने स्पष्ट रुप से लिखा है  "कि यदि राजनीति में पढ़े-लिखे और युवा लोग हों तो भ्रष्टाचार भी कम हो जाएगा" 1. क्या घोटाले करना भ्रष्ट आचार की श्रेणी मे नहीं आता? घोटाला ही भ्रष्टाचार है ऐसा तो मैने भी नहीं कहा.  घोटाला भी  भ्रष्टाचार है यदि ऐसा मानते हैं तो मेरा प्रश्न यथावत है. 2.जिस सरकार को अपने कुर्ते की उघड़ी सिलाई दुरुस्त करने मे 40 साल लग गये, उस सरकार से   नया कुर्ता बनवाने की अपेक्षा करना कितना व्यावहारिक है.    (एक कानून 40 साल से प्रतीक्षा मे था , जनता के दबाव  में अब शायद बन जाये,)    (संविधान संसोधन के लिये दो तिहाई मतों की आवश्यकता होगी,मुठ्ठी भर संसदो को ले कर सैदेबाजी करने     वाले क्या अपने अस्तित्व को मिटाने के पक्ष मे मत करेंगे?) 3."चलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर समाज नैतिकता से चलता है और व्यवस्था नियम कानून से चलती है तो बताइये कि व्यवस्था और नियम कानून किसके लिए हैं?……समाज के लिए ही न" नैतिकता से समाज बनता है, समाज के हित के लिये व्यवस्था बनती है और  व्यवस्था को अच्छा बनाने के लिये नियम-कानून.   यदि  नैतिकता का बोल-बाला  हो जाये तो फिर समाज मे सुख-शान्ति होही जायेगी,                व्यवस्था की  कोई आवश्यकता नही होगी, और व्यवस्था नहीं तो कानून का क्या अर्थ. श्रीमान, आप तो बहुत आगे निकल गये. आपके गावश्कर को अम्पायर के इशारे की जरुरत नही है            मतलब आपकी टीम को अम्पायर की जरुरत नही. ओह क्षमा करें,   भ्रष्टाचार एवं व्यवस्था के मुद्दे पर मै अपनी सोंच व्यावहारिक रखना चाहता हूँ.काल्पनिक नहीं. !!!! मेरी प्रतिक्रिया पर ध्यान देने के लिये धन्यवाद, !!!! !!!! आन्दोलन की आंशिक सफलता पर आपको भी हार्दिक बधाई !!!!

के द्वारा: ajaysingh ajaysingh

आदरणीय संतोष जी नमस्कार, ये मेरी ही कमी है कि मैं बुद्धिजीवियों को समझा नहीं पाया कि मेरी ड्रामेबाजी का तात्पर्य क्या है? मेरा मानना है इस घसड-पसड भरी ब्लॉग्गिंग में शायद ही कोई किसी लेख को ध्यान से पढता होगा, क्योंकि यहाँ पर पाठक तो हैं ही नहीं, सारे लेखक ही लेखक हैं| बताइये मैंने कहाँ लिखा है कि ७४ वर्षीया अन्नाजी १२ दिन से भूखे रहकर ड्रामा कर रहे हैं| मेरा इशारा तो लोकपाल बिल को लेकर टीम अन्ना, अरुणा और सरकार के लोकपाल के बीच इतने दिनों से चली आ रही खींचतान और नेताओं द्वारा की जा रही ड्रामेबाजी की ओर था| आपने कहा कि जन लोकपाल को सब समझते हैं ( कम ही सही ) लेकिन समर्थन जरुर देता है चाहे उसके अंदर से पामेला एंडरसन निकले चाहे राखी सावंत | चलिए आप ही सही है, आप अपनी ओर से अपने तीन बेस्ट बंदे चुनकर उनसे पूछिए कि लोकपाल बिल क्या है? फिर देखिये कि उसमें से पामेला एंडरसन निकलती है या राखी सावंत| ईश्वर करे कि आप सही हों और उसमें से अन्ना हजारे ही निकलें | आपने कहा कि नैतिकता सामने वाले को देख कर होती है| मुझे अफ़सोस है कि आपकी नैतिकता आपके सामने वाले घर पर टिकी है| आपके अपने ही शब्दों में “यथा राजा तथा प्रजा” की तर्ज पर जो आपको नोंच कर खा रहे हैं, आप भी उनको नोंचकर खाइये, फिर गांधीवादी अन्ना के साथ क्यों जुड़े हैं? आपने कहा कि सभी घोटालों के कर्णधार ग्रेजुएट हैं, क्या आप ग्रेजुएट नहीं है? क्या आप अपने बच्चों को ग्रेजुएट नहीं बनाना चाहते या उन्हें सिर्फ ढाई आखर प्रेम का पढाकर पंडित बनाना ही काफी रहेगा क्योंकि डाक्टर, इन्जीनियर और ग्रेजुएट तो भ्रष्ट हैं| आपकी आख़री बात पर रिपीट कर रहा हूँ| द्वि-दलीय प्रणाली मेरे दिमाग की उपज नहीं है| इसकी अवधारणा भी किसी अक्लमंद आदमी ने ही रखी होगी और विश्व का सबसे मजबूत देश अमेरिका इसे अपनाता है| मुझे अच्छा लगा तो मैंने लिख दिया| मैं पार्टियों में एक या दो व्यंजन ही लेता हूँ , इससे ज्यादा मेरी तबियत खराब कर देते हैं, लेकिन इस देश के अधिकांशतः लोग अपनी प्लेट में ज्यादा से ज्यादा भरने की कोशिश करते हैं, भले हफ्ते भर तक उनकी तबीयत खराब रहे| अपना-अपना हाजमा है भाई|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

अजय जी, सबसे पहले तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं कोई बहुत बड़ा लेखक या विचारक नहीं हूँ बस कुछ कहने का मन होता है तो कह देता हूँ| अब रही बात मेरे कई गज लंबे लेख और मेहनत की तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैंने आज तक कभी भी लेख लिखने में मेहनत नहीं की और न ही कभी लेखों की लम्बाई मापने की कोशिश की| मेहनत करते हैं वो जो इधर-उधर से ढूँढ कर कापी पेस्ट कर लेख बनाते हैं| मैं तो वही लिखता हूँ जो मेरे भेजे में होता है, जितनी कि मेरी बुद्धि है| मुझे ये भी पता है कि मैं दुनिया का सबसे होशियार आदमी नहीं हूँ कि जो कहूँगा, वो ही सही होगा, एक सामान्य बुद्धिधारी होने के कारण मैं भी गलत हो सकता हूँ| हो सकता है कि आपने मेरा लेख ध्यान से पढ़ा हो, पर मुझे नहीं लगता| आपने सवाल किया है कि क्या देश में जो घोटाले हुए हैं उन घोटालों को करने वाले अशिक्षित हैं ? मैंने तो अपने कई गज लंबे लेख में किसी भी घोटाले का जिक्र ही नहीं किया| लगता है आपकी नजरों में घोटाला ही भ्रष्टाचार है| मुझ कमअक्ल के हिसाब से तो भ्रष्टाचार की परिभाषा है भ्रष्ट आचार, और अपने लेख में मैंने केवल इसी आचार और आचरण पर ही जोर दिया है| मेरे नजरिये में भ्रष्टाचार सिर्फ घोटाला ही नहीं बल्कि सभ्य आचरण के विपरीत जो भी किया जाय वो सब भ्रष्टाचार में आता है| अब रही बात एमएम सिंह साहब की तो अगर आपने लेख ध्यान से पढ़ा हो तो उसमें मैंने कैप्टेन सिंह का जिक्र किया है और वही बात कहने का प्रयास किया है जो आप कह रहे हैं| एक बात और कि लोग कहते है कि एमएम सिंह बहुत पढ़े लिखे और ईमानदार हैं तो सोनिया इनके ऊपर क्यों हैं? क्या वे एमएम सिंह से ज्यादा पढ़ी-लिखीं और ज्यादा ईमानदार हैं? ऐसी कौन सी विशेष शैक्षिक योग्यता है इनके पास जो इनसे ज्यादा किसी के पास नहीं है? आपकी दूसरी बात में बात आती है लोकपाल के ड्रामे की तो शायद सभी लोग इस शीर्षक से भ्रमित हुए| मैंने कहीं भी लोकपाल बिल को ड्रामा नहीँ कहा बल्कि मेरा इशारा इस को लेकर टीम अन्ना, अरुणा और सरकार के लोकपाल के बीच इतने दिनों से चली आ रही खींचतान और नेताओं द्वारा की जा रही ड्रामेबाजी की ओर था| रही बात द्वि-दलीय प्रणाली की तो वो मेरे दिमाग की उपज नहीं है| इसकी अवधारणा भी किसी अक्लमंद आदमी ने ही रखी होगी और विश्व का सबसे मजबूत देश अमेरिका इसे अपनाता है| मुझे अच्छा लगा तो मैंने लिख दिया| मैं पार्टियों में एक या दो व्यंजन ही लेता हूँ , इससे ज्यादा मेरी तबियत खराब कर देते हैं, लेकिन इस देश के अधिकांशतः लोग अपनी प्लेट में ज्यादा से ज्यादा भरने की कोशिश करते हैं, भले हफ्ते भर तक उनकी तबीयत खराब रहे| अपना-अपना हाजमा है भाई| आपकी आख़री बात तो self-explainatory है- व्यवस्था नियम कानून से चलती है नैतिकता से नही…। समाज नैतिकता से चलता है. चलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर समाज नैतिकता से चलता है और व्यवस्था नियम कानून से चलती है तो बताइये कि व्यवस्था और नियम कानून किसके लिए हैं?......समाज के लिए ही न?

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

सम्मानित पाठकवर्ग और सभी ब्लाग्गर्स, सबसे पहले तो समस्त देशवासियों को बधाई कि लोकपाल बिल पर अन्ना के तीन मुख्य मुद्दों को लोकसभा में सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया है, यांनी कि आधी लड़ाई जीती जा चुकी है| वैसे तो मैंने प्रतिक्रिया करना और प्रतिक्रियाओं के जवाब देना बंद कर दिया था, क्योंकि मैं दो के चार और चार के आठ कर देने के इस खेल से ऊब गया था| ज्यादा चर्चित या पठित होने के लिए ब्लोगरों की मारा-मारी और प्रतिक्रियाओं में बढ़ती तल्खी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्द्धा और अप्रिय होते माहौल की वजह से मैं ब्लॉग्गिंग से ४-५ माह से दूर था और अभी हाल ही में वापसी की है| इस लेख पर प्रतिक्रियाओं के जवाब दे रहा हूँ तो इसके कुछ अहम कारण है| एक तो यह इस समय देश का सबसे चर्चित मुद्दा है, दूसरे आप जैसे बुद्धिजीवियों ने न केवल मेरा लेख पढ़ा बल्कि इसका विश्लेषण करने की भी कोशिश की| सच कहूँ तो मै आप लोगों का शुक्रगुजार हूँ|

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

आदरणीय राजेंद्र जी ,नमस्कार ..काफी मेहनत से आपने बढ़िया लेख लिखा ,..कुछ बातें कम समझ आयी ...शीर्षक तो बिलकुल नहीं . ७४ वर्षीया अन्नाजी १२ दिन से भूखे हैं ,,आपको ड्रामा लगता है ??.. अपने विचार रखने की आज्ञा चाहूँगा 1- हर आदमी भ्रष्टों को सजा चाहता है ,..जन लोकपाल को सब समझते हैं ( कम ही सही ) लेकिन समर्थन जरुर देता है चाहे उसके अंदर से पामेला एंडरसन निकले चाहे राखी सावंत ,...ये मसला अविश्वास का है २-नैतिकता सामने वाले को देख कर होती है ,...यह वही देश है जहाँ आज भी रिक्शावाला पूरा दिन एक घर ढूँढता है ,.जिसका सामन उसके रिक्शे में छूट गया था.."यथा राजा तथा प्रजा" हुक्मरान हमें नोचकर खाए और हम नैतिक पाठ पढ़ें ....मजा नहीं आया सर ....हमारा कैप्टन तो गुलाम परंपरा का ध्वजवाहक बन गया है ३-भारत में ग्रेजुएट कितने हैं ???? शायद २%से भी कम ,...तो लोकतंत्र का क्या होगा?? ...सभी घोटालों के कर्णधार ग्रेजुएट हैं .. ४- दो दलीय प्रणाली भारत के लिए नामाकूल है ,..जब हम दस चोरों में से कम चोर नहीं ढून्ढ पाते तो दो डाकुओं में एक का ............????????????? सभी चोरों को आइना दिखने के लिए कठोर कानून होना चाहिए ,..पूर्ण पारदर्शिता से इलाज हो सकता है ,.... आन्दोलन वास्तव में नाजुक मोड़ पर है ,....सबको समझाना होगा ,...ये भ्रष्ट, आपराधिक नेता चमचे कुछ भी कर सकते हैं ,.....संसद में चर्चा जारी है,..शायद कुछ रास्ता मिल जाये ...सादर आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

राजेंद्र जी, नमस्कार! उत्तम प्रस्तुति के लिए बधाई,एवं धन्यवाद. मैं सिर्फ यही जोडूंगा, पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर 'प्रेम' का पढ़े सो पंडित होय. पर आजकल प्रेम का मतलब क्या है यह भी आप और हम अच्छी तरह जानते हैं. सभी अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लगे हैं. एक इमानदार आदमी मदत है तो मरने दो! संसद में शोक मनाकर एक दिन और छुट्टी कर लेंगें. संसद की अपनी गरिमा और नियमावली होती है, और इस गरिमा और नियमावली की धज्जियाँ उड़ते हुए भी हम सबने देखा है. अब तो ऐसा लगने लगा है की संसद एक रंगमंच है और सभी सांसद उसके किरदार और यहाँ पर एक्ट करने से पहले रिहर्सल कर के आते हैं. तभी तो आज अपराह्न में उन तीन मुद्दे पर चर्चा शुरू होने से पहले हंगामा हो गया और संसद को स्थगित तक कर देना पड़ा. वही जब अन्ना को अनसन तोड़ने के लिए मीरा कुमार (अध्यक्ष महोदया) अपने असं से खड़ी हो गयीं. सुषमा जी ने भी अपनी भूमिका को सही ढंग से निभाया. पर सर्वदलीय बैठक और इफ्तार पार्टी में क्या हुआ यह भी पूरे राष्ट्र ने देखा.

के द्वारा:

राजेन्द्र जी,   कई ग़ज लम्बा लेख लिखने मे मेहनत तो लगती ही है लेकिन इसमे कुछ काम की बात भी करने की कोशिश ठीक बन पड़ी है। लेकिन..... 1.क्या देश में जो घोटाले हुए हैं उन घोटालों को करने वाले अशिक्षित हैं? PM स्वयं उच्च शिक्षित होने का साथ-साथ रिज़र्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके है. उनके आफि़स की रज़ामन्दी से ही करोड़ो के घपले उनकी नाक के नीचे (दिल्ली मे) हुए,  या तो वो खुद बेईमान और चोर हैं या उनमे चोरी बेईमानी  रोक पाने बूता नही है. जो भी हो पर मुझे इतना यकीं है कि उनकी आत्मा मर चुकी है वर्ना वो अब तक  राजनीति से सन्यास ले चुके होते. (शिक्षा का प्रभाव कहाँ गया........?) 2. एक कानून तो 40 वर्षों से संसद के गलियारे मे संसद की गरिमामयी    प्रक्रिया द्वारा भटकाया जा रहा है, उसके लिये लाखों-करोंड़ो जनता सड़को पर उतर  आयी है (जिसे आप जैसे विचारक भी ड्रामा समझ रहे हैं ) फिर भी परिणाम सामने है. और आप संविधान की मूल संरचना मे ही परिवर्तन की हिम्मत कर रहे हैं दो-दलीय प्रणाली द्धारा.... ( आपको अपनी ही राय मे कितनी सम्भावना दिखायी देती है ?) 3.व्यवस्था नियम कानून से चलती है नैतिकता से नही...।   समाज नैतिकता से चलता है.

के द्वारा: ajaysingh ajaysingh

मालूम तो था कि आप देर-सबेर उसी रौ में वापिस लौटेंगे मगर अचानक से और यकायक.. एकबारगी यक़ीन करना मुश्किल हो रहा था पर नीचे गुरुवर की टिप्पणी पढ़ते ही फुलट्रुस यक़ीन आ गया क़सम गंगा मईया की। ये नोच-नुचउव्वल का कोटा अभी कोल्ड स्टोरेज में कुछ मात्रा में बचा होगा तब तो आगे भी काम आ जाएगा बस उसी महान युगान्तकारी अवसर की स्थिति बने तो। ढोल में पोल, ढोल पर खोल, और पोल को खोल का यह पुनीत कर्तव्य विशिष्ट अवसरों पर आनंददायक भी लगता है तो कभी विचित्र भी। ख़ैर, आपके इस बखिया उधेड़ लेख के प्रत्युत्तर में मैं भी अपनी औक़ात के छोटे से दायरे से छलांग मार कर बाहर निकल आया, इससे पहले कि कोई अनहोनी घटे मेरा अपने खोल में लौट जाना ही मुनासिब होगा।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

मेरी लुटिया डुबोने में कोई कसर तो नहीं छोड़ी आपने, लेकिन फ़िर भी लीजिये क्या याद करेंगे कि सचमुच के किसी गुरु से पाला पड़ा था, आपको नबर वन व्यंग्यकार का खिताब बिना किसी से इज़ाज़त लिये ही आज सौंप रहा हूं । करीने से संभालकर ड्राइंगरूम के ऐसे कोने में रखियेगा जहां घुसते ही किसी की भी नज़र बस वहीं टिक जाय । उफ़्फ़ ! क्या क्या तोहमत नहीं लगा डाली, बस शर्म और मेरे बीच एक झीनी सी झड़ी चादर मात्र बच गई है । सोचता हूं उसे भी नोंचकर बेपर्द ही हो जाऊं । आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि आपके दूसरे इष्ट विशिष्ट कहीं गए नहीं हैं, दीवार में विवर बनाकर रह-रह कर जायज़ा लेते हैं, झांकते हैं, फ़िर अन्तर्ध्यान होते हैं । इनकी कलाओं के आगे बदली के चांद और मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर भी पानी भरते से दिखने लगे हैं । मैं तभी से परेशान हूं कि आखिर फ़ीचर लिस्ट की आज की पोस्ट्स पर मेरी टिप्पणियां पब्लिश क्यों नहीं हो पा रहीं । अभी-अभी शम्भू जी के लेख पर बड़ी मेहनत से लम्बी टिप्पणी लिखकर पोस्ट की, तो इसपर भी 'You must be logged in to post a comment' ने मेरा मुंह चिढ़ाते हुए धता बता दिया । लटके मुंह के साथ उम्मीद लिये आपके पास आया तो आपने भी अच्छा आईना दिखा दिया । अब मुझे लग रहा है कि यदि मेरे बारे में आपकी राय इतनी उम्दा किस्म की है, तो हो न हो, शायद जागरण ने भी ऐसी ही कोई गांठ तो नहीं बांध रखी ? जांचना पड़ेगा इसको । खैर, तबतक तो ढिठाई के साथ बने रहना ही नैतिक होगा । बहरहाल, आप मोहल्ले और न जाने कहां-कहां की कन्याओं के साथ अपने मनपसन्द शगल में मस्त रहिये, यही दिली दुआ है । आपके डर से आपके इष्ट ने शादी का अपना इरादा फ़िलहाल बदल दिया है, आपको शायद इसकी जानकारी मुझसे पहले वाहिद काशीवासी ने भी नहीं दी होगी । अब खुद सोचिये कि आप क्या हैं, और मैं क्या हूं । भगवान जानता है कि मैंने हमेशा लोगों का घर बसाने का नेक कार्य किया है, उजाड़ने का नहीं । आपके ‘राँयल लोटस’ उर्फ़ श्री राजकमल जी शर्मा को मेरी यही कीमती सलाह होगी कि कहीं मामला फ़िट करने से पूर्व एक बार अपनी आस्तीन को भली भांति अवश्य झाड़ लें । मैं तो फ़िर भी धन्यवाद ही कहूंगा ।

के द्वारा:

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

आप सभी सम्मानित और विद्वान महापुरुषों का मैं ह्रदय से आभारी हूँ कि आप लोग मेरा मन रखते हैं, शायद आप नाराज भी होते हों कि मैं प्रतिक्रियाओं का जवाब नहीं दे पा रहा हूँ लेकिन आप लोग इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि यहाँ इस ब्लॉग पर हजारों लोगों के बीच कहीं किसी भी माध्यम से हम लोग आपस में जुड़े है.....मैं आप लोगों से क्षमा चाहता हूँ कि मैं प्रतिक्रियाओं से दूर रहना चाहता हूँ. न मुझे ज्यादा चर्चित होना है, न ज्यादा पठित होना है, न ही मुझे कोई पुरस्कार चाहिये ....बस विचारों की अभिव्यक्ति करना ही मेरा एकमात्र उद्देश्य है ...... अतः मैं आपके लेखों पर कमेन्ट न दे पाऊं या अपने लेख पर कमेन्ट का जवाब न दे पाऊं तो आप ये न समझें कि मैं आपके विचारों को सम्मान नहीं दे रहा ...........बस मैं इस सबसे दूर रहना चाहता हूँ..........पर हाँ कभी ये हो सकता है कि मैं चुप भी न रह पाऊं..... मुझे  पूरी उम्मीद है कि आप मुझे इसके लिए क्षमा करेंगे....... धन्यवाद....

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: दीपक पाण्डेय दीपक पाण्डेय

भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच है मोहाली में.. क्या यह संभव होगा की भारत के जितनें भी लोग मैच देखनें जायें वे पाकिस्तान की कर्तूतों के खिलाफ "काला रिबन" लगाकर अपना विरोध दर्ज करवायें.. उन्हें पता चलना चाहिये की भारत "नाराज" है...और मुंबई का जवाब मांग रहा है. इस विचार को सभी मित्रों तक पहुंचायें इस विरोध से पडोसी को कम से कम ये तो पता चल जायेगा की राजनैतिक चोंचले और होते है और जनता के विचार और. इसके अलावा हमारे समलैंगिक नेताओं को भी जनता के विचारों का पता चलेगा की जब हमे मुंबई याद है तो तुम कैसे भूल गए. दोस्तों इस विचार को ब्लॉग, एस एम् एस, फेसबुक, आर्कुट और way2sms.com के माध्यम से कोतदोपहर तक इतना घुमा दीजिए की मोहाली में हर भारतीय की बांह पर काला फीता हो.

के द्वारा:

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा:

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

भईया, आज इस पुनीत अवसर पर देश के वीर सपूतों को समर्पित आपका यह लेख कोटिशः प्रशंसनीय है। आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं और जो स्वच्छंद जीवन जी रहे हैं वह इन्हीं महानुभावों, शस्य-श्यामला भारत माँ के शूर सुपुत्रों की देन है। यदि आज वर्ष के इस एकमात्र अवसर पर भी हम इन्हें नहीं याद कर सके  तो ये हमारी कृतघ्नता होगी। यदि हम कुछ करने में अपने आप को अक्षम पाते हैं तो हमें प्रेरणा लेनी चाहिए इनकी महान गाथा सेजिन्होंने सीमित संसाधनों और अत्याचारी व दमनकारी शासन के विरुद्ध ऐसा बगावती बिगुल फूंका कि सम्पूर्ण देश में एकता की अलख एक लहर की तरह फ़ैल गयी और अंततः दुष्ट विभाजनकारियों को हमारे हाथों में सौंप कर यहाँ से अपना बोरिया बिस्तर समेत कर भागने पर मजबूर कर दिया। इन महान राष्ट्रभक्तों को पुनः नमन करते हुए आपको भी सर झुका कर वंदन इनका स्मरण करने हेतु। साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

मान्यवर अशोक जी, जितना हिंदी का मेरा सीमित ज्ञान है उस हिसाब से तो संभोग और सम्भोग में कोई अंतर नहीं है बस लिखने में ही अंतर है. अर्थात अन्दर लिखिए या अंदर, मंत्र लिखिए या मन्त्र अर्थ एक ही है. रहीए बात सम्भोग शब्द की तो बहुत आसान है जवाब. शब्द का इस्तमाल उसका अर्थ बता देता है. यदि मैं कहूं की हम प्रतिक्रियाओं (कमेंट्स) का सम्भोग (बराबर भोग) करें तो इसमें स्त्री पुरूष के संसर्ग काल की बात कहाँ से आ गयी. रही बात शर्म की और बोलचाल में खुलकर न इस्तेमाल करने की। तो आपको बताना चाहूँगा कि अगर आप बिहारी की रचनाओं को साहित्य की दृष्टि से पढेंगे तो आपको साहित्यिक आनंद आएगा और यदि उसके अर्थ आज के जमाने के हिसाब से लगायेंगे तो अश्लीलता नजर आयेगी. कृष्ण को चूंकि भगवान का दर्जा प्राप्त है इसलिए कृष्ण का रास भक्तिभाव जगाता है अन्यथा ये आज के जमाने में ये मार खाने के काम हैं. धन्यवाद आपकी इस बौद्धिक प्रतिक्रिया के लिए.

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

सेवा में, मान्यवर जी सादर अभिवादन, संभोग और सम्भोग में क्या अंतर है। इस पर गहनता पूर्वक मंथन करके फिर स्थिति स्पष्ट करने की कृपा करे।  जहां तक आपने शब्दों के इस्तेमाल में शर्म की बात कहीं, वह भी कुछ हद तक ठीक ही है।  लेकिन जब कोई शब्द किसी भाषा में प्रयोग में लाया जाता रहा हो, तो उसे किस अर्थ में  बोला गया है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।  एक अन्य खास बात यह है कि हिन्दी भाषा में हर शब्द के अपने अर्थ होते है। अंग्रेजी में तो एक शब्द के कई मायने हो सकते है।  हिंदी का शब्द है रतिक्रिया, इसका सीधा सा तात्पर्य है स्त्री पुरूष का मिलन। जबकि रतिक्रिया में जब भौतिक मिलन होता है, तो लिंग और योनि के बीच स्थापित संबंध में प्रवेश निकास की क्रिया  संभोग रत की हो कहलाती है।  परंतु हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो हर क्रिया के लिए अपना अगल शब्द्द रखती है। चकि हिंदी भाषा में संभोग को स्त्री पुरूष के संसर्ग काल को लेते है। बस यही समझ है शर्म की और बोलचाल में खुलकर न इस्तेमाल करने की। 

के द्वारा: journalistashok journalistashok