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राम तेरी गंगा के ठेकेदार मैले

Posted On: 7 Mar, 2011 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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“गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाय,

युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाय”

 

कल के दैनिक जागरण अखबार में एक खबर पढ़ी- ‘युकां ने किया गंगा तट शुद्धिकरण’. पढ़ कर बड़ी हंसी आई. कुछ दिन पहले युवा भाजपा नेताओं ने इसी गंगा तट पर शराब और कबाब की पार्टी कर अपना अशुद्धिकरण अभियान चलाया था. बचपन से गंगा तट पर रहता आया हूँ और इस पतित पावनी गंगा मैय्या को सतत बहते देखते आया हूँ. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसकी पावनता और शुद्धता का जिम्मा कुछ विशेष लोगों ने जिस तरह से संभाल लिया है, उसे देखते हुए तो लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब कि गंगा में नहाने का शुल्क भी अदा करना पड़े. गंगा तट पर पार्किंग शुल्क तो पहले से दे ही रहे हैं. तो कुछ विशेष लोगों का गंगा शुद्धिकरण अभियान और गंगा का राजनैतिक उपयोग पेशे खिदमत है.

 

१७ दिसंबर २००९ को ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने गंगा को उसके उद्गम से लेकर अंतिम छोर तक स्वच्छ करने के संकल्प के साथ रविवार को यहां “स्पर्श गंगा” अभियान की शुरूआत की. उदघाटन समारोह में एक से बढ़ कर एक महान हस्तियाँ मौजूद थी. इस अभियान के लिए फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी और अभिनेता विवेक ओबेराय को ब्रांड एम्बेस्डर बनाने की घोषणा की गई. निशंक ने तिब्बती धर्म गुरू दलाई लामा के साथ ही योग गुरू रामदेव से भी इस अभियान में समर्थन मांगा. ये दोनों महान हस्तियां भी यहां गंगा तट पर परमार्थ निकेतन में आयोजित समारोह में उपस्थित थीं. मुख्यमंत्री निशंक ने ईसाई पुजारी, फादर डोमिनिक के साथ ही स्वामी अग्निवेश को भी इस अभियान में आमंत्रित किया था. इस अवसर पर पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी  और भारतीय जनता पार्टी के कई अन्य नेता भी उपस्थित थे।

 

यह कार्यक्रम पूरी तरह से राजनैतिक यानी कि भाजपा का कार्यक्रम था क्योंकि इस कार्यक्रम में कांग्रेस या अन्य राजनैतिक दलों से जुड़े लोग उपस्थित नहीं थे. यानी कि अगर गंगा को स्वच्छ रखने की इन लोगों को इतनी चिंता है जिसका कि वे अक्सर ड्रामा करते रहते हैं तो क्यों कांग्रेस या अन्य राजनैतिक दलों से जुड़े लोग इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए. जब मन में सेवा की भावना हो तो कैसा दल और कैसी राजनीति? सामाजिक कार्यों में क्या लोगों को मिल-जुल कर काम नहीं करना चाहिए? ये कैसी समाज सेवा है जो हर राजनैतिक पार्टी अपने बैनर के तले ही करना चाहती है.

 

इस कार्यक्रम में क्योंकि बड़े-बड़े महान लोग आये थे इसलिए भाषणबाजी होनी तो लाजिमी ही थी. सो बारी-बारी से भाषणों का दौर चला. कार्यक्रम में कई स्कूलों के बच्चों को भी लाया गया था. लंबे-लंबे भाषणों के दौर के बीच बच्चे घंटों भूखे-प्यासे घंटों बिठाकर रखे गए. हालांकि उन्हें लाया इसलिए गया था कि महान लोग तो क्योंकि नाजुक होते हैं अतः ये स्कूली बच्चे ही गंगा तट पर सफाई करेंगे. लेकिन भाषणों के दौर पे दौर चले और गंगा-सफाई अभियान गया तेल लेने.

कार्यक्रम के अंत में सभी महान हस्तियों, चमचों और भीड़ ने अपने-अपने गंदे हाथ गंगा में धोए अर्थात गंगा को स्पर्श कर कृतार्थ किया और इस प्रकार स्पर्श गंगा अभियान की शुभ शुरुआत हुई. हालांकि स्पर्श गंगा का मुझे आज तक मतलब ही समझ नहीं आया है, पर थोडा बहुत जो मैं समझा, वही अल्प ज्ञान आपके बीच बाँट रहा हूँ.

 

हाल ही में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डॉ़ रमेश पोखरियाल निशंक ने स्पर्श गंगा बोर्ड के लिए आवश्यक पदों का सृजन शीघ्र करने कर निर्णय लिया. उन्होंने कहा कि कैबिनेट की अगली बैठक में इसका प्रस्ताव रखा जाएगा. उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बोर्ड के लिए बजट के तहत वित्त वर्ष 2011-12 के लिए 336 लाख रुपये के बजट का प्रस्ताव पेश किया जाए.

 

यानी कि जब तक सरकार है तब तक काट लो जो काटना है, कल को अगर कांग्रेस सत्ता में आयी तो न तो ये स्पर्श गंगा अभियान बचेगा और न ये बोर्ड क्योंकि तब नए अभियान चलेंगे और नए बोर्ड बनेंगे नेहरु, इंदिरा, राजीव के नाम पर. भई अपनी फसल तो सभी को बोनी और काटनी है. जैसे ही सरकार बदलती है सरकारी कार्यालयों की दीवारों पर महापुरुषों की तस्वीरें भी बदल जाती है. और तो और अब तो स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी महापुरुषों के पाठ सरकारों के हिसाब से बदलने लगे हैं. मतलब ये कि ऐसा कोई महापुरुष है ही नहीं जो निर्विवाद रूप से सभी राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर पर पर मान्य हो.

 

चलो जी आगे बढते हैं. अभी हाल ही में ऋषिकेश से २० किमी दूर शिवपुरी में भाजयुमो दिल्ली प्रदेश का कथित प्रशिक्षण वर्ग तीन दिन (२६-२८ फरवरी) के लिए आयोजित किया गया था जिसमें दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष सहित छः दर्जन संगठन अधिकारी शामिल हुए थे.  अब कहने को तो यह दिल्ली नगर निगम चुनाव को लेकर मनन करने के लिये आयोजित किया गया था लेकिन इससे क्षेत्र की शान्ति में खलल हो गया और कांग्रेस को भी मुद्दा मिल गया. प्रशिक्षण वर्ग की पहली ही रात गंगा तट पर जमकर शराब-कबाब पार्टी चली और देर रात तक भौंडे फ़िल्मी गाने बजते रहे जिसकी शिकायत स्थानीय लोगों ने अगले दिन की. अगले दिन गंगा तट पर शराब-सोडे की खाली बोतलें, चिकन-मटन के अवशेष यानी कि हड्डियां और बुझे हुए अलाव की तस्वीरें मीडिया के हाथ लग गईं और सारा मामला उजागर हो गया तो आनन-फानन में इस तीन दिवसीय कार्यक्रम को दो दिन में ही समेट लिया गया.

 

अब गंगा तट चूंकि अशुद्ध हो गया था तो इसका शुद्धिकरण भी जरूरी था तो इसका बीड़ा उठाया युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने क्योंकि इस पूरी तीर्थनगरी में इस अशुद्धि से सबसे ज्यादा आत्मा उन्हीं की दुखी थी. इस शुद्धिकरण की श्रृंखला में पहले तो भाजपा का पुतला फूंका गया, नारेबाजी की गई, सरकारी धन की फिजूलखर्ची के आरोप लगाए गए, गंगा की अस्मिता की दुहाई दी गई और अब इस कड़ी में ये गंगा शुद्धिकरण के लिए हवन किया गया.

 

धिक्कार है हमें कि हमें कि हम गंगा शुद्धिकरण के लिए आज तक कुछ नहीं कर पाए. अब अगर भाजपा-कांग्रेस न होती तो ये शुद्धि कैसे होती?

 

वैसे मैं श्रेय देना चाहूँगा इन राजनैतिक दलों को कि ये हैं तो गंगा शुद्ध है वरना इस तीर्थनगरी और इसके आस-पास के युवा तो आये दिन गंगा के किनारे इस प्रकार की शराब-कबाब मय पार्टियां करते ही रहते हैं और गंगा के किनारे कितने ही ऐसे पिकनिक स्पॉट हैं जहाँ कि इस प्रकार शराब-सोडे की खाली बोतलें और चिकन-मटन की अवशेष हड्डियां गंगा तट की शोभा बढाती मिल जायेंगी. पर क्योंकि वो आम आदमी की अशुद्धि है इसलिए मायने नहीं रखती और उसके लिए गंगा शुद्धिकरण हवन आवश्यक नहीं है. मतलब अशुद्धि के लिए भी आपका राजनैतिक होना जरूरी है और शुद्धि के लिए भी.

 

अब ये राजनैतिक दल हैं तो गाहे-बगाहे गंगा मय्या की शुद्धि दूध से भी हो जाती है. नेहरु-गांधी खानदान में किसी का जन्म दिन हो तो कांग्रेसी और भाजपा के किसी बड़े नेता का जन्म दिन हो तो भाजपाई कई किलो दूध गंगा में यूं उड़ेल देते है जैसे स्पेन में टमाटर की फसल ज्यादा होने पर लोग टमाटर की होली खेलते हैं. गंगा तट पर बैठे कई भिखारियों को ‘चल हट बे एकतरफ’ कहकर गंगा में दूध उडेलते हुए फोटो खिंचवाने का अलग ही मजा होता है.

 

जैसे कि खुशवंत सिंह अपने लेख के अंत में कोई चुट्कुला जरूर डालते हैं, वैसे ही मेरे दिमाग में भी कुछ खुराफात सूझ रही है और वो यूं है कि अगर लाल कृष्ण आडवाणी ये गाना गाने लगें कि ‘केसरिया बालम जी पधारो म्हारे देश रे……’ तो कांग्रेसी इस गाने को बैन करने की मांग को संसद में रख सकते हैं कि चूंकि इस गाने में केसरिया शब्द है, अतः ये गीत साम्प्रदायिक है. या कल को राष्ट्रध्वज का केसरिया रंग (भगवा) बदलने की मांग भी की जा सकती है कि ये साम्प्रदायिक रंग है. इसी तरह कभी भाजपा भी राष्ट्रध्वज का हरा  रंग हटाने की मांग कर सकती है कि ये पाकिस्तानी मानसिकता का प्रतीक है.

 

मुझे तो लगता है कि राज कपूर ने अपनी फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ का टाइटल ठीक नहीं रखा था क्योंकि बहता पानी तो कभी मैला हो ही नहीं सकता, हाँ इसके स्वयम-भू ठेकेदार जरूर मैले है और वे चाहे अपनी कितनी ही गंदगी इस गंगा में धो लें, ये गंगा मैली नहीं होने वाली.

  

अगर किसी फिल्म निर्माता को अपनी फिल्म के लिए फ्री-फंड का टाइटल चाहिए हो तो वो बिना पूछे यहाँ से उठा सकता है- “राम तेरी गंगा के ठेकेदार मैले”.

 

सुना है कि महेश भट्ट भी जागरण जंक्शन पर ब्लाग्गिंग करते हैं. तो सुन रहे हैं ना भट्ट साहब…………

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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shiromanisampoorna के द्वारा
March 23, 2011

बहता पानी तो कभी मैला हो ही नहीं सकता, हाँ इसके स्वयम-भू ठेकेदार जरूर मैले है और वे चाहे अपनी कितनी ही गंदगी इस गंगा में धो लें, ये गंगा मैली नहीं होने वाली राजेंदजी,आपके लेख की उपरोक्त पन्तियाँ सौ प्रतिशत खरी है पूज्या दीदी माँ जी कहा करतीं हैं यही भारतीय दर्शन है/ उत्तम लेख के लिए साधुवाद शिरोमणि सम्पूर्णा,वात्सल्य

    March 26, 2011

    आदरणीय सम्पूर्णा जी प्रणाम, पूज्या दीदी माँ जी के प्रवचन मैं अक्सर टीवी पर सुनता रहता हूँ. अगर मेरे विचार एक प्रतिशत भी उनके विचारों जैसे हैं, तो मैं खुद को धन्य समझता हूँ. ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. धन्यवाद.

rahul के द्वारा
March 16, 2011

IT IS BECAUSE WHEN WE VOTE TO CORRUPT POLITICIAN WE GIVE HIM/HER A LICENCE TO LOOT . SO NEXT TIME MIND IT . IF YOU REALLY CARE . LET WHAT HAPPEN , DO NOT BE PART OF SIN

    March 26, 2011

    Rahul ji, I thinnk this is not a better solution if we dot participate in voting. The politics of our Country needs refinement. It needs young and literate politicians. At least graduate candidates should be allowed to participate in elections. Literacy, in my openion, is the best way to reduce corruption. thanks a lot.

साध्वी चिदर्पिता के द्वारा
March 16, 2011

गंगा के नाम पर खेले जा रहे खेल का सही चित्रण किया है आपने. आपका यह लेख अपनी प्रोफाइल पर साझा कर रही हूँ. कोई आपत्ति हो तो सूचित कीजियेगा.

div81 के द्वारा
March 10, 2011

समाज के ठेकेदार जो है उनको अपने कार्य से मतलब कभी रहा ही नहीं है | ऋषिकेश से ऊपर चले जाईये गंगा का पावन रूप मिल जायेगा मगर जहाँ शहरी जगह में पतित पावनी गंगा आती है हम उसको मैली करने से पीछे नहीं हटते गंगा घाट में क्या होता है क्या नहीं ये नहीं जानती मगर गंगा जी में बहती पोलेथिन, कबाड़ और भी जाने कितनी गन्दगी उसमे बहायी जाती है | घर के सफाई तो कर दी जाती है मगर उस गन्दगी को गंगा जी में प्रवाहित कर दिया जाता है | हम को अपनी सोच और aadat बदलनी होगी | गंगा गन्दी हम कर रहे है किसी और का क्यूँ इंतजार करे की वहां से पहले पहल हो, आगे बढ़ कर पहल हमे खुद करनी होगी और जैसा vahid जी ne kaha है की यदि हर व्यक्ति निजी स्तर से भी प्रयास करने लगे तो वह दिन दूर नहीं जब मइया फिर से पहले जैसी हो जाएँगी | नहीं तो वो din दूर नहीं जब संगम में विलुप्त सरस्वती की तरह हम गंगा का अस्तिव भी खतरे में दाल दे |

    March 12, 2011

    दिव्या जी आपका कहना बिलकुल उचित है कि पहल हमे खुद करनी होगी वर्ना हम भी गंगा के अपराधियों में गिने जायेंगे.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 8, 2011

भईया, गंगा मइया को आज हम सौतेली माँ समझ बैठे हैं| जिन्होंने युगों-युगों से निस्वार्थ और निर्विकार भाव से हमारा पालन-पोषण किया है वही आज अपने अस्तित्व के लिए स्वयं संघर्षरत हैं| उनके शुद्धिकरण के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किये गए बल्कि यूँ कहें कि गंगा में ही बहा दिए गए और राजनैतिक दल अपनी-अपनी रोटियां सेक रहे हैं और गोटियां फिट कर रहे हैं| सच्चे मन से यदि चाह लिया जाये तो इसे साकार होते देर नहीं लगेगी….मगर ऐसा हो तब न| बिना भावना और संकल्प के कुछ भी संभव नहीं| यदि हर व्यक्ति निजी स्तर से भी प्रयास करने लगे तो वह दिन दूर नहीं जब मइया फिर से पहले जैसी हो जाएँगी|  जय गंगा मइया!!!

    March 8, 2011

    प्रिय वाहिद, तुम भी और मैं भी, हम दोनों गंगा के किनारे वास करते हैं, इसलिए हमारी जिम्मेदारी बंटी है की हम ही इसके अस्तित्व के लिए पहल करे, माध्यम चाहे कोई भी हो. फिलहाल तो अपनी सामर्थ्य यही है की ज्यादा से ज्यादा लोगों को हकीकत के दर्शन कराएं जाएँ. क्योंकि गंगा के ठेकेदार तो सत्ता में बैठे हैं. तुम्हारी बात में दम है कि……..यदि हर व्यक्ति निजी स्तर से भी प्रयास करने लगे तो वह दिन दूर नहीं जब मइया फिर से पहले जैसी हो जाएँगी…… जय गंगा मइया!!!

subhash के द्वारा
March 8, 2011

good post

nishamittal के द्वारा
March 8, 2011

पतित पावनी गंगा को प्रदूषित करने के लिए हम या हमारे भाई बंधू ही जिम्मेदार हैं कोई भी सरकार इस अभियान में सफल नहीं हो सकती जब तक स्वयं हम इसके महत्त्व को समझते हुए इसकी पवित्रता को बनाये रखने के लिए कृतसंकल्प नहीं होंगें’

    March 8, 2011

    निशा जी, आकाश तिवारी जी को दिया जवाब रिपीट कर रहा हूँ की………बात तो सच है……..

rajeev dubey के द्वारा
March 8, 2011

राजेन्द्र जी, बढ़िया लिखा आपने…गंगा को साफ करने के बहाने महान लोग उस पर कब्ज़ा कर लेंगे …और फिर प्लास्टिक की बोतल में बेंचकर पैसा स्विस बैंक में जमा होगा…. फिर हम सब गायेंगे… “गंगा तेरा पानी अमृत, ढूंढें से न मिल पाय , अब तो इस देश की धरती, तुझ बिन सूखी जाय”

    March 8, 2011

    दुबे जी नमस्कार, वैसे दुबे जी गंगा जल बेचने का धंधा शुरू तो ही ही चुका है. ताम्बे की छोटी-२ लोटियों में सीलबंद कर गंगाजल देश के विभिन्न भागों में और विदेशों में भी भेजा जा रहा है. बस इस नाम पर भ्रष्टाचार का रास्ता खुलने की देर है. फिलहाल गंगा की शुद्धि के नाम पर अनेको योजनाओं के माध्यम से ये भ्रष्टाचार का खेल जारी है. आपकी पंक्तियाँ एक कडवी भावी सच्चाई की और इशारा करती हैं. धन्यवाद.

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 8, 2011

श्री राजेन्द्र जी, आपके लेख का मै भी समर्थन करता हूँ..मगर मै यहाँ एक लाइन जरूर जोड़ना चाहूँगा की “गंगा की गंदगी में जितना बड़ा हाँथ हमारा है उतना किसी का नहीं… आकाश तिवारी

    March 8, 2011

    प्रिय आकाश जी, जैसा कि मैंने आपके लेख पर कमेन्ट किया था, वही दोहरा रहा हूँ कि…………बात तो सच है भाई…….

allrounder के द्वारा
March 8, 2011

बहुत ही बढ़िया लेख राजेंद्र जी ! हमारे देश की यही तो बदकिस्मती है जो लोग खुद स्वयं ऊपर से नीचे तक मैले का ढेर हैं वे ही गंगा को साफ़ करने का बीड़ा उठाते हैं, और कैसे उठाते हैं ये आपके लेख से स्पष्ट है, गंगा किनारे मांसाहारी पार्टियाँ मनाकर और मदिरा पान कर के ! बेहतरीन लेख पर हार्दिक बधाई !

nikhil के द्वारा
March 8, 2011

प्रणाम स्वीकार करे . आपने एक दम मेरा मनपसंद विषय उठा लिया है …गंगा की समस्या तो कभी नहीं सुलझने वाली है क्योकि जाहिल बने रहने को अपना लक्ष्य मान चुकी जनता और राजनितिक गटर के कीड़े इसे कभी शुद्ध होने ही नहीं देंगे…. हा एक बात आपके इस लेख को पढ़कर मन में आ गई की कही हवा की भी ब्रांडिंग करके उसे अपनी पार्टी वाले विधायक संसद इलाको में भेजने जैसा कोई प्रावधान न हो जाये.. जैसे मान ले की कही कांग्रेस की सरकार है तो वो कांग्रेस के संसद के इलाके में ज्याद शुद्ध आक्सीजन युक्त हवा भेजे .. दुसरे डालो के इलाके में अपेक्षाकृत ख़राब हवा भेजे…. जैसे की बिजली कटौती के मामले में होता है ……………………… हवा पर भी कोई गाँधी नेहरु, मायावती ,इत्यादि टाइप ट्रस्ट न बन जाये..

    March 8, 2011

    निखिल जी प्रणाम, आपकी आशंका बिलकुल जायज है कि अगर इस गंदी राजनीति की सफाई नहीं हुई तो वो दिन भी दूर नहीं जब कि आम जनता का खुली हवा में सांस लेना भी दूभर हो जाएगा. और ये बात तो कडवा सच है कि कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेता अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिए क्षेत्रवाद का नंगा खेल खेलते हैं. इसका जीता जागता उदहारण ममता बनर्जी है जो कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के लिए रेल बजट में खुलकर क्षेत्रवाद दिखाती है और दूसरी और उत्तराखंड जैसे राज्य हर वर्ष टांपते रह जाते हैं.

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 8, 2011

आदरणीय राजेंद्र जी, बहुत खूब लिखा है आपने . सच है की गंगा को अशुद्ध करने में यही लोगो का हाथ ज्यादा है पर शुद्ध करने का अधिकार इन्हें किसने दिया.

    March 8, 2011

    दीपक जी नमस्कार, गंगा को शुद्ध अशुद्ध करने का अधिकार इन्हें हम लोग यानी की जनता ही देती है क्योंकि इन्हें सत्ता में हम लोग ही लाते हैं, बाकी हक़ ये अपने आप ले लेते हैं.

आर.एन. शाही के द्वारा
March 8, 2011

भाई राजेंद्र जी, अच्छी पोलपट्टी खोली है गंगा मैया के ठेकेदारों की । गंगा अब मैली ही नहीं रही, बल्कि इसने एक लम्बे अर्से से बहुराजनैतिक पाटों में पिसते रहना भी सीख लिया है । जबसे स्वर्गीय राजीव गांधी ने बनारस से राजसी तामझाम के साथ गंगा स्वच्छता अभियान की शुरुआत की, सभी राजनैतिक दलों को गाहे बगाहे तस्वीरें खिंचवाने और योजनाएं बनाकर माल काटने का रास्ता मिल गया । खुद तो नहीं रहे, परन्तु गंगा के गले के लिये ऐसी फ़ांस छोड़ गए, जैसे इंदिरा जी अपने खानदान की आने वाली बहुओं के लिये शादी का जोड़ा छोड़ गई थीं । भाजपा हो या कांग्रेस, या कोई और पार्टी, खजाने को लूटने का सबका मंत्र एक ही है । इस मामले में कभी कोई भेदभाव नहीं होता । साधुवाद ।

    March 8, 2011

    शाही जी प्रणाम, आपने भी अच्छी क्लास ले ली कांग्रेस और भाजपा की. आज की राजनीति तो ऐसी घटिया हो गई है कि देश के भले और विकास से किसी को मतलब नहीं है, बस अपनी झोली भरते रहो और दूसरों की टांग खींचते रहो, बदले की राजनीति करो. बस निर्भर करता है इस बात पर कि ये सरकार बनाने की लाटरी किसके नाम पर खुलती है, वर्ना हैं तो सभी एक ही थैली के………

vinitashukla के द्वारा
March 8, 2011

बहुत ही सशक्त लेख. गंगा शुद्धीकरण के नाम पर राजनीति करने वालों की क्षुद्र और अवसरवादी सोच सचमुच निंदनीय है.

Deepak Sahu के द्वारा
March 8, 2011

सुंदर लेख आपका राजेंद्र जी!  बधाई!

Nikhil के द्वारा
March 8, 2011

अर्थपूर्ण लेख के लिए बधाई.

Ramesh bajpai के द्वारा
March 8, 2011

विद्वान् श्री राजेन्द्र जी ये तथाकथित ठेकेदार तो हर स्थान पर अपनी राजनैतिक रोटिया ही सकते फिरते है | अब तो जनता भी इनके इरादों की असिलियत को समझ चुकी है | पतित पावनी गंगा को भागीरथ के फौलादी इरादों व जन जागरण की अदम्य इच्छा शक्ति वाली भुजाओ का इंतजार है | भारत की यह शश्यश्य्मला धरती निपूती नहीं है वह इस भागीरथ को सामने लाएगी ही |

    March 8, 2011

    बाजपेई जी प्रणाम, वाकई आज पतित पावनी गंगा को ऐसे ड्रामेबाजों की नहीं बल्कि भागीरथ के फौलादी इरादों व जन जागरण की अदम्य इच्छा शक्ति वाली भुजाओ का इंतजार है | कितना अच्छा कहा आपने …..भारत की यह शस्य श्यामला धरती निपूती नहीं है, वह इस भागीरथ को सामने लाएगी ही……. आपका बहुत-२ धन्यवाद.

Alka Gupta के द्वारा
March 8, 2011

राजेन्द्र जी , बहुत ही अच्छा लिखा है….इसके स्वयमभू ठेकेदार ही मैले हैं कितनी भी गन्दगी धो लें गंगा कभी मैली नहीं होती……सही में गंगा शुद्ध ही है… पर ये ठेकेदार कितना भी शुद्ध होने की कोशिश करें रहेंगे वे सब मैले के मैले ही….. अच्छी पोस्ट !

    March 8, 2011

    अलका जी आपका कहना सही है कि….. गंगा कभी मैली नहीं होती…… प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

Harish Bhatt के द्वारा
March 8, 2011

राजेंद्र जी सादर प्रणाम, बहुत ही शानदार लेख के लिए हार्दिक बधाई.

    March 8, 2011

    हरीश भाई प्रणाम, आपका बहुत-२ धन्यवाद. जल्द ही आपसे मुलाक़ात होगी, काफी समय हो गया है मिले हुए.

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 7, 2011

प्रिय जुबली कुमार जी …नमस्कार ! आपने यह क्या गजब कर डाला ! अजी साहब महेश भट्ट साहिब और हमारा क्या मुकाबला ,कहाँ हम और कहाँ वोह ……. उनको तो यहाँ पर लिखने का मेहनताना भी मिलता है और अपना कीमती समय देने के लिए मुआवजा भी मिलता है …..देख लेना जिस दिन काले धन वाली लिस्ट उजागर हुई ,उसमे पहली पंक्ति में भट्ट साहिब का नाम भी होगा ….. खैर जो भी हो आपके कहे मुताबिक इन नेतायो के बहाने ही गंगा मैया कस शुद्धिकरण तो हुआ किसी हद तक ….. और जहाँ तक गंगाजल पर कर चुकाने कि बात है तो जब पानी कि कमी हो रही है बर्बादी होने के कारण तो वोह दिन भी ज्यादा दूर नही है …. आप तो मुझ से भी कहीं ज्यादा किसी खबर को खींचते है ….. मेरी छोटी सी बधाई स्वीकार करे

    March 8, 2011

    प्रिय राजकमल जी …नमस्कार ! आपका कहना एकदम दुरुस्त है. आपकी ये छोटी सी बधाई कितनी बड़ी है…..मैं जानता हूँ. धन्यवाद.


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