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मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूँगा

Posted On: 12 Mar, 2011 Others,न्यूज़ बर्थ में

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मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूँगा 

एक बच्चे के माता-पिता सुनामी में मर जाते हैं,

वो रोज समंदर के किनारे जाता और खड़ा रहता,

लहरें आतीं और उसके पैर भिगो कर चली जातीं,

और वो कहता कि –  

“कितना भी पैर छू लो, पर मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूँगा.”

++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++

 

दोस्तों, अभी शुक्रवार को ही जापान में पिछले १४० सालों में आये ८.९ रिक्टर स्केल के सबसे भीषण भूकंप और उसके बाड़ आई विनाशकारी सुनामी ने भयंकर तबाही मचाई है जिसके दृश्य आप सभी टीवी पर भी देख रहे होंगे. इस तबाही में जान-माल कि कितनी हानि हुई है इसका अभी तो ठीक से आंकलन भी संभव नहीं हो पाया है पर इसमें सैकड़ों लोगों के मारे जाने की संभावना है. अकेले सेंदाई शहर में ३०० शव बरामद हो चुके हैं.

 

सुनामी की इस विनाशलीला ने जापान में कितने ही परिवार उजाड दिए होंगे, कितने ही लोग अपनों से बिछड गए होंगे. ऐसे में यह छोटी सी दिल छू लेने वाली कहानी भले ही पुरानी हो पर मानवीय संवेदनाओं का अहसास कराती है.

 

आइये हम भी जापान में सुनामी में मारे गए लोगों के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट करें.

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63 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

पवन के द्वारा
May 23, 2011

bhaardwaj जी आज के व्यस्त समय में आपने उनके बारे में सोंचा जो अपने बारे में कुछ नहीं कह सकते , आपको साधुवाद , आगे भी ऐसे ही अनछुए विषय संज्ञान में लेते रहे . नमस्कार

    May 23, 2011

    पवन जी नमस्कार, हालांकि मैं काफी दिन पहले ब्लॉग्गिंग छोड़ चुका हूँ पर आपका कमेन्ट पढ़कर अत्यंत प्रसन्नता हुई की आप भी मानवतावादी सोच रखते हैं. शायद ये आप जैसे बुद्धिजीवियों का ही प्रोत्साहन होता है कि इस तरह के कार्य हो जाते है. धन्यवाद बहुत-२….

Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
March 26, 2011

बार बार याद आती है माल्थस की . प्रकृति से खिलवाड़ करना उचित नहीं है .

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 22, 2011

निश्छल शब्दों में एक निर्दोष के द्वारा कही गयी ये बात बहुत ही गहन निहितार्थ रखती है| दुनिया में इंसानियत अब भी ज़िंदा है इसका सुबूत आपकी यह मानवतावादी पोस्ट है| हार्दिक आभार सहित, श्रद्धावनत अनुज,

    Raj के द्वारा
    March 23, 2011

    प्रिय वाहिद मानवता की भलाई के लिए आवाज उठाना हर व्यक्ति का मकसद होना ही चाहिए. धन्यवाद.

reenajanjua के द्वारा
March 19, 2011

राजिंदर जी नमस्ते जापान में बहुत बुरा हुआ सभी देशों की साकार को प्रकृति को ठीक रखने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए ताके प्रकृति भी हमसे खुश रहे पर एक आम इंसान अकेला कुश भी नहीं कर सकता सभी को अपनी सररकार को बोलना चाहिए पर कोई आगे नहीं आता.

    March 19, 2011

    आपका कहना बिलकुल सही है कि पूरे विश्व को पर्यावरण की रक्षा के लिए ठोस उपाय अपनाने होंगे. धन्यवाद.

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
March 16, 2011

इंसान कितना भी दंभ भर ले प्रकृति जीत होने का, परन्तु आज फिर प्रकृति ने उसे बौना साबित कर दिया है, कितना बेबस और लाचार नजर आया आज इंसान, कुछ भी नही है उसके हाथों में, यहाँ तक की उसकी बने हुई चीजें भी (परमाणु रिएक्टर भी ). परमात्मा.. असमय दिवंगत आत्माओं को शांति दे.

    March 16, 2011

    शिवेंद्र जी, सच ही तो है की प्रकृति की शक्ति के सामने हम लेश-मात्र भी नहीं हैं, बल्कि हम तो खुद इसी की एक रचना मात्र हैं. आपकी संवेदना में मैं भी आपके साथ हूँ.

briju के द्वारा
March 16, 2011

आदरणीय राजेन्द्र जी ….जापान में रोंगटे खड़े करने वाले दृश्य देखकर प्रकृति के क्रूर अंदाज का फिर अहसास हुआ …विकास और हथियारों की होड़ में मानव अपने पैरो पर ही कुल्हाड़ी चला रहा है …बार बार पृकृति सावधान कर रही है की मुझे मत छेड़ो …..जापान में प्रभावित नागरिको के प्रति आज पूरा विश्व नम संवेदना व्यक्त कर रहा है …….लेकिन इश्वर संहार के बीच ही सृजन के बीज भी बोता है यही जगत का नियम है … …होली के मस्त गीतों पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए साधुवाद ..और महापर्व होली के लिए सपरिवार शुभकामनाये ………ब्रजमोहन श्रीवास्तव

    March 16, 2011

    आदरणीय ब्रजमोहन जी अभिवादन, होली के पावन पर्व पर आपको भी सपरिवार शुभकामनाये. आशा है की होली की और भी कवितायें आपसे सुनने को मिलेंगी. धन्यवाद.

    March 16, 2011

    जापान की इस त्रासदी पर मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ………….बार बार पृकृति सावधान कर रही है की मुझे मत छेड़ो…….पर मनुष्य है कि अपने वर्तमान के लाभ के लिए भविष्य के लिए मुश्किलें खडी कर रहा है और श्रृष्टि का नाश करने पर तुला है. आपकी ये बात भी सत्य है कि ……..लेकिन इश्वर संहार के बीच ही सृजन के बीज भी बोता है यही जगत का नियम है … धन्यवाद.

sanju uniyal के द्वारा
March 15, 2011

इस से बेहतर कोई संवेदना नहीं हो सकती की हम दिल से उन लोगों के लिए प्रार्थना करें / दिल छू लेने वाली कहानी

    March 16, 2011

    धन्यवाद प्रवीण, आखिर तुम यहाँ पहुँच ही गए. संवेदना सन्देश देने के लिए फेसबुक पर भी लिंक डाल रखा है. फेसबुक पर तुम्हारी अपील भी पढ़ ली थी. इससे ज्यादा फिलहाल अपने हाथ में कुछ नहीं है. धन्यवाद.

sanju के द्वारा
March 15, 2011

द्रवित करने वाली रचना. ईश्वर संत्राषित लोगों को इस असह्य कष्ट को सहन करने की शक्ति दे |

umeshpurohit के द्वारा
March 15, 2011

Really a very impressive and heart touching story.

allrounder के द्वारा
March 14, 2011

राजेंद्र जी, जापान मैं मनुष्य प्रजाति पर कहर की तरह टूटी प्राकर्तिक आपदा से सम्पूर्ण विश्व द्रवित है, प्रकर्ति के इस भयाभय रूप का शिकार हुए लोगों को हमारी और से श्रधांजलि आपके इस लेख के माध्यम से !

Dharmesh Tiwari के द्वारा
March 14, 2011

राजेंद्र जी नमस्कार,यह प्रकीर्त के साथ हो रहे छेड़छाड़ का ही परिडाम है,बहुत ही दर्दनाक घटना है ये,धन्यवाद!

    March 14, 2011

    धर्मेश जी नमस्कार, आपका कहना सही है कि मानव द्वारा प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ भी इसमें एक महत्त्वपूर्ण कारक है.

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 14, 2011

बहुत ही दारुण घटना और प्रकृति का क्रूर मजाक है ये. पर हमें भी इस बारे में सोचना होगा की प्रकृति से छेड़ छाड़ के क्या नतीजे हो सकते है.

    March 14, 2011

    दीपक जी वास्तव में मानव अपनी ही गलतियों का खामियाजा भुगत रहा है.

nikhil के द्वारा
March 14, 2011

प्रकृति के साथ हो रहे क्रूर मजाक का खामियाजा भी मानवता को भुगतना पड़ेगा ये हम भूल जाते हैं अक्सर. जापान में हुई विभीषिका से आहात हुए विश्व को एकजुट हो एक अदद प्रयास करने की जरुरत है. उत्कृष्ट लेख के लिए बधाई.

    March 14, 2011

    निखिल जी आपने सही कहा है कि पापन पर पडी इस आपदा की घड़ी में विश्व को एकजुट हो एक मदद करने की जरूरत है, मानवता यही कहती है.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
March 14, 2011

अभिवादन ……….. ये महान विपत्ति है मेहनतकश जापानियों के उपर प्रकृति के सामने हमारे तमाम बंदोबस्त की औकात क्या है ये हमें ऐसी घटनाओं में दिख जाता है … हाथ जोड़कर उस परम शक्स्तिशाली इश्वर से प्रार्थनाही की जा सकती है की मारे गए लोगो की आत्मा को शांति दे और जापान को इस त्रासदी से उबरने की शक्ति

    March 14, 2011

    अभिवादन निखिल भाई, सही कहते हैं आप कि इस वक्त तो मानव के हाथ में कुछ नहीं है सिवाय इसके कि हाथ जोड़कर उस परम शक्स्तिशाली इश्वर से प्रार्थनाही की जा सकती है की मारे गए लोगो की आत्मा को शांति दे और जापान को इस त्रासदी से उबरने की शक्ति.

Ramesh bajpai के द्वारा
March 14, 2011

प्रकृति के इस कहर से कराह रही मानवता के लिए हम सब प्रार्थना ही तो कर सकते है | मौत का यह तांडव अब रुक जाय बस |

razia mirza के द्वारा
March 14, 2011

बड़ी ही संवेदनशील रचना| हकीकत बयान करती रचना|

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
March 13, 2011

अग्रज ! मनुष्य प्रकृति के सामने कितना बौना होता है, इस बात देखने अनुभव करने के बाद हम असहाय हो जाए हैं | संत्राषित लोगों के लिए हम सवेदनाएं ही प्रकट कर पाते हैं | हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, ईश्वर संत्राषित लोगों को इस असह्य कष्ट को सहन करने की शक्ति दे |

aksaditya के द्वारा
March 13, 2011

राजेन्द्र भा ई , कम शब्दों में इतनी संवेदना | दिल छू लिया आपने | मैंने इसे आपसे पूछे बिना फेसबुक पर डाला है , क्षमा करेंगे |

    March 13, 2011

    आदरणीय आदित्य जी प्रणाम, कृपया आप क्षमा मांग कर शर्मिंदा न करें, मैं इस काबिल नहीं हूँ. मानवता की भलाई और संवेदनाएं किसी की बपौती नहीं हैं, इन्हें तो आप हक़ से, जरूरत पड़े तो छीनकर कहीं भी इस्तेमाल करें तो ये आप की महानता ही होगी. आपके मानवतावादी कार्य के लिए मैं आपका आभारी हूँ.

    March 13, 2011

    कृपया अपना फेसबुक लिंक भी बताने की कृपा करें.

rajeev dubey के द्वारा
March 13, 2011

जीवन और मृत्यु…संघर्ष जारी है…. संवेदनशील लेख पर साधुवाद…

    March 13, 2011

    सच कहा राजीव जी……………जीवन और मृत्यु…संघर्ष जारी है…. इस नियति को मानव को स्वीकार करना ही पड़ेगा. धन्यवाद.

rachna varma के द्वारा
March 13, 2011

आदरणीय राजेन्द्र जी , नमस्कार , जापान का ज़लज़ला इस क्षण भंगुर मानव जीवन के लिए एक चेतावनी है , मगर हमारी भाव पूर्ण संवेदनाये उस प्राकृतिक विपदा ग्रस्त जापान के साथ है | आभार सहित |

    March 13, 2011

    जी हाँ रचना जी, मानव होने के नाते हमारा ये फर्ज बनता है की हम अपनी संवेदनाएं प्रकट करें. धन्यवाद.

malkeet singh jeet के द्वारा
March 13, 2011

वास्तव में ,लम्हों की खता है ,और सदियो को सजा पानी है मलकीत सिंह जीत फुर्सत के दिन ,से http://jeetrohann.jagranjunction.com/2011/03/12/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80/

    March 13, 2011

    क्या खूब कहा मलकीत जी, वाकई, डेढ़-दो घंटे का जलजला इतनी तबाही मचा गया की इससे उबरने में जापान को पता नहीं कितना समय लगेगा.

vinita shukla के द्वारा
March 13, 2011

इस नन्हे मासूम की व्यथा, यह संकेत देती है कि प्रकृति के उस विध्वंसक खेल में, न जाने कितने ही लोग काल कवलित हो गए होंगे. ईश्वर उन सभी की आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिजनों को यह अपार दुःख सहन करने की शक्ति.

    March 13, 2011

    सच कहतीं हैं विनीता जी, ईश्वर उन सभी प्रभावितों को यह अपार दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करे.

nishamittal के द्वारा
March 13, 2011

राजिन्द्र जी,प्रकृति के इन कोप को हम ही आमंत्रित करते हैं ये भूल कर हम भी इसके शिकार बनेंगें.ये हमारी स्वार्थपरता ही है,जिसके चलते किसी किसी न किसी रूप में प्रकृति का कोपभाजन बना जाता है.प्रभावित परिवारों के प्रति अपने संवेदनाएं ही व्यक्त कर सकते हैं हम.

    March 13, 2011

    आदरणीय निशा जी, आपका कहना उचित है कि प्रकृति के कोप को हम ही आमंत्रित करते हैं और मानव द्वारा इससे की जाने वाली छेड़-छाड़ भी इसमें सहायक होती है. इस समय तो हम अपनी संवेदनाएं ही व्यक्त कर सकते हैं.

shiromanisampoorna के द्वारा
March 13, 2011

राजेन्द्र जी, ह्रदश्पर्शी और आत्मा तक को झकझोर देने वाली बात आप की कलम करती है सुनामी हो या अरुणा जी का विषय / वंदन करती हू शायद हम सब की सोई हुई आत्मा आपके सद्प्रयास से जाग जाय/ शिरोमणि, वात्सल्य

    March 13, 2011

    आदरणीय सम्पूर्णा जी प्रणाम, मेरा तो यही सोचना है कि मानव ही मानव के काम न आये तो फिर उसका ये मानव जन्म व्यर्थ है. अगर हम किसी भी माध्यम से मानवता के प्रति कुछ करने में सक्षम हैं, तो हमें इससे पीछे नहीं हटना चाहिए. ये कलम और हमारे विचार भी इस कड़ी में एक सशक्त माध्यम है यदि इसका सकारात्मक प्रयोग किया जाय. जब हम भौतिक रूप से कुछ करने में असमर्थ हों तो कम से कम सद्विचारों का प्रसार तो कर ही सकते हैं. मुझे आश्चर्य होता है कि एक ओर तो जनता किसी तुच्छ से मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर आन्दोलन कर देती है, और वहीं दूसरी ओर अरुणा जी के मुद्दे पर जिस प्रकार की बहस होनी चाहिए, हो नहीं पाती. अभी हाल ही में कुछ छात्रों ने फेसबुक पर भोपाल का नाम बदल कर भोजपाल किये जाने के मुद्दे पर हजारों लोग जोड़ दिए, लेकिन इस तरह के मुद्दों पर लोग स्वस्थ बहस करने को तैयार नहीं होते. आपकी प्रेरणादायक प्रतिक्रिया निश्चित ही मुझे इस प्रकार के विषयों पर लिखने के लिए प्रेरणा प्रदान करेगी. धन्यवाद.

Alka Gupta के द्वारा
March 12, 2011

राजेन्द्र जी , इस प्राकृतिक आपदा में न जाने कितने परिवार काल कवलित हो गए और कितने ही मासूमों की यह दारुण कथा है सच में बहुत ही मर्मस्पर्शी उदगार ! ईश्वर सभी मृतकों को शान्ति प्रदान करे व उनके आश्रितों को शक्ति तथा संबल !

    March 13, 2011

    अलका जी मैं भी आपके साथ स्वर मिलाना चाहता हूँ कि……………ईश्वर सभी मृतकों को शान्ति प्रदान करे व उनके आश्रितों को शक्ति तथा संबल !

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 12, 2011

प्रिय जुबली कुमार जी …… प्रणाम ! जापान की इस राष्ट्रीय आपदा पर आपने सभी का ध्यान एक मासूम और अबोध बालक के द्वारा बखूबी खींच कर बहुत ही सराहनीय कार्य किया है ……. मेरे छोटे भाई ने मेरे पिता जी की आकस्मिक म्रत्यु पर भगवान की सभी मुर्तिया घर के बाहर कर दी थी ….. बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयास

    March 13, 2011

    प्रिय राजकमल जी सादर प्रणाम ! आपने अपने पिता जी की आकस्मिक म्रत्यु पर आपके छोटे भाई द्वारा भगवान की सभी मुर्तिया घर के बाहर कर देने का जिक्र किया है तो यह आपके छोटे भाई द्वारा ईश्वर और प्रकृति के प्रति नाराजगी थी कि उनके प्रति आस्था होने पर भी आपके परिवार को यह दुःख देखना पड़ा. उस समय आपके भाई की नाराजगी वाजिब ही थी. इस दुनिया में हर इंसान को अपने-अपने हिस्से के दुःख उठाने पड़ते हैं और कई बार ऐसा होता है कि हमारी ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा और विशवास होने के बावजूद हमें दुःख ही दुःख झेलने पड़ते हैं, और कई बार यह विशवास टूटने के कगार पर आ जाता है. लेकिन शायद यही जीवन है और हम इन सब बातों के साथ ही जीने के विवश भी हैं, क्योंकि ईश्वर और प्रकृति पर हमारा बस नहीं है.

आर.एन. शाही के द्वारा
March 12, 2011

राजेंद्र जी, बड़े कारुणिक और मर्मस्पर्शी उद्गार हैं छोटे बालक के । न जाने ऐसे कितने मासूम या तो खुद कालकवलित हो गए, और पता नहीं कितने अनाथ या यतीम । प्रकृति की विनाशलीला आंसुओं को भी सोख लेती है । ईश्वर सबको सम्बल प्रदान करें । साधुवाद ।

    March 13, 2011

    आदरणीय शाही जी प्रणाम, इस तबाही के मंजर को देखते हुए रूह काँप उठती है. इस समय तो मानव प्रकृति के आगे बेबस है, हम फिलहाल अपनी संवेदना ही प्रकट कर सकते हैं. ईश्वर सबको सम्बल प्रदान करें.

sdvajpayee के द्वारा
March 12, 2011

 पल में प्रलय मचाने वाली प्रकृति ही सर्व शक्ति सम्‍पन्‍न है और आज भी उसकी श्रेष्‍ठ रचना मानव अपनी इच्‍छानुसार अपने पैरों पर खडा होने में समर्थ नहीं है इस जलजले से फिर यही ध्‍वनि निकलती है।

    March 13, 2011

    आदरणीय बाजपेई जी प्रणाम, वाकई ये सच है कि प्रकृति ही सर्व शक्ति सम्‍पन्‍न है और इसका अहसास समय-समय पर प्रकृति मानव करवाती रहती है. एक बार फिर प्रकृति ने मानव को अपना रौद्र रूप दिखाया है. इस समय तो हम मात्र अपनी संवेदनाएं ही प्रकट कर सकते हैं.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 12, 2011

भईया, कितनी मार्मिक  और ह्रदय विदारक घटना है यह| पर क़ुदरत के आगे किसका बस चला है| ईश्वर सभी मृतात्माओं को शांति प्रदान करें और उनके प्रियजनों को जीवन जीने का संबल| आमीन,

    March 13, 2011

    सही कहते हो वाहिद कि क़ुदरत के आगे हम लाचार है लेकिन ये हमारी संवेदनाएं ही होती हैं जो कि मानव को संबल प्रदान करती हैं. सुमामीन.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 22, 2011

    सत्य वचन..!! प्रत्येक मानव को मानव मात्र के प्रति संवेदना होनी ही चाहिए जो न सिर्फ़ दुःख में सहारा बनती है बल्कि सुख में पथ प्रदर्शन भी करती है| दुआएं…!!!!!!!


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