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होली पर चिंतन

Posted On: 20 Mar, 2011 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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इस वर्ष करीबी रिश्तेदारी में मृत्यु के कारण इस बार हमारे घर में होली नहीं मनाई जा रही है. तो सोचता हूँ कि क्यों न कुछ चिंतन ही कर लिया जाय. होली से ठीक एक दिन पहले एक मित्र के पिता के देहावसान का सन्देश मिला. पार्थिव शरीर को दाह-संस्कार हेतु हरिद्वार के खडखडी श्मसान घाट ले जाया गया. उस वक्त वहाँ पर तकरीबन १० चिताएं गंगा किनारे जल रहीं थी. चिताओं की आग की गर्मी, धुंए और उडती राख के कारण वहाँ पर खड़े रह पाना और सांस ले पाना भी मुश्किल हो रहा था. और गंगा का तो कहना ही क्या. किनारों पर जगह-जगह पौलीथीन के ढेर, गुटके-खैनी के खाली पाउच, और दुनिया भर का कचरा वहाँ पर बिखरा पडा था. गंगा का पानी यूं प्रतीत हो रहा था मानो कीचड. मजबूर होकर हमें वहाँ से थोड़ा दूर जाकर खड़े होना पड़ा ताकि ठीक से सांस ले सकें.

 

अभी कुछ दिन पहले ही गंगा के सफाई अभियान के नाम पर हो रही नौटंकी के ऊपर एक लेख लिखा था. हरिद्वार आकर लगा कि शायद एक महत्वपूर्ण पहलू जिक्र करने से छूट गया है. मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है जब कि हम दाह-संस्कार के तरीकों को थोडा बदलने की कोशिश करें जिससे कि पर्यावरण को हो रहे नुक्सान से बचा जा सके. इस काम के लिए आज के समय में विद्युत शवदाह गृह बहुत बढ़िया विकल्प हैं. गंगा किनारे पर टनों लकड़ी फूंक कर प्रदूषण फैलाना, तत्पश्चात चिता की राख और कोयलों को गंगा में बहा देना, जले हुए शरीर के वे अवशेष जो जल नहीं पाते हैं (पुरुषों में छाती और स्त्रियों में श्रोणि भाग), उनगे गंगा में प्रवाहित कर देना, ये प्रक्रियाएं गंगा को प्रदूषित कर रही हैं. ये प्रक्रियाएं क्योंकि हमारी आस्था और संस्कारों से जुडी है इसलिए हम इन्हें बदलने में संकोच करते हैं. हम केवल आज की सोचते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि आने वाली पीढ़ी को हम क्या देकर जा रहे हैं.

 

मुझे वो कहानी याद आती है कि एक वृद्ध आदमी द्वारा आम का पौधा लगाए जाने को देखकर जब किसी ने उससे कहा कि इस पौधे के बड़ा होने और फल देने तक तो तुम जीवित ही नहीं रहोगे, तब इस पौधे को लगाने से तुम्हे क्या फायदा? तब उस वृद्ध मनुष्य ने जवाब दिया कि मैं नहीं तो आने वाली पीढ़ी तो इस के फल खा सकेगी. यही सोच हमारी भी होनी चाहिए. आने वाली पीढ़ी के लिए धन-संपत्ति, जमीन-जायदाद छोड़कर जाना उतना आवश्यक नहीं है क्योंकि ये चीजें तो मनुष्य की ही बनाई हुई व्यवस्थाएं हैं. इनसे ज्यादा जरूरी है उनके लिए छोड़कर जाना स्वच्छ जल, वायु, पेड़-जंगल अर्थात स्वच्छ पर्यावरण जो कि जीवन जीने के लिए आवश्यक तत्व हैं. पर्यावरण होगा तो मानव रहेगा अन्यथा धन-संपत्ति, जमीन-जायदाद सब यहीं धरी की धरी रह जायेंगी.

 

आजकल तीर्थनगरी ऋषिकेश में पॉलिथिन हटाओ अभियान काफी सफलता-पूर्वक चलाया जा रहा है. पॉलिथिन कल्चर के आदी हो चुके लोगों को परेशानी तो हो रही है पर यदि ये अभियान अपनी राह न भटका तो निश्चित ही ये पर्यावरण सुधार और मानव हित में एक महत्वपूर्ण कदम होगा.

 

हालांकि मैं तो होली नहीं खेल पा रहा हूँ पर मित्रों के उत्साह में मन से शामिल तो हो सकता हूँ. तो जाते-२ चार लाइनें जबरन, बिना डिमांड के ठोक रहा हूँ-

 

गुमसुम सा रहकर तो यारों,

मजा नहीं है होली में,

छानो भंग, बोलो जै-शिवशंकर,

मस्ता जाओ होली में.

 

आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

atharvavedamanoj के द्वारा
March 22, 2011

आदरणीय राजेन्द्र जी जब मायापुरी की यह स्थिति है तो काशी की क्या बात करें,गंगा एक पवित्र जलधारा\आज एक नाले में परिणत हो गया है, गंगा कार्य याजना के नाम पर अरबो की राशि उदरस्थ की जा चुकी है और गंगा की नियति कूड़ा,कचरा,सीसा,पारा,आर्सेनिक का एक महासमुद्र|विचारोत्तेजक लेख…जय भारत, जय भारती

    March 22, 2011

    आदरणीय मनोज जी सच कहते हैं आप. बनारस में गंगा की स्थिति के बारे में बहुत सुना और पढ़ा है. सत्य तो ये है की गंगा की हालत सुधारने के लिए सरकारी योजनाएं काफी नहीं बल्कि जन-अभियान की ज्यादा आवश्यकता है. जय भारत, जय भारती

बनारसी बाबू के द्वारा
March 22, 2011

आदरणीय राजेंद्र जी, अपनी प्रथम रचना पर आपसे प्रोत्साहन पाकर हम अपनेआप को रोक नहीं सके और आभार व्यक्त करने चले आये| आपके चिंतन में पर्यावरण की ज्वलंत समस्या पर सुन्दर विचार व्यक्त किये गए हैं और साथ ही गंगा मैया के प्रति जो धारणा दिखी है वह निश्चय ही सराहनीय एवं अनुकरणीय है| धन्यवाद,

    March 22, 2011

    धन्यवाद बनारसी बाबू, आपकी रचना भी उच्च कोटि की है.

    Idalee के द्वारा
    October 6, 2011

    Thanks for writing such an easy-to-understand artclie on this topic.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 22, 2011

“ज़रूरी नहीं कि हमें विरासत में क्या मिला, ज़रूरी ये है कि हम विरासत में क्या छोड़ेंगे” हैट्स ऑफ भईया…

sanju uniyal के द्वारा
March 21, 2011

सत्य वचन / अब तो कहना ही पड़ेगा लगे रहो राजू भाई

    March 21, 2011

    देर आयद, दुरुस्त आयद. चलो तुमने पढ़ा तो सही. प्रतिक्रिया के लिए थैंक्स.

K M Mishra के द्वारा
March 21, 2011

गुमसुम सा रहकर तो यारों, मजा नहीं है होली में, छानो भंग, बोलो जै-शिवशंकर, मस्ता जाओ होली में बढ़िया लेख है रतुरी जी . होली की शुभकामनाएं !

    March 21, 2011

    सम्माननीय मिश्रा जी अभिवादन, आपको फिर से होली की शुभकामनाएं !

Deepak Sahu के द्वारा
March 21, 2011

सत्य वचन है आपके भ्राता  राजेंद्र जी! आपको मेरी ओर से होली की मुबारकबाद!

    March 21, 2011

    धन्यवाद दीपक जी, अभी आपकी जेजे सूरमाओं की होली से ही लौटकर आ रहा हूँ. आपको एक बार फिर से होली की मुबारकबाद!

ashvinikumar के द्वारा
March 20, 2011

रतूड़ी साहब पर्यावरण पर गहन चिंतन के लिए हार्दिक आभार ,,होली की सपरिवार हार्दिक बधाईयाँ …….जय भारत

    March 21, 2011

    अश्विनी जी आपको भी होली की सपरिवार हार्दिक बधाईयाँ …….जय भारत, जय हिन्दुस्तान.

Alka Gupta के द्वारा
March 20, 2011

राजेन्द्र जी, विशुद्ध पर्यावरण स्वस्थ जीवन के लिए बहुत आवश्यक है इसमें हम सबके सहयोग की अति आवश्यकता है तभी यह अभियान सफल हो सकता है ! इस विषय से सम्बंधित आपके इस लेख पर चिंतन बहुत आवश्यक है ! सार्थक पोस्ट है ! होली की शुभकामनाएं !

    March 21, 2011

    अलका जी आपके विचार अति उत्तम हैं कि विशुद्ध पर्यावरण स्वस्थ जीवन के लिए बहुत आवश्यक है व इसमें हम सबके सहयोग की अति आवश्यकता है तभी यह अभियान सफल हो सकता है. आपकी जागरूकता के लिए धन्यवाद. आपको भी होली की शुभकामनाएं !

आर.एन. शाही के द्वारा
March 20, 2011

राजेंद्र जी, पर्यावरण की चिन्ता का आंदोलन ज़ोर नहीं पकड़ पा रहा । इसे समग्र बनाना होगा । बैठे ठाले वाला आपका यह चिंतन सार्थक है । शुभ होली ।

    March 21, 2011

    आदरणीय शाही जी आपका कहना सही है कि पर्यावरण आंदोलन को समग्र बनाना होगा. जिस प्रकार आप जैसे जागरूक लोगों से प्रतिक्रियाएं मिल रही है तो मुझे भी संतुष्टि है कि मैंने अपने समय का सदुपयोग करने की कोशिश की. धन्यवाद.

rajeev dubey के द्वारा
March 20, 2011

राजेन्द्र जी, होली चिंतन के लिए शुभकामनाएं… होली की बधाई

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 20, 2011

तो जाते-२ चार लाइनें जबरन, बिना डिमांड के ठोक रहा हूँ- विद्वान् राजेन्द्र जी चिंतन की दुनिया से निकल कर ” मजा नहीं है होली में …. मजा आ गया बोली में मेरी दुवाये होली में

vinita shukla के द्वारा
March 20, 2011

होली के अवसर पर शुभ सन्देश देता हुआ लेख. यदि लोग अपनी निजी आवश्यकताओं के साथ साथ देश और समाज की जरूरतों पर भी गौर करने लगें, तो सुधारों के लिए कोई कमेटी बनाने की नौबत ही नहीं आएगी.

Harish Bhatt के द्वारा
March 20, 2011

राजेंद्र जी सादर प्रणाम, आपने बहुत सही कहा कि स्वच्छ जल, वायु, पेड़-जंगल अर्थात स्वच्छ पर्यावरण जो कि जीवन जीने के लिए आवश्यक तत्व हैं. पर्यावरण होगा तो मानव रहेगा. बहुत ही बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 20, 2011

भईया, बिलकुल सही लिखा है आपने… कुछ इसी से मिलते जुलते विचार मैंने भी अपने लेख ‘हमारी विरासत:एक बेहतर कल’  में भी ज़ाहिर किये थे| परम्पराओं का निर्वहन वही तक ठीक है जो मानवता के हित में हो| आभार आपका,

    March 20, 2011

    वाहिद भाई, गंगा किनारे होने के कारण पहल करने का सबसे बड़ा दायित्व तो हमारा ही बनता है. आपका कहना वाजिब है कि परम्पराओं का निर्वहन वही तक ठीक है जो मानवता के हित में हो. एक बार फिर से होली की शुभकामनाएं.

baijnathpandey के द्वारा
March 20, 2011

आदरणीय राजेंद्र जी ….जानकर दुःख हुआ साथ हीं हर्ष भी कि ऐसी परिस्थिति में भी आप चिंतन कर सकते हैं …भैया फिर भी आज तो हम नहीं छोड़ने वाले ……… …ये लीजिये बारूद ( अबीर ) का जबर्दश्त गोला ………..और हाँ बचियेगा वाहिद भाई भी बगल में हीं हैं और हाथों में पिस्तौल ( पिचकारी ) थामे हैं …….सा रा रा रा

    March 20, 2011

    प्रिय बैजनाथ जी आपका बारूद ( अबीर ) का जबर्दश्त गोला ठीक मेरे बगल से होता हुआ वाहिद भाई के मुंह पर जा लगा है और वो गुस्से में अपनी बनारसी मिसाइल (पान की पिचकारी) लिए हुए आपको ही ढूंढ रहे हैं. एक बार फिर से होली की शुभकामनाएं.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 21, 2011

    ये चली मेरी मिसाइल…और….उफ़….निशाना…..नहीं-नहीं…चूका नहीं…बिलकुल सही जगह पर लगा…

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 20, 2011

प्रिय गोल्डन जुबली कुमार जी ….. पैरी पैना ! मैं आपके दुःख में शामिल हो जाता हूँ और आप मेरे सुख में शामिल हो जाओ …… हमने तुम्हारे नाम पहले अपना दिल , फिर अपनी सारी खुशिया और बाद में अपनी जान कर दी …. तुम मेरे नाम सिर्फ अपने गम कर दो , ओ मेरे हमदम बस मुझ पर इतना सा करम कर दो ….. धन्यवाद

    March 20, 2011

    प्रिय भ्राता राजकमल जी …. पैरी पैना ! और हम दोनों यूं ही एक-दुसरे को पैरी पैना करते रहे तो निरंकारी हो जायेंगे. आपने तो वो गाना याद दिला दिया- तुम अपना रंजोगम, अपनी परेशानी मुझे दे दो, तुम्हे गम की कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो. एक बार फिर से होली की शुभकामनाएं.


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