अंगार

My thoughts may be like 'अंगार'

84 Posts

1247 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3502 postid : 772

मेरे हमनवाज

Posted On: 25 Mar, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

जब मशाल जलाई थी

तब हम

बहुत सारे थे,
आग फैली

तो पता चला

सबको अपने घर प्यारे थे.


 

जब आग के दरिया में उतरा

तब मेरे साथ उतरे

बहुत सारे थे

पार पहुंचा तो देखा,

वो अभी तक खड़े

उसी किनारे थे.

 

मंजिल पे पहुँच के मुड़ा

तो पाया

खुद को अकेला,
‘राज’ समझ नहीं पाया

भाग गए कहाँ,
मीर जाफ़र सारे थे.

 

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

33 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 29, 2011

श्री राजेन्द्र जी, कही आपकी ये रचना किसी के लिए तो नहीं..मेरा कहने का मतलब शायद आप समझ गए होंगे…..मगर एक बात कहूँगा बहुत खूबसूरत रचना… आपने मुझसे ब्लोगिंग से दूरी के बारे में पूंछा था..आजकल बहुत व्यस्तता चल रही है..बिजनेस,पढ़ाई सभी में बहुत समय खर्च हो रहा है…लेकिन मै देर-सबेर हाजिरी लगवा ही देता हूँ…. आकाश तिवारी

    March 29, 2011

    प्रिय आकाश जी, सबसे पहले तो मैं कहना चाहूंगा कि मेरा काम था लिखना तो लिख दिया, विश्लेषण आपके हाथ में है. वैसे ये रचना इन जनरल है. कभी ये पंक्तियाँ पीयूष पन्त जी को एक प्रतिक्रिया में लिखी थीं. याद आया तो फिलर के तौर पर पोस्ट कर दीं. दूसरी बात ये कि सबसे पहले अपने मुख्य काम, बिजनेस,पढ़ाई आदि प्राथमिक हैं, बाद में अन्य काम हैं. इसलिए आपको पहले उस ही ध्यान देना लाजिमी है. धन्यवाद.

March 28, 2011

प्रिय वाहिद भाई, ‘राज’ के सभी ‘राज़’ तम्हें तो पता ही हैं. राज की बात यही है कि कभी कभी मैं खुद भी राज बन जाता हूँ.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 28, 2011

भईया,  आपको छोड़ कर मैं कहाँ जाऊँगा। आपके ‘राज’ का ‘राज़’ कुछ समझा भी कुछ नहीं भी| आगे आप समझा देना|

March 27, 2011

अलका जी आप ठीक कहती हैं कि….अपनी मंजिल तो स्वयम अकेले ही तय करनी पड़ती है…….यही आज की हकीकत है. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

Alkar Gupta के द्वारा
March 27, 2011

राजेन्द्र जी , अपनी मंजिल तो स्वयम अकेले ही तय करनी पड़ती है और जो मुश्किलों के रहते हुए भी अपनी मंजिल तक पहुँच जाते हैं वे ही सफल राहगीर होते हैं………बहुत ही अच्छे भावों को सुन्दर अभिव्यक्ति दी है !

Arunesh Mishra के द्वारा
March 26, 2011

खूब लिखा राजेंद्र जी.

kmmishra के द्वारा
March 26, 2011

जब आग के दरिया में उतरा तब मेरे साथ उतरे बहुत सारे थे पार पहुंचा तो देखा, वो अभी तक खड़े उसी किनारे थे. कुछ तो मजबूरी होगी, ऐसे ही कोई बेवफा नहीं होता. या शायद उन्हें तैरना नहीं अत होगा. वैसे कविता जोरदार है.जय भारत.

    March 26, 2011

    सम्माननीय मिश्रा जी, जहां तक मैं समझता हूँ तो इसे मजबूरी नहीं भय कहते हैं, और इसी भय की वजह से लोग जीवन भर तैरना नहीं सीख पाते. वैसे ये कविता है या नहीं, ये तो आप ही बेहतर बता सकते हैं. मैं तो इसे बस चंद पंक्तियाँ कहता हूँ. ‘मैंने तो खींची थीं बस कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं, दानिशमंदों ने, इसे कलाकृति बना दिया.’ जय भारत.

shiromanisampoorna के द्वारा
March 26, 2011

राजेंद्रजी,अतिसुन्दर रचना बधाई स्वीकारें /

nikhil के द्वारा
March 26, 2011

बहुत खूब राजेन्द्र जी. अति सुन्दर. बधाई.

abodhbaalak के द्वारा
March 26, 2011

क्या बात है भय्या जी, क्या लिखा है, ऐसे ही अपने कलम (लेखनी ) का जादू …… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    March 26, 2011

    प्रिय गोल्डन जुबली कुमार जी ….नमस्कार ! ऐसा लगता है की यह कविता “आवशयकता आविष्कार की जननी है” की तर्ज पर ताजातरीन लिखी गई है ….. ******************************************************************************** प्रिय अबोध जी ….. सस्नेह नमस्कार ! आप कब तक अपनी तोतली आवाज में अधूरी मगर गहरी बाते करते रहेंगे ?

    abodhbaalak के द्वारा
    March 26, 2011

    राज जी, जब तक मई बड़ा नहीं हो जाता तब तक …. :)

    March 26, 2011

    अबोध जी नमस्कार, बड़े दिनों बाद आपके दर्शन हुए. आपको ये चाँद पंक्तियाँ पसंद आईं, इसके लिए मैं आभारी हूँ.

    March 26, 2011

    प्रिय राजकमल जी ….नमस्कार ! आपने काफी सही पकड़ा है, वाकई ये रचना कुछ-कुछ इसी तर्ज पर है. मेरे व्यक्तिगत अनुभव इसमें शामिल हैं. धन्यवाद.

    March 26, 2011

    अबोध जी से एक चीज सीखने को मिली है कि अबोध रहकर मजा लेने में ही फायदा है. ज्यादा सयाना बनना भी हानिकारक होता है. इसलिए अबोध जी जानबूझकर अबोध बने हुए हैं और बड़े नहीं होना चाहते.

    abodhbaalak के द्वारा
    March 27, 2011

    :) काश मई इतना समझदार होता ……

allrounder के द्वारा
March 26, 2011

भाई राजेंद्र जी, नमस्कार बहुत बेहतरीन रचना ! जब मशाल जलाई थी तब हम बहुत सारे थे, आग फैली तो पता चला सबको अपने घर प्यारे थे. बेहतरीन उदगार ! आभार !

    March 26, 2011

    सचिन भाई नमस्कार, आपके जैसे कुशल कवि की सराहना मिलना बड़ी बात है. धन्यवाद.

Harish Bhatt के द्वारा
March 26, 2011

राजेंद्र जी सादर प्रणाम, bahut hi behtarin kavita ke liye hardik badhayi.

    March 26, 2011

    हरीश जी प्रणाम, आपको ये चाँद पंक्तियाँ पसंद आई, इसके लिए शुक्रिया.

आर.एन. शाही के द्वारा
March 26, 2011

राजेंद्र जी, पंक्तियां बयान करती हैं कि मशाल थामने के बाद पीछे मुड़ कर देखने का कोई फ़ायदा नहीं । मशाल यदि सचमुच प्रज्वलित है, तो कहीं न कहीं मंज़िल को क़दम चूमना ही होगा -’मैं चला था तनहा ज़ानिबे मंज़िल मगर, लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया’ । बधाई ।

    March 26, 2011

    आदरणीय शाही जी प्रणाम, आपकी पहली पंक्ति से तो मैं सहमत हूँ कि…….मशाल थामने के बाद पीछे मुड़ कर देखने का कोई फ़ायदा नहीं………….पर अंत में जो बहुप्रचलित पंक्ति है वह आज के यथार्थवाद से कोसों दूर है और अब कहावत के तौर पर ही इस्तेमाल की जा सकती है. अब न तो लोग जुड़ते हैं और न ही कारवाँ बन पाता है. इसके शाश्वत उदाहरण मैं दे सकता हूँ. आप कोई चकल्लस लिखिए तो लोग कूद-२ कर आपके साथ आयेंगे, पर आप कुछ गंभीर और सार्थक लिख कर देखिये……मेरी बात सत्य हो जायेगी. वास्तविक क्रान्ति तो दूर की बात है, वैचारिक क्रांति में भी आपसे जुड़ने में लोग घबरा जायेंगे. मेरा व्यक्तिगत आंकलन तो यही है. धन्यवाद.

vinitashukla के द्वारा
March 26, 2011

चेहरे पे चेहरा चढ़ाये हुए लोग बहुतेरे हैं, पर सच्चाई का साथ देने वाले बहुत कम हैं; यह बात प्रभावी ढंग से उजागर हुई है आपकी कविता में. सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई.

ashvinikumar के द्वारा
March 26, 2011

राजेन्द्र भाई ,नमस्कार ,,आपका काव्य सत्यता के अत्याधिक करीब है या यूँ कह दें की सत्य है,,सत्य मार्ग अत्याधिक दुस्कर होता है और छदम वेश धारी जो मुखोटे के अन्दर खुद को छुपा कर रखते हैं,सत्य पथ पर उनके लिए चल पाना असम्भव है ..,, चिंगारी को शोला बनाने की ठान ली है ,,हिम्मते मर्द मददे खुदा ,,…….जय भारत

    March 26, 2011

    अश्विनी जी नमस्कार, आपने इस काव्य का बेहतरीन भावार्थ किया है. जय भारत.

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 26, 2011

जब मशाल जलाई थी तब हम बहुत सारे थे, आग फैली तो पता चला सबको अपने घर प्यारे थे. विद्वान् राजेन्द्र जी सागर से भी गहरे श्रोतो से स्फुटित हुआ यह मंथन एक झोके में ही यथार्थ को किनारों की गोद में पटक कर नवीन अभिव्यक्ति के लिए ओझल भी हो गया | अनुत्तरित प्रश्नों की यह प्रमेय क्या हल होगी ? बहुत बहुत बधाई ५/५

    March 26, 2011

    आदरणीय बाजपेई जी प्रणाम, आपके ५/५ अपने आप में एक बहत बड़ा रिवार्ड हैं, इस नाचीज के लिए. आपके स्नेह से मैं आह्लादित हूँ. कृपया यूं ही स्नेह बनाए रखें.


topic of the week



latest from jagran