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पहाड़ पुकारता है

Posted On: 19 Aug, 2011 में

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थम चुकी है बारिश

बस रह-रह कर गीली दीवारों से

कुछ बूँदें टपक पड़ती है

मैं अपनी छत पर जाकर

देखता हूं पहाड़ों का सौंदर्य

कितना खुशनसीब हूं मैं

कि पहाड़ मेरे पास हैं

 

मेरे घर के ठीक सामने के पहाड़ पर

है बाबा नीलकंठ का डेरा

इधर उत्तर में विराजमान हैं

माता कुंजापुरी आशीष दे रहीं

इनके चरणों मैं बैठा हूँ

कितना खुशनसीब हूं मैं

कि पहाड़ मेरे पास हैं

 

बारिश के बाद अब धुलकर

हरे-भरे हो गए हैं पहाड़

सफ़ेद बादलों के छोटे-२ झुण्ड

बैठ गए है इसके सर पर

इस अप्रतिम सौंदर्य को निहारता हूँ

कितना खुशनसीब हूं मैं

कि पहाड़ मेरे पास हैं

 

पहाड ने दिए हमें पेड़, पानी, नदियाँ, गदेरे

ये रत्न-गर्भा और ठंडी बयार

पर पहाड़ का पानी और जवानी

दोनों ही बह गए इसके ढलानों पर

मैं पहाड़ पर नहीं हूँ फिर भी

कितना खुशनसीब हूं मैं

कि पहाड़ मेरे पास हैं

 

पहाड़ को कभी रात में देखा है

हमारी संस्कृति का ये महान प्रतीक

अँधेरे में सिसकता है, दरकता है

पुकारता है आर्द्र स्वर में कि लौट आओ

मैं पहाड़ पर लौट नहीं पा रहा हूँ पर

कितना खुशनसीब हूं मैं

कि पहाड़ मेरे पास हैं

 

ये खुदेडा महीना उदास कर रहा है क्यों

बादल ही तो बरसे हैं फिर

भला आँखें मेरी नम हैं क्यों

पहाड़ रो रहा है, हिचकी मुझे आती है क्यों

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ

क्या वाकई खुशनसीब हूं मैं

कि पहाड़ मेरे पास हैं

 

नोट- इस कविता में पहाड़ों से युवाशक्ति के पलायन और पहाड़ का दर्द व्यक्त करने की ये मेरी एक कोशिश भर है|

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahulpriyadarshi के द्वारा
August 21, 2011

राजेंद्र जी,आप वाकई खुशनसीब हैं. बहुत खूबसूरती से आपने यह कविता प्रस्तुत की है..अत्यंत मनोरम.

Santosh Kumar के द्वारा
August 20, 2011

आदरणीय राजेंद्र जी ,..सादर नमस्कार मैं बहुत कम पहाड़ के करीब रहा हूँ ,..लेकिन पहाड़ भूल नहीं सकता ,…पहाड़ के युवाओं का दर्द आपने बड़ी ही खूबसूरती से व्यक्त किया है ..अप्रतिम रचना ,..बधाई ,..

rajkamal के द्वारा
August 20, 2011

प्रिय जुबली कुमार जी …आदाब । आपको देख कर हार्दिक खुशी हुई लेकिन यह बात भी अपनी जगह भी अपनी जगह पर सही है की हम दूर रह कर पास और पास रह कर भी दूर है वैसे आपके आने की आशा तो छोड़ ही दी थी देर लगी आने में तुमको शुक्र है फिर भी आये तो फेसबुक पर आपके संक्षिप्त विचार पढ़ने के बाद हर बार यही सोचता था की काश आपके पुरे लेख पढ़ने को मिल जाए ….. वोह तमन्ना अब पूरी होगी …… और जहाँ तक पहाड़ के गम की बात है उसके बारे में इतना ही कहना चाहता हूँ की पहाड़ को हरिआली से प्यार तथा प्रदुषण से घोर नफरत होती है ….. धन्यवाद

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 21, 2011

    खुशामदीद ! खुशामदीद !! आचार्य उपाध्याय जी का बटुक की मायानगरी में स्वागत है । पहाड़ बस आपही की प्रतीक्षा में हैं । श्री वाहिद जी तो हो आए, परन्तु प्रभु आप तो होली के बाद से ही जो पहाड़ों से रुष्ट हुए, तो फ़िर जैसे बिसार ही दिया अपनी ससुराल को ।

आर.एन. शाही के द्वारा
August 20, 2011

एक व्यंग्य लेखक नुमा रचनाकार की बहुमुखी प्रतिभा की परिचायक भावपूर्ण काव्य रचना । बधाई राजेंद्र जी !

August 20, 2011

आप सभी विद्वान जन की सराहना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद….

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    August 20, 2011

    सस्ते में निकल लिए आप तो.. चलिए आपकी मजबूरियां समझ सकता हूँ..

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 20, 2011

    मजबूरी नहीं, स्टाइल है भइया, स्टाइल ! अकारण रणछोड़ी की मिसाल कायम कर रहे हैं दोनों गुरु चेले । समझे कि नहीं समझे ? सत्य हरिश्चंद के ज़माने में एक थे उपाध्याय जी, और दूसरे बटुक जी हुआ करते थे । बस उन्हीं का अवतरण जानियेगा !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    August 21, 2011

    खुली किताब के सफ़ों से भी रहस्य को ढूंढ़ निकालना और नुमाया कर देना आप ही के वश का कार्य है गुरुवर। अब ज़रा इस स्टाईल के बाल की भी ख़ाल निकालने की ज़हमत उठायें तो उपाध्याय जी और बटुक जी की कथा हमें भी सुनने और समझने को मिले। सादर,

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 21, 2011

    दरअसल हाईस्कूल के एक टेक्स्टबुक ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ में काशी में सपरिवार बिक रहे राजा हरिश्चन्द्र की परीक्षा लेने भेष बदल कर आए ॠषि विश्वामित्र (उपाध्याय जी) तथा उनके शिष्य इंद्र (बटुक भेषधारी) का एक नाटकीय उद्धरण यहां मेरे द्वारा लिया गया है । गुरु कौन है और शिष्य कौन, आप खूब समझ रहे होंगे ।

वाहिद काशीवासी के द्वारा
August 20, 2011

भईया, गत दिनों जब मैं आपके और पहाड़ों के साथ था तो रानीखेत में बिताए गए कुछ दिनों ने मुझे बहुत कुछ सोचने और समझने को मजबूर कर दिया था। एक पहाड़ी मानुष के साथ अनवरत बिताए गए १४४ घण्टों में मैंने बहुत कुछ सीखा और कुछ करने को भी प्रेरित हुआ। आपकी इस कविता में मैंने वो सबकुछ पाया जो वहाँ रहकर मैंने जाना और समझा। सियासत के दांवपेंच में फंसी पहाड़ी ज़िंदगी के दिन कब बहुरेंगे ये कहना मुश्किल है मगर वहाँ से हज़ार किलोमीटर दूर होते हुए भी मेरा दिल वहाँ के लिए बड़ी शिद्दत के साथ धड़कता है। शेष आपकी कविता पर कोई प्रतिक्रिया देना मेरे सामर्थ्य के बाहर है।

HIMANSHU BHATT के द्वारा
August 20, 2011

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है ….. आपको धन्यवाद…

div81 के द्वारा
August 20, 2011

बहुत ही खूबसूरती से आपने पहाड़ के सौन्दर्य और पहाड़ के दर्द को शब्दों के जरिये उकेरा है | सुन्दर कृति

Alka Gupta के द्वारा
August 20, 2011

राजेन्द्र जी , एक लम्बी अनुपस्थिति के बाद मंच पर पुनरागमन के लिए स्वागत ! रचना पढ़कर अप्रतिम पर्वतीय प्राकृतिक सौन्दर्यानंद की रसानुभूति हुई ! श्रेष्ठतम कृति !

Rajkamal Sharma के द्वारा
August 19, 2011

किस बात पे नाराज हो किस बात का है गम किस सोच में डूबे हुए हो हो ही जाएगा किसी न किसी से संगम पहाड़ की नजदीकिया और उनके उपजे निराले एहसासों को ब्यान करती हुई सुंदर रचना ] :) :( ;) :o 8-) :|

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    August 20, 2011

    कहाँ नदारद दे भाईसाहब आप..हैं..हम तो ढूंढते ही रह गए..


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