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ढिंग चिका से अन्ना हजारे तक

Posted On: 22 Aug, 2011 मस्ती मालगाड़ी में

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जब से ‘ढिंग चिका- ढिंग चिका रे ऐ ऐ’ जैसी महान पद्य रचना सुनी है, मुझे अपने साहित्यिक टैलेंट पे धिक्कार हो रहा है कि कमबख्त ये महान रचना मेरी लेखनी से क्यों नहीं निकली| मुझे रश्क हो रहा है आशीष पंडित जैसे मूर्धन्य रचनाकार से जिनकी लेखनी पर सरस्वती स्वयं विराजमान हुईं और ये रचना भारत के जन-जन तक पहुँची| मुझे अपने अत्यंत सम्मानित गुरूजी, जिन्होंने होली के पावन पर्व पर कई साथियों के कपडे दौड़ा-दौड़ा कर फाड़े थे, से भी शिकायत है कि कम से कम उनके दिमाग में ही इस खुरापात रचना ने जन्म लिया होता| जिस खुशकिस्मत लेखक के सर पर ज्ञानी जी जैसी महान हस्ती का वरदहस्त हो और जिसका इंदरजीत प्रा जैसा टेलेंटेड भाई हो, वो कितना खुरापाती (उफ्फ…बार-२ कलम बहक क्यों रही है) महान होगा| इनके ही पोल-खोल और कपडे उतारू लेखों के चलते ही इस प्लेटफार्म का रॉयल लोटस भी उखड कर ब्लॉग्गिंग से संन्यास की घोषणा करने पर मजबूर हो गया था और छोटे-मोटे कई लेखक तो इस धंधे को ही छोड़कर उलटे पाँव भाग खड़े हुए और परचून की दुकान खोल ली| पंगेबाजी और दूसरों के कपडे उतार देने की इनकी असीम क्षमता के चलते ही हमने इन्हें गुरु बनाया था पर ये दुनिया के एकमात्र ऐसे गुरु हैं जो अपने ही चेलों के कपडे फाड़ते रहते हैं| ये महान पुरुष अपने चेलों को चीनी बनते देख नहीं सकते, इस बात से इनके पेट में दर्द हो जाता है| पर सच्चा चेला तो वही जो चीनी हो जाय और गुरु को गिन्दौडा साबित कर दे| तो हम भी कम नहीं हैं, चीनी भले बने न बनें पर गुरूजी को गिन्दौड़े से आगे नहीं बढ़ने देंगे, यही हमारे देश की गुरु-शिष्य परंपरा है|

 

पता नहीं मैं विषय से भटक क्यों जाता हूँ| वैसे यही मेरी लेखनी की खासियत है कि कमबख्त पता नहीं किधर-२ मुंह मारने लगती है | हाँ जी , तो गुरूजी और मैं, हम दोनों की कलम तो इस महान रचना से चूक गई और आशीष पंडित फिल्म साहित्य में अमर हो गए| कभी-२ सोचता हूँ कि किसी तरह बालीवुड चला जाऊं तो अच्छे-अच्छे गीतकारों की छुट्टी कर दूं| वहीं मेरी लेखकीय प्रतिभा का सही आंकलन हो सकता है, यहाँ तो कमअक्लों आप जैसे महान लेखकों के बीच मेरी दाल नहीं गल पा रही है| हमारे शहर के पंजाबी मोहल्ले का मेरा मित्र सन्नी कहीं दूर के रिश्ते में देव कोहली का भतीजा लगता है| अरे वही देव कोहली जिन्होंने ‘ऊँची है बिल्डिंग लिफ्ट तेरी बंद है’ जैसी महान रचना देकर भारत माता के जनों को कृतार्थ किया| बस उनसे एक बार मुलाक़ात हो जाय, मैं भी उन्हें बता दूंगा ऐसी कितनी ही कबाड महान रचनाएं मेरे दिमाग में भरी पडी हैं| वो तो कुछ अपने चरित्र में बेवजह ठूंस दिए गए संस्कारों और कुछ आप जैसे बुद्धिजीवियों के हतोत्साहन का असर है कि मेरी ये रचनाएँ टायलेट-बाथरूम तक ही सीमित रह गई हैं, वरना बानगी देखिये-

 

‘वो छत पे खड़ी है, और मुझे बुला रही है,

क्या पाईप से चढ जाऊं, उसके घर में सीढ़ी नहीं है….’

 

अब आप सोच रहे होंगे कि जब सीढ़ी नहीं है तो वो छत पर गई कैसे? तो भईया यही तो कल्पनाशीलता और मौलिकता है, जहां न पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे फ़िल्मी कवि | ऐसे कमियां निकालने की बात हो तो मैं भी कह सकता हूँ कि जब बिल्डिंग ऊँची थी तो टॉप फ्लोर वाली से प्यार करना जरूरी था क्या? ग्राउंड फ्लोर पे नहीं मिली क्या कोई? और अगर लिफ्ट भी बंद थी तो कमबख्त तेरी टाँगे टूट गई थीं जो सीढियां चढ के ऊपर नहीं जा सकता था? प्यार में तो लोग टॉप फ्लोर पे जाके नीचे कूद के जान दे देते हैं, तू लल्लू मिलने भी नहीं जा सकता? मेरे एक और टॉप क्लास गीत की पंक्तियाँ हैं-

 

मुन्ना बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे लिए,

मैं हिमानी बोरो प्लस हुआ डार्लिंग तेरे लिए…..

 

अब आप कहोगे कि ये कैसी उटपटांग रचना है, तो हे पाठक वृन्द आपने चुलबुल पांडे की फिल्म में देखा ही होगा कि कैसे मुन्नी झंडू बाम हिप्स पर मलने का इशारा करती है| इस गाने के महान कोरियोग्राफर के हिप्स पर अगर झंडू बाम मल दिया जाय तो शर्तिया कहता हूँ दोस्तों, जिंदगी भर ऐसी कोरियोग्राफी नहीं करेगा….वहीं दूसरी ओर मेरे गीत में चूंकि बोरोप्लस है, हिप्स पर लगाने से खुशबू भी आयेगी, जलन भी नहीं होगी और कोई घाव होगा तो एंटीसेप्टिक का काम भी करेगी| एक और रचना पेश है (क्या करूं कई महीनों बाद इधर आया हूँ, इतना तो मेरा हक भी बनता है) –

 

यस-यस-यस बलवंत ,

बलवंत की जवानी,

बस तेरे हाथ ही आनी…

 

अब चुप भी बैठिये, हर बात पे खोट निकालने की आदत ठीक नहीं है, चलिए फिर भी एक्सप्लेन कर ही देता हूँ| वो कमबख्त शीला जब हाथ ही ना आनी तो किस काम की उसकी जवानी? बलवंत हट्टा-कट्टा गबरू जवान भी है और आने के लिए तैयार भी है| दूसरा, मोहल्ले की एक कन्या को लेकर बलवंत से मेरा सालों से पंगा भी है| इस गाने के बाद आल इंडिया में बलवंत को बदनाम भी कर दूंगा कि लंगोट का कच्चा आदमी है| भाई जब ललित पंडित और विशाल डडलानी जैसे महान गीतकार बिना किसी दुश्मनी के मुन्नी और शीला नाम की संभ्रांत घरों की महिलाओं को बदनाम कर सकते हैं, तो बलवंत से तो मेरा पुराना पंगा है|  यकीन नहीं होता कि इस देश की राष्ट्रपति एक महिला हैं और शीला नाम की महिला तो देश की राजधानी दिल्ली की मुख्यमंत्री भी हैं| हो सकता है कि वो इसलिए चुप हों कि वो जवान नहीं हैं|

 

वैसे हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कला की बड़ी कद्र है, भले ही वो चोरी की कला ही हो| बड़े-२ गीतकार-संगीतकार अपनी इसी कला के चलते कई सालों से अपना झंडा बुलंद किये हुए हैं बल्कि उसपे तुर्रा ये कि बीच-बीच में अपनी बेसुरी आवाज में गायन में भी हाथ साफ़ कर लेते हैं| मेरे जैसा मोहम्मद रफ़ी का महान भक्त जब-२ अन्नु मलिक जैसे नामाकूल और नालायक  गायक का गाना सुनता है तो अपने १०-१५ बाल तो बेवजह नोच ही लेता है| मन में आता है कि कहीं मिल तो जाय ये बंदा, इसे उसी बिल्डिंग की छत पे ले जाके धक्का दे दूंगा, जिसकी इसने लिफ्ट बंद कर रखी है| जिसको खुद कुछ नहीं आता वो न जाने कहाँ-२ जज बना बैठा रहता है|  और जब से ये रैप नामक गायन कला हमारे देश में आई है, गीतों का तो रेप ही होने लगा है| बस ऐसा कुछ उटपटांग कह दीजिए कि इसको समझाने के लिए प्रेजेंटेशन देना पड़े, यही रैप है| वैसे रैप में भी मेरा हाथ तंग नहीं है|  रैप पर गौर फरमाएं-

 

आगड-बागड-धाकड, आऊ-बाउं आई-आई,

ठापटाझींगा टीन-कनस्तर ठांय-२ फुरर्र…….

 

मेरी बात का यकीन मानिए कि जब इस रैप को टोरंटो में रहने वाला पंजाबी पुत्तर कुप्री (कुलप्रीत), (जिसके पापा जी सन ६० में पंजाब से भागकर कनाडा चले गए थे और वहाँ बाल-बेयरिंग की फैक्ट्री में तोप के गोले बना के बड़ी मासूमियत से कहते थे- हैव आई मेड इट लार्ज?) अपनी पंग्रेजी (पंजाबी+अंगरेजी) भाषा में गायेगा तो ये एक हिट नंबर बनेगा| ऐसा ही कुछ हाल कोरियोग्राफरों का भी है| मोटे-२, थुलथुले नृत्य निर्देशक जिन्हें नृत्य तो पता नहीं आता है या नहीं पर इनके अंग-२ की चर्बी जरूर नृत्य करती रहती है| हमारे देश में पता नहीं कितने कत्थक नर्तक भूखों मर रहे होंगे पर ये मोटे-२ कोरियोग्राफर गलत-२ जगहों पर झंडू बाम लगाकर भी हिट हैं|

 

चलते-२ चार पंक्तियाँ और ठोक रहा हूँ, अपनों के बीच इतना हक तो बनता है, झेल लो-

 

तू चीज बड़ी है मस्त-२ , अन्ना हजारे

नहीं तुझको कोई होश-२ , अन्ना हजारे,

तुझपे जन सेवा का जोश-२, अन्ना हजारे,

देश-प्रेम में मदहोश हर वक्त-२ , अन्ना हजारे,

है पूरा देश तेरे साथ-२ , अन्ना हजारे

 

नोट- इस गाने पर सरकार नृत्य कर रही है जिसे कोरियोग्राफ कर रहे हैं- अन्ना हजारे |

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

praveen के द्वारा
August 25, 2011

लगता है आप इन महान रचनाकारों को धुल चाटने पे मजबूर कर दोगे ,अब ऐसी रचना आप को तो साहित्य सम्मान मिलना चाहिए ,

abodhbaalak के द्वारा
August 25, 2011

राजेंद्र भाई केवल एक प्रश्न– आप ये सब सोच कैसे लेते हो भय्या….. सलाम आपको …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

वाहिद काशीवासी के द्वारा
August 23, 2011

मालूम तो था कि आप देर-सबेर उसी रौ में वापिस लौटेंगे मगर अचानक से और यकायक.. एकबारगी यक़ीन करना मुश्किल हो रहा था पर नीचे गुरुवर की टिप्पणी पढ़ते ही फुलट्रुस यक़ीन आ गया क़सम गंगा मईया की। ये नोच-नुचउव्वल का कोटा अभी कोल्ड स्टोरेज में कुछ मात्रा में बचा होगा तब तो आगे भी काम आ जाएगा बस उसी महान युगान्तकारी अवसर की स्थिति बने तो। ढोल में पोल, ढोल पर खोल, और पोल को खोल का यह पुनीत कर्तव्य विशिष्ट अवसरों पर आनंददायक भी लगता है तो कभी विचित्र भी। ख़ैर, आपके इस बखिया उधेड़ लेख के प्रत्युत्तर में मैं भी अपनी औक़ात के छोटे से दायरे से छलांग मार कर बाहर निकल आया, इससे पहले कि कोई अनहोनी घटे मेरा अपने खोल में लौट जाना ही मुनासिब होगा।

    rajkamal के द्वारा
    August 26, 2011

    प्रिय भाई साहिब …आदाब ! आपने एक बार मूड में लेकिन बिलकुल सही फरमाया था की कुछेक बाते जाने अनजाने ही पता लग जाती है …. ************************************************************************ आपको जान कर खुशी होगी की मेरी रचना के शीर्षक से छेड़छाड़ करने वाले का सुराग भी मिल गया है ************************************************************************ सर विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था की यह जो सामने तुम भीड़ देख रहे हो मेरी जय जयकार करते हुए …. कल को अगर मुझको फांसी की सजा दे दी जाए तो यही सब लोग ही उसी तमाशा देखने वाली भीड़ का हिस्सा होंगे …. क्योंकि भीड़ का अपना कोई भी स्थाई चरित्र नहीं होता ….. धन्यवाद

आर.एन. शाही के द्वारा
August 22, 2011

मेरी लुटिया डुबोने में कोई कसर तो नहीं छोड़ी आपने, लेकिन फ़िर भी लीजिये क्या याद करेंगे कि सचमुच के किसी गुरु से पाला पड़ा था, आपको नबर वन व्यंग्यकार का खिताब बिना किसी से इज़ाज़त लिये ही आज सौंप रहा हूं । करीने से संभालकर ड्राइंगरूम के ऐसे कोने में रखियेगा जहां घुसते ही किसी की भी नज़र बस वहीं टिक जाय । उफ़्फ़ ! क्या क्या तोहमत नहीं लगा डाली, बस शर्म और मेरे बीच एक झीनी सी झड़ी चादर मात्र बच गई है । सोचता हूं उसे भी नोंचकर बेपर्द ही हो जाऊं । आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि आपके दूसरे इष्ट विशिष्ट कहीं गए नहीं हैं, दीवार में विवर बनाकर रह-रह कर जायज़ा लेते हैं, झांकते हैं, फ़िर अन्तर्ध्यान होते हैं । इनकी कलाओं के आगे बदली के चांद और मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर भी पानी भरते से दिखने लगे हैं । मैं तभी से परेशान हूं कि आखिर फ़ीचर लिस्ट की आज की पोस्ट्स पर मेरी टिप्पणियां पब्लिश क्यों नहीं हो पा रहीं । अभी-अभी शम्भू जी के लेख पर बड़ी मेहनत से लम्बी टिप्पणी लिखकर पोस्ट की, तो इसपर भी ‘You must be logged in to post a comment’ ने मेरा मुंह चिढ़ाते हुए धता बता दिया । लटके मुंह के साथ उम्मीद लिये आपके पास आया तो आपने भी अच्छा आईना दिखा दिया । अब मुझे लग रहा है कि यदि मेरे बारे में आपकी राय इतनी उम्दा किस्म की है, तो हो न हो, शायद जागरण ने भी ऐसी ही कोई गांठ तो नहीं बांध रखी ? जांचना पड़ेगा इसको । खैर, तबतक तो ढिठाई के साथ बने रहना ही नैतिक होगा । बहरहाल, आप मोहल्ले और न जाने कहां-कहां की कन्याओं के साथ अपने मनपसन्द शगल में मस्त रहिये, यही दिली दुआ है । आपके डर से आपके इष्ट ने शादी का अपना इरादा फ़िलहाल बदल दिया है, आपको शायद इसकी जानकारी मुझसे पहले वाहिद काशीवासी ने भी नहीं दी होगी । अब खुद सोचिये कि आप क्या हैं, और मैं क्या हूं । भगवान जानता है कि मैंने हमेशा लोगों का घर बसाने का नेक कार्य किया है, उजाड़ने का नहीं । आपके ‘राँयल लोटस’ उर्फ़ श्री राजकमल जी शर्मा को मेरी यही कीमती सलाह होगी कि कहीं मामला फ़िट करने से पूर्व एक बार अपनी आस्तीन को भली भांति अवश्य झाड़ लें । मैं तो फ़िर भी धन्यवाद ही कहूंगा ।


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