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लोकपाल बिल का ड्रामा

Posted On: 26 Aug, 2011 Others में

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आज के समय में टेक्नोलॉजी अपने चरम पर है और टेक्नोलोजी का फायदा चाहे किसी को भले न हुआ हो पर मीडिया ने इसका जमकर फायदा उठाया है | आज के समय में मीडिया चाहे तो किसी को भी जीरो से हीरो बना दे या हीरो से जीरो बना दे| अब खबरे नहीं छपती बल्कि सीधे ‘तहलका’ मचता है, अब सीधे सीडी कांड होते है| बोरवेल में बच्चे तो गिरते रहते हैं पर मीडिया केवल किसी एक को ही बचाता है| इंटरव्यू लिए नहीं जाते बल्कि पूर्वनियोजित होते हैं| अन्ना हजारे की महानता से मुझे इनकार नहीं है पर इसमें इलेक्ट्रोनिक मीडिया और साइबर क्रान्ति का भी बड़ा योगदान है| फेसबुक, गूगल और ट्विटर जैसी सोशियल नेट्वर्किंग साइट्स आज लोगों को जोड़ने और विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया बन चुकी हैं| ये मीडिया ही है जो आज अन्ना हजारे की तुलना महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण से होने लगी है, लेकिन जरा गौर कीजिये कि जब महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन, अनशन किये तब ऐसा कुछ नहीं था बल्कि दुर्गम और पिछड़े इलाकों में तो कई-कई दिन तक अखबार भी नहीं पहुँच पाते थे जबकि आज अति-दुर्गम क्षेत्रों तक भी कम्प्यूटर और इन्टरनेट के पहुंच जाने से आदमी पूरे विश्व से हरदम जुडा हुआ है | कहने का लब्बो-लुआब ये है कि अन्ना और बाबा तो इस देश में बहुत हैं पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव बनाए जाते हैं| इस देश में धोती-चद्दर बांधे और दाढ़ी रखे हुए कितने ही बाबा हैं पर जो चालाक होगा, टैक्नोलोजी और मीडिया को साथ लेकर चलेगा, वो बड़ा बाबा बन जाएगा| बिहार से शोषित और गरीब बाहर निकलता है तो मजदूर बनके लेकिन जो तेज होता है वो मजदूर से मिस्त्री और मिस्त्री से ठेकेदार बनता है|

 

अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल की मांग और वेब ने पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ दिया है, भले ये बात और है कि बहुतों को न तो इसकी जानकारी है और न ही इससे कुछ लेना-देना है| अब भला छोटे-२ बच्चों को इससे क्या लेना देना, पर लोग हैं कि उनके कैंडल मार्च निकलवा रहे हैं| मेरा दावा है कि फेसबुक जैसी किसी सोशियल नेट्वर्किंग साइट्स पर आप केवल अन्ना हजारे या लोकपाल लिखकर आगे भले पामेला एंडरसन या ब्रिटनी स्पीयर्स की कहानी लिख दो, पोस्ट करते ही कितने ही लोग बिना पढ़े ही ‘Like’ पर क्लिक कर देंगे बल्कि कितने ही लोग तो कमेन्ट भी कर देंगे- ग्रेट, बहुत बढ़िया, अन्ना जिंदाबाद, सरकार मुर्दाबाद….|

 

चाहे लोकपाल बने या जन लोकपाल, टीम अन्ना का हो, अरुणा का हो या सरकारी, किसी से कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला | भ्रष्टाचार इस देश में क्रोनिक डिसीज बन चुका है, इसलिए एकदम से ये बीमारी ठीक नहीं होने वाली| अगर इस देश से भ्रष्टाचार का रोग मिटाना है तो कुछ नुस्खे अपनाकर इसका धीरे-२ इलाज करना होगा | कुछ छोटी-२ पर अहम् बातें जिन पर विचार किया जाना चाहिए, उनका वर्णन यहाँ पर कर रहा हूं -

 

नैतिकता और आचरण - हमारे देश में इस समय नैतिक शिक्षा का सर्वथा अभाव है| पहले प्राइमरी स्कूलों या सरकारी स्कूलों में नैतिक शिक्षा पढ़ाई जाती थी| लोग अपने बच्चों को गीताप्रेस, गोरखपुर की किताब लाकर देते थे जिनमें नैतिक शिक्षा से प्रेरित कहानियां रहती थीं| शिक्षा के आधुनिकीकरण और व्यवसाईकरण ने अधकचरे प्रोडक्ट तो बढाए पर नैतिक शिक्षा गायब हो गई| न जाने ये कैसी शिक्षा है जिसमें कि छात्र ९८-१००% तक नंबर ला रहे हैं| हमारे समय में ६०% नंबर लाना बहत बडी उपलब्धि होती थी और डिस्टिंक्शन (७५%) पर तो आदमी जिंदगीभर लोगों को बड़े गर्व से बताता था कि उसकी फलां विषय में डिस्टिंक्शन थी| हमारे मास्टरजी साफ़-साफ़ कह देते थे कि बेटा चाहे डिट्टो किताब उतार दे पर ५ में से ३ नंबर से ज्यादा किसी हाल में नहीं दूंगा| आज देश में इसी नैतिक शिक्षा और आचरण की बहुत कमी है और भ्रष्टाचार का ये मूल कारण है| कितने लोगों में ये नैतिकता है की वे अपना अपराध या गलती स्वीकार कर सकते हैं या अपनी गलती पर पश्चात्ताप करते हैं | यहाँ तक कि कई बार ऐसा देखा गया है कि अदालत को भी मजबूर होकर ये कहना पड़ा कि अदालत को पता है कि अपराधी ने अपराध किया है पर सबूत नहीं है| कई बार थर्ड अम्पायर भी चूक जाता है पर बैट्समैन को पता होता है कि गेंद उसके बल्ले पे लगी या नहीं| किसी जमाने में सुनील गावस्कर के बारे में प्रसिद्द था कि अम्पायर के निर्णय की प्रतीक्षा किये बिना ही स्वयं ही पेवेलियन लौट जाते थे क्योंकि उन्हें स्वयं पता होता था कि वे आउट हैं| पर अब देखिये, खिलाड़ी आउट होने के बावजूद इस बात का इन्तजार करते हैं कि शायद टैक्नोलोजी और थर्ड अम्पायर चूक जाएँ और वे बच जाँय|

 

बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की प्रकरण सामने आने के बाद अमेरिका के लोग बिल क्लिंटन से नाराज हुए तो केवल इसलिए कि उन्होंने सच को छुपाने की कोशिश की, न कि मोनिका लेविंस्की से उनके संबंधों की वजह से| और जब उन्होंने सच स्वीकार कर लिया तो लोगों ने उन्हें माफ़ भी कर दिया क्योंकि वे अपना काम बेहतर तरीके से कर रहे थे| हैन्सी क्रोनिये ने सट्टेबाजी की बात स्वीकार कर ली थी क्योंकि कहीं उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कार रही थी, पर अजहरुद्दीन और जडेजा की अंतरात्मा को क्या हुआ?  बीसीसीआई भी इस बात को जानती थी कि ये दोनों दोषी हैं और इसी वजह से उन्हें आगे क्रिकेट नहीं खेलने दिया गया पर इन्होने अपना अपराध कभी स्वीकार नहीं किया| और तो और अजहरुदीन तो सांसद भी बन गए|

 

अभी  हाल ही में विश्व प्रसिद्द मीडिया मुग़ल रूपर्ट मर्डोक ने फोन हैकिंग में नाम आने के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इंग्लैंड के राष्ट्रीय अखबारों में बाकायदा अपने हस्ताक्षर से ‘We are sorry’ के विज्ञापनों की सीरीज चलाई और लोगों से माफी माँगी| कितने लोग इतना बड़ा कलेजा रखते है?

http://www.guardian.co.uk/media/interactive/2011/jul/15/rupert-murdoch-phone-hacking-apology-ad

 

हमारे देश के कई बड़े-बड़े नेता इस समय भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में बंद हैं लेकिन कोई भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेने तक को तैयार नहीं है| किसी भी टीम के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी कैप्टेन की होती है और स्वयं अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद टीम की गलतियों का खामियाजा उसे भुगतना पड़ता है, कई बार तो कैप्टेनशिप भी छोडनी पड़ती है| पर कैप्टेन सिंह दावा करते हैं कि वे अपनी योग्यता के चलते इस पद पर हैं और उन्होंने अपने जीवन में कभी भी स्वयं खराब प्रदर्शन नहीं किया| वे अपनी टीम के खराब प्रदर्शन की तनिक भी नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार ही नहीं हैं|

 

भ्रष्टाचार तो बाद की बात है, पहले आचरण सुधारना जरूरी है| हममें से कितने लोग हैं जो सड़क पर थूकने या कूड़ा-कचरा फेंकने से पहले एक बार भी सोचते हैं ? कितने लोग हैं जो पान-गुटका दीवारों पर या सड़कों पर थूकने से पहले एक बार भी विचार करते हैं ? किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थान में जाकर देख लीजिये दीवारों और टायलेट में पान-गुटका थूका हुआ मिलेगा| चूंकि जन-सुविधाओं के लिए बनाए गए शौचालयों पर अतिक्रमण कर लिया जाता है, इसलिए जनता मूत्र विसर्जन दीवारों पर करती है| धार्मिक आस्था के नाम पर हजारों लाखों लोग किसी एक जगह पर जाकर उसे महीनों के लिए सडा जाते हैं और धर्म और श्रद्धा के नाम पर उन पर कोई भी नियम क़ानून लागू नहीं होता भले वो उत्पात करे, सुल्फा-गांजा का खुले आम सेवन करें या संभ्रांत घरों की महिलाओं को छेड़ें|

 

हमारे शहर में पिछले कुछ समय से पोलीथिन इस्तेमाल न करने का अभियान चल रहा है| शुरू-शुरू में तो यह अभियान ठीक-ठाक चला, पर धीरे-२ चोरी छुपे सभी दुकानदार और ग्राहक फिर से पोलीथिन इस्तेमाल करने लगे हैं| वजह है लोगों में नैतिकता और सदाचरण का अभाव| अगर लोग स्वयं आगे बढ़कर पहल करें और इमानदारी से सहयोग करें तो ही यह अभियान सफल हो सकता है अन्यथा किसी भी सूरत में नहीं| सीधी सी बात है, जनता आज की सोचती है, कल की नहीं| वो जमाने गए जब लोग ये सोच के पेड़ लगाते थे कि भविष्य में हम नहीं तो कोई और इसके फल खायेगा| कहने का तात्पर्य यही है कि यदि देश के नागरिकों के चरित्र में  नैतिकता और सदाचार आ जाए तो इमानदारी तो स्वयं ही आ जायेगी और भ्रष्टाचार तो पनप ही नहीं पायेगा|

 

राजनीति में शिक्षा की अनिवार्यता- कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे देश में कोई अनपढ़ भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तक बन सकता है| कोई भी एरा-गैरा नत्थूखैरा नेता रात-दिन कड़ी मेहनत से पढकर इस देश की सबसे बड़ी नौकरी पाए आई ए एस के ऊपर बैठकर उससे खैनी तक रगडवा सकता है| कोई अपने बच्चों को आई ए एस बनने को क्यों कहे, नेता क्यों न बनाए? आई ए एस का बॉस आई ए एस न हो तो कम से ग्रेजुएट तो हो, कम से कम ठीक-ठाक पढ़ा-लिखा तो हो | जब नौकरी में पद के हिसाब से शक्षिक योग्यता चाहिए होती है तो फिर मंत्रालय विशेष के लिए भी वैसी ही शैक्षिक योग्यता क्यों न हो? यानी, रेल मंत्री या परिवहन मंत्री ऑटोमोबाइल या मैकेनिकल इन्जीनियर क्यों न हो ?  कहने का तात्पर्य है कि सांसदों-विधायकों के लिए कोई उचित शैक्षिक योग्यता की अर्हता क्यों नहीं है? जब नौकरी में रिटायरमेंट की उम्र है तो राजनीति में क्यों नहीं है? मुझे पूरा विशवास है कि यदि राजनीति में पढ़े-लिखे और युवा लोग हों तो भ्रष्टाचार भी कम हो जाएगा |

 

लोकतंत्र और राजशाही में फर्क करना जरूरी है| राजीव गांधी की राजनीतिक योग्यता बस इतनी ही थी कि वे श्रीमती इंदिरा गांधी के पुत्र थे| वे बिना पत्ता भी हिलाए सीधे प्रधानमंत्री बने| क्या उनसे लायक कोई और नेता नहीं था देश में ? सोनिया गांधी भी सीधे घर से निकल कर संसद पहुँच गई और इस समय सरकार और देश को आपरेट कर रहीं हैं| राहुल और प्रियंका भी जब चाहें तब सरकार संभाल सकते हैं| तो क्या ये लोकतंत्र है या राजशाही? कांग्रेस के वो बड़े-२ नेता जो अच्छे पढ़े-लिखे और विद्वान है, जिहोने राजनीति की सीढियां लोकतंत्र के रास्ते पर चलकर चढी है, वर्षों संघर्ष किया है, उनकी योग्यता क्यों तलवे चाट रही है| मंत्री बनने की योग्यता क्यों एक परिवार की वफादारी मात्र बनकर रह गई है| मुझे अभी तक याद है कि जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था, तब कई चमचे-चमचियां रो-रोकर आसमान सर पर उठाये हुए थे कि मैडम हाँ कर दें| बाद में वे सब शोकग्रस्त चम्मच मंत्री बन गए| अक्सर कहा जाता है कि काँग्रेस की सरकार/ भाजपा की सरकार,……भई क्या केवल काँग्रेस या भाजपा के लोग ही वोट डालते हैं, ये सरकार आम आदमी की सरकार क्यों नहीं होती?

 

द्वि-दलीय प्रणाली – अमेरिका की तर्ज पर देश में सिर्फ दो ही राजनैतिक पार्टियां होनी चाहिए | इस समय हमारे देश में कितनी राजनैतिक पार्टियां हैं ये भी सामान्य ज्ञान का प्रश्न हो सकता है| कोई भी १०-२० लोग मिलकर पार्टी बना लेते है और बाद में सरकार को समर्थन के नाम पर सौदेबाजी किया करते हैं| उत्तर प्रदेश के एक जाट नेता तो इसमें विशेष दक्षता रखते हैं| हर चुनाव में २-३ सीट निकालकर ये सरकार से सौदेबाजी किया करते हैं| और यही काम निर्दलीय चुने हुए नेता करते हैं| इस खरीद-फरोख्त को सब जानते हैं, पार्टियां जानती हैं, चुनाव आयोग जानता है, राज्यपाल से राष्ट्रपति तक सब जानते हैं, यहाँ तक कि संसद में नोटों की गद्दियाँ तक लहरा दी जाती हैं पर सब चुप हैं, क्योंकि किसी में भी नैतिकता नाम की चीज ही नहीं है|

 

यदि देश में द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणाली संभव न हो तो कम से कम चुनाव आयोग ऐसे कड़े क़ानून बनवाए कि इस तरह की खरीद-फरोख्त, दल-बदल की संभावना ही खत्म हो जाय और ये राजनीतिक ब्लैकमेलिंग न हो| यदि दल-बदल पर ऐसा क़ानून बनाया जाय कि एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शामिल होने के लिए ३ या ५ साल से पहले अनुमति न मिले तो फिर देखिये कौन कोई पार्टी छोड़ता है और कैसे सौदेबाजी होती है? इसी तरह से मिली-जुली सरकार बनाने में भी ऐसे नियम बनाएँ जांय कि मंत्री सिर्फ प्रमुख पार्टी के ही बनाए जांय, कोटा सिस्टम न रहे,  फिर देखिये सरकार भी मजबूत होगी, मंत्रालयों की सौदेबाजी भी नहीं होगी और भ्रष्टाचार भी कम होगा| तब पता चलेगा कि कौन-२ देशभक्त पार्टियां हैं जो नैतिक आधार पर सरकार को निस्वार्थ समर्थन देती है|

 

इस समय अन्ना हजारे का आंदोलन बड़े ही नाजुक मोड पर है पर आश्चर्य इस बात का है कि न तो सरकार और न ही टीम अन्ना इसकी संवेदनशीलता को समझ पा रहे हैं| सरकार मौका तलाश रही है कि कब अपना वार करे, जैसे बाबा के कपडे उतरवा कर दौड़ा दिया वैसे ही अन्ना की धोती भी खींच ले| वहीं दूसरी ओर टीम अन्ना इतने लोगों का समर्थन देखकर फूली नहीं समा पा रही है| ये तथाकथित शांतिपूर्ण आंदोलन कब टीम अन्ना की हद से बाहर जाकर कब उग्र रूप ले लेगा, पता भी नहीं चलेगा, बस भीड़ से एक पत्थर चलने की देर है| शुरुआत कल हो चुकी है जब कुछ लोगों ने रामलीला मैदान के बाहर शराब पीकर पुलिस पर आक्रमण किया| एक व्यक्ति आज सुबह संसद परिसर तक में घुस गया और काफी देर तक हंगामा काटा | मीडिया भी ऐसे-ऐसे कवरेज कर इस तरह की हरकतों के लिए प्रेरणा साबित हो रहा है| राजधानी की सड़कों पर अन्ना के समर्थक बनकर लोगों ने कारों और बाइकों पर सवार होकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया है| समय रहते सरकार और टीम अन्ना न चेते और जल्द से जल्द इस पर कोई ठोस कदम न उठाया गया और या भगवान न करे कि कहीं अन्ना हजारे को कुछ हो गया तो तो आने वाला समय कहीं इनके माथे पर कलंक न लगा दे| कहीं गांधी बनते-बनते अन्ना हजारे अपने जीवन भर की उपलब्धियां एक क्षण में न गँवा दें| कहीं ऐसा न हो कि लम्हों की खता सदियों को झेलनी पड़े|

 

जय हिंद|

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
August 30, 2011

मै सोच रहा था की इस पोस्ट पर मेरी उपस्थिति कैसे नहीं हुई, ढूंढ कर निकला है भय्या जी ज्ञानवर्धन तो हुई ही और उससे ज्यादा ज्ञान आपके और वाहिद जी के …. मै कमेन्ट कर सकूं इस लायक तो अकाल है ही नहीं …. :)

    August 30, 2011

    धन्यवाद अबोध जी कि आपने मेरा लेख ढूंढ निकाला और पढ़ा| मैं आपके लेख पढता तो हूं पर मैंने प्रतिक्रियाएं देना बंद कर दिया है, उम्मीद है आप इसका बुरा नहीं मानेंगे| केवल इस लेख पर जवाब दे रहा हूं क्योंकि मैंने गलती से इस लेख को फोरम में ड़ाल दिया, इस लिए जवाब देना मजबूरी हो गई थी|

manoranjanthakur के द्वारा
August 28, 2011

बहुत ही सही विश्लेषण बहुत बधाई

आर.एन. शाही के द्वारा
August 28, 2011

राजाओं के भी श्रेष्ठ इंद्र जी सादर प्रणाम ! डायरी के अंदाज़ में भी बड़ी सधी बातें कह डालीं, अज़ब इत्तफ़ाक़ ही है । जनता कई बार इसी स्टाइल में सोचती है, अत: आपके आलेख को जनवाणी कहना भी मेरे विचार से कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का दर्ज़ा खुद संविधान ने दिया है, तो उसकी आंखें यदि देर से ही सही, अपनी ज़िम्मेदारियों के सापेक्ष खुली हैं, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिये । यह तो आपने भी माना है कि हमारे देश में लोकशाही की खाल में राजशाही शासन चला रही है । वैधानिक खाल ओढ़े इस अवैध शासन को उखाड़ फ़ेंकना समय की ज़रूरत है, और मीडिया उसमें बेहतर योगदान हेतु अब खुद को आगे कर चुका है । टीआरपी की भी यदि बिल्कुल नहीं सोचेगा, तो आखिर खाएगा क्या ? घोड़े को ज़िंदा रहने के लिये घास से दुश्मनी करनी ही पड़ती है । साधुवाद !

    August 28, 2011

    आदरणीय गुरुवर, आपको तो सिर्फ प्रणाम कहना चाहता हूँ, वर्ना आप पता नहीं कहाँ से सिरा पकड़ कर उधेडना शुरू कर दें | कृपया आशीर्वाद बनाए रखें|

August 27, 2011

सम्मानित पाठकवर्ग और सभी ब्लाग्गर्स, सबसे पहले तो समस्त देशवासियों को बधाई कि लोकपाल बिल पर अन्ना के तीन मुख्य मुद्दों को लोकसभा में सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया है, यांनी कि आधी लड़ाई जीती जा चुकी है| वैसे तो मैंने प्रतिक्रिया करना और प्रतिक्रियाओं के जवाब देना बंद कर दिया था, क्योंकि मैं दो के चार और चार के आठ कर देने के इस खेल से ऊब गया था| ज्यादा चर्चित या पठित होने के लिए ब्लोगरों की मारा-मारी और प्रतिक्रियाओं में बढ़ती तल्खी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्द्धा और अप्रिय होते माहौल की वजह से मैं ब्लॉग्गिंग से ४-५ माह से दूर था और अभी हाल ही में वापसी की है| इस लेख पर प्रतिक्रियाओं के जवाब दे रहा हूँ तो इसके कुछ अहम कारण है| एक तो यह इस समय देश का सबसे चर्चित मुद्दा है, दूसरे आप जैसे बुद्धिजीवियों ने न केवल मेरा लेख पढ़ा बल्कि इसका विश्लेषण करने की भी कोशिश की| सच कहूँ तो मै आप लोगों का शुक्रगुजार हूँ|

    Carrieann के द्वारा
    October 7, 2011

    I’m really into it, tanhks for this great stuff!

वाहिद काशीवासी के द्वारा
August 27, 2011

आपके लेख की कुछ बातें निश्चित रूप से विचारणीय हैं पर कुछ बातें ऐसी भी हैं जो व्यावहारिक दृष्टि से अनुसरण करने योग्य नहीं हैं। धन्यवाद,

    August 28, 2011

    प्रिय वाहिद काशीवासी, जैसा कि आप जानते ही हैं कि आपकी सभी बातों से मैं हमेशा ही सहमत रहता हूँ पर यहाँ पर आपका ये कहना कि –‘…. कुछ बातें ऐसी भी हैं जो व्यावहारिक दृष्टि से अनुसरण करने योग्य नहीं हैं…….’ तो कृपया ये भी बताएं कि वो कौन सी बातें हैं जो अनुसरण करने योग्य नहीं हैं| आपका ये स्पष्टीकरण न केवल मुझ कमअक्ल पर एक एहसान होगा बल्कि उन कमअक्ल लोगों की भी आँखें खोलेगा जो कि मेरे विचारों से प्रभावित हो जाते हैं|

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    August 28, 2011

    भईया, आपको स्पष्टीकरण देना मेरा कर्तव्य है पर आपके संबोधन पर मुझे आपत्ति है| द्विदलीय प्रणाली जिसकी आप हिमायत कर रहे हैं वो किसी भी प्रकार से संभव नहीं है हमारे देश में| हाँ उसके स्थान पर ये हो सकता है कि बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उग आये राजनीतिक दलों को जो राजनीती कम और सौदेबाज़ी ज़्यादा करते हैं उन पर रोक लगे और केवल चार या पांच प्रमुख दल ही हों| हमारे देश को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है पर यही बड़ा होना उसकी सबसे बड़ी विडम्बना साबित हुआ है| और पढ़े लिखे तथा युवाओं को राजनीती में आने की जो बात आपने कही है मैं उसमें एक संशोधन करना चाहता हूँ कि जिस प्रकार किसी भी उच्च स्तरीय सरकारी पेशे में आने के लिए प्रतियोगी परीक्षा होती है तो राजनीतिज्ञों के लिए क्यूँ नहीं हो सकती| जो उस परीक्षा में खरा उतरे वो ही लोक या विधान सभा का चुनाव लड़ने का पात्र माना जाए| भले उसकी शैक्षिक योग्यता कुछ भी हो| सिर्फ़ पढ़े-लिखे लोग ही देश को संवार सकते हैं ऐसा सोचना अनुचित होगा, क्यूंकि अनेक लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और लगन के बूते अपने कार्यक्षेत्र में बड़ा नाम किया है| जाहिल तो छोटे-मोटे घोटाले ही कर सकता है मगर उच्च शिक्षित लोग केवल उच्च स्तरीय घोटाले ही करेंगे ये तय है| कुछ समय पूर्व ही अमेरिका से लौटे एक दंपत्ति में तकरार हुई और उच्च शिक्षित पति ने कैसे पत्नी के टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे ये आप को भी याद होगा| आशा है आप मेरा तात्पर्य समझ गए होंगे और संदेह के बादल छंट गए होंगे| साभार,

    August 28, 2011

    प्रिय वाहिद, सबसे पहले तो आपकी इस बात पर कि ….द्विदलीय प्रणाली किसी भी प्रकार से संभव नहीं है हमारे देश में…..मैं कहना चाहूंगा कि असंभव तो कुछ भी नहीं होता, किसने सोचा था कि ७४ वर्षीय अन्ना हजारे कहीं से आकर देश की सर्वोच्च संस्था संसद को अकेले दम पर झुका देंगे,…आने वाले समय में क्या होगा हम कैसे कह सकते है? आपकी दूसरी बात को तो मैंने भी कहने की कोशिश की है, कृपया फिर से पढ़ें- …..यदि देश में द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणाली संभव न हो तो कम से कम चुनाव आयोग ऐसे कड़े क़ानून बनवाए कि इस तरह की खरीद-फरोख्त, दल-बदल की संभावना ही खत्म हो जाय और ये राजनीतिक ब्लैकमेलिंग न हो| यदि दल-बदल पर ऐसा क़ानून बनाया जाय कि एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शामिल होने के लिए ३ या ५ साल से पहले अनुमति न मिले तो फिर देखिये कौन कोई पार्टी छोड़ता है और कैसे सौदेबाजी होती है? इसी तरह से मिली-जुली सरकार बनाने में भी ऐसे नियम बनाएँ जांय कि मंत्री सिर्फ प्रमुख पार्टी के ही बनाए जांय, कोटा सिस्टम न रहे……. रही बात शिक्षित लोगों के राजनीति में आने और घोटाले करने की तो उस पर मैं कहना चाहूंगा कि आप सभी लोगों ने इस बात को पकड़ कर बाल की खाल निकालना शुरू कर दिया है,…चूंकि आप लोग इस समय वही बात कह रहें हैं जो कि हमारे संविधान में भी है, इसलिए इस पर मैं बहस नहीं करना चाहता, पर व्यक्तिगत रूप से मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ| उत्तराखंड में आपसी खींचतान के चलते कुछ राजनीतिक दलों ने मिलकर एक निपट अनपढ़-गंवार दिहाड़ी मजदूर को चुनाव में खड़ा कर विधायक बनवा दिया, ये इस व्यवस्था का मजाक है…… आप और अन्य लोगों ने भी भ्रस्टाचार का सीधा-२ तात्पर्य घोटालों से लगाया है जबकि मेरा मानना हे कि घोटाले भ्रस्टाचार के कई रूपों में से एक रूप है| इसीलिये सांसदों के आचार-व्यवहार को भी लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात की जा रही थी| क्या इस लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर लालू जैसे गंवार, बिहार के कई कार्टून, शरद यादव जैसी भाषा बोलने वाले लोग जो कार्टूनपंती करकर लोगों को हंसाते रहते है, समय-समय पर जूत-पत्थरम करते है, वो भ्रष्टाचार नहीं है? क्या सिर्फ घोटाले करना ही भ्रष्टाचार है? क्या ये नौटंकी और हंसी-ठट्ठा करने के लिए उनको संसद में भेजा है जनता ने? शरद यादव ने सदन में लंबा-चौड़ा भाषण दिया और सारे सांसद हँसते रहे, यहाँ तक कि उनका समय समाप्त होने पर भी अन्य सांसद उन्हें और बोलने के लिए प्रेरित करते रहे और वे लोगों को हंसाते रहे| अगर इन लोगों ने कोई घोटाला नहीं किया तो क्या इनका आचार भ्रष्ट नहीं है? कृपया शब्दों को सही समझें, मेरे पूरे लेख में भ्रस्टाचार और सदाचार/नैतिकता की बात है, घोटालों की नहीं| यदि भ्रष्ट आचरण सुधार लिया जाय तो घोटाले अपने-आप ही नहीं होंगे, यही मैं कहना चाहता था| और यदि आपको (और कुछ और लोगों को भी) लगता है कि पढ़े-लिखे लोग घोटाले भी बड़े करेंगे तो क्यों नौकरियों में पढ़े-लिखे लोग ले रहे है? क्यों मंत्रालयों में आई ए एस सचिव रखे हुए हैं? क्योंकि सरकार यही लोग चलाते हैं, मंत्री तो आते-जाते रहते हैं पर सचिव वही रहते हैं……आपकी बात अगर सही है तो सदन में सारे अनपढ़ बिठा दिए जांय और घोटाले होंगे ही नहीं| ये तुलना हास्यापद है…..

Santosh Kumar के द्वारा
August 27, 2011

आदरणीय राजेंद्र जी ,नमस्कार ..काफी मेहनत से आपने बढ़िया लेख लिखा ,..कुछ बातें कम समझ आयी …शीर्षक तो बिलकुल नहीं . ७४ वर्षीया अन्नाजी १२ दिन से भूखे हैं ,,आपको ड्रामा लगता है ??.. अपने विचार रखने की आज्ञा चाहूँगा 1- हर आदमी भ्रष्टों को सजा चाहता है ,..जन लोकपाल को सब समझते हैं ( कम ही सही ) लेकिन समर्थन जरुर देता है चाहे उसके अंदर से पामेला एंडरसन निकले चाहे राखी सावंत ,…ये मसला अविश्वास का है २-नैतिकता सामने वाले को देख कर होती है ,…यह वही देश है जहाँ आज भी रिक्शावाला पूरा दिन एक घर ढूँढता है ,.जिसका सामन उसके रिक्शे में छूट गया था..”यथा राजा तथा प्रजा” हुक्मरान हमें नोचकर खाए और हम नैतिक पाठ पढ़ें ….मजा नहीं आया सर ….हमारा कैप्टन तो गुलाम परंपरा का ध्वजवाहक बन गया है ३-भारत में ग्रेजुएट कितने हैं ???? शायद २%से भी कम ,…तो लोकतंत्र का क्या होगा?? …सभी घोटालों के कर्णधार ग्रेजुएट हैं .. ४- दो दलीय प्रणाली भारत के लिए नामाकूल है ,..जब हम दस चोरों में से कम चोर नहीं ढून्ढ पाते तो दो डाकुओं में एक का …………????????????? सभी चोरों को आइना दिखने के लिए कठोर कानून होना चाहिए ,..पूर्ण पारदर्शिता से इलाज हो सकता है ,…. आन्दोलन वास्तव में नाजुक मोड़ पर है ,….सबको समझाना होगा ,…ये भ्रष्ट, आपराधिक नेता चमचे कुछ भी कर सकते हैं ,…..संसद में चर्चा जारी है,..शायद कुछ रास्ता मिल जाये …सादर आभार

    August 28, 2011

    आदरणीय संतोष जी नमस्कार, ये मेरी ही कमी है कि मैं बुद्धिजीवियों को समझा नहीं पाया कि मेरी ड्रामेबाजी का तात्पर्य क्या है? मेरा मानना है इस घसड-पसड भरी ब्लॉग्गिंग में शायद ही कोई किसी लेख को ध्यान से पढता होगा, क्योंकि यहाँ पर पाठक तो हैं ही नहीं, सारे लेखक ही लेखक हैं| बताइये मैंने कहाँ लिखा है कि ७४ वर्षीया अन्नाजी १२ दिन से भूखे रहकर ड्रामा कर रहे हैं| मेरा इशारा तो लोकपाल बिल को लेकर टीम अन्ना, अरुणा और सरकार के लोकपाल के बीच इतने दिनों से चली आ रही खींचतान और नेताओं द्वारा की जा रही ड्रामेबाजी की ओर था| आपने कहा कि जन लोकपाल को सब समझते हैं ( कम ही सही ) लेकिन समर्थन जरुर देता है चाहे उसके अंदर से पामेला एंडरसन निकले चाहे राखी सावंत | चलिए आप ही सही है, आप अपनी ओर से अपने तीन बेस्ट बंदे चुनकर उनसे पूछिए कि लोकपाल बिल क्या है? फिर देखिये कि उसमें से पामेला एंडरसन निकलती है या राखी सावंत| ईश्वर करे कि आप सही हों और उसमें से अन्ना हजारे ही निकलें | आपने कहा कि नैतिकता सामने वाले को देख कर होती है| मुझे अफ़सोस है कि आपकी नैतिकता आपके सामने वाले घर पर टिकी है| आपके अपने ही शब्दों में “यथा राजा तथा प्रजा” की तर्ज पर जो आपको नोंच कर खा रहे हैं, आप भी उनको नोंचकर खाइये, फिर गांधीवादी अन्ना के साथ क्यों जुड़े हैं? आपने कहा कि सभी घोटालों के कर्णधार ग्रेजुएट हैं, क्या आप ग्रेजुएट नहीं है? क्या आप अपने बच्चों को ग्रेजुएट नहीं बनाना चाहते या उन्हें सिर्फ ढाई आखर प्रेम का पढाकर पंडित बनाना ही काफी रहेगा क्योंकि डाक्टर, इन्जीनियर और ग्रेजुएट तो भ्रष्ट हैं| आपकी आख़री बात पर रिपीट कर रहा हूँ| द्वि-दलीय प्रणाली मेरे दिमाग की उपज नहीं है| इसकी अवधारणा भी किसी अक्लमंद आदमी ने ही रखी होगी और विश्व का सबसे मजबूत देश अमेरिका इसे अपनाता है| मुझे अच्छा लगा तो मैंने लिख दिया| मैं पार्टियों में एक या दो व्यंजन ही लेता हूँ , इससे ज्यादा मेरी तबियत खराब कर देते हैं, लेकिन इस देश के अधिकांशतः लोग अपनी प्लेट में ज्यादा से ज्यादा भरने की कोशिश करते हैं, भले हफ्ते भर तक उनकी तबीयत खराब रहे| अपना-अपना हाजमा है भाई|

    Santosh Kumar के द्वारा
    August 28, 2011

    आदरणीय राजेंद्र जी ,.सादर नमस्कार आपने मेरी प्रतिक्रिया पर अपने विचार रखे ,..आपका हार्दिक धन्यवाद ,..पहली बात मैं अल्पबुद्धि जीवी हूँ ……इसलिए आपका मंतव्य नहीं समझ सका … क्षमा चाहता हूँ ,..मैं अन्ना भक्त नहीं हूँ ,..सिर्फ समर्थक हूँ ,…मैंने एक बात लिखी थी शायद आपने ध्यान नहीं दिया .” ये मामला अविश्वास का है ,..मैं तीन नहीं कमसे कम ५३ लोगों से बात कर चूका हूँ ,.. ….नैतिकता सामने वाले को देखकर होती है ,…सामने वाले से मेरा मतलब व्यवस्था से है …..हमारे सामने सत्ता प्रतिष्ठान करोंडो लूट रहे हों ,..और हम कहें कि हम प्यासे रहेंगे लेकिन नल लगवाने के लिए २०० रुपये नहीं देंगे,..हम आम लोग हैं किसी को नोच नहीं सकते .,…सिर्फ भड़ास निकाल सकते हैं ..रही बात गांधीवादी अन्ना के साथ जुड़ने की तो मैं मानता हूँ कि ,…न मैं अन्ना न तू अन्ना सारे देश में एक ही अन्ना ,..यह एक लहर है जिसका पानी कहीं और से आया ,…जश्न के इस माहौल में मैं अभी भी निराश हूँ ,..कुछ कारण हैं …फिलहाल अभी तक IAC को पूरा समर्थन है और जनलोकपाल पारित होने तक रहेगा,…. बाकि आपके विचारों का मैं तहे दिल से सम्मान करता हूँ ,……अमेरिका की हालत क्या है सब जानते हैं ? ….मैं ग्रेजुएट नहीं हूँ ,..भ्रष्ट कोई भी हो सकता है ,…सारे IAS सेलेक्शन के बाद देश सेवा के लम्बे चौड़े प्रवचन देते हैं,….काम मिलते ही असली काम में लग जाते हैं ,….आपसे एक प्रार्थना है ,.. आपकी जिन बातों से मेरी सहमति है कृपया उनको जरूर ध्यान से पढ़े ,….सादर आभार

    August 28, 2011

    संतोष जी, आपके विश्लेषण के लिए धन्यवाद, निश्चित ही मुझे आपसे काफी-कुछ सीखने को मिला है|

J L SINGH के द्वारा
August 26, 2011

राजेंद्र जी, नमस्कार! उत्तम प्रस्तुति के लिए बधाई,एवं धन्यवाद. मैं सिर्फ यही जोडूंगा, पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर ‘प्रेम’ का पढ़े सो पंडित होय. पर आजकल प्रेम का मतलब क्या है यह भी आप और हम अच्छी तरह जानते हैं. सभी अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लगे हैं. एक इमानदार आदमी मदत है तो मरने दो! संसद में शोक मनाकर एक दिन और छुट्टी कर लेंगें. संसद की अपनी गरिमा और नियमावली होती है, और इस गरिमा और नियमावली की धज्जियाँ उड़ते हुए भी हम सबने देखा है. अब तो ऐसा लगने लगा है की संसद एक रंगमंच है और सभी सांसद उसके किरदार और यहाँ पर एक्ट करने से पहले रिहर्सल कर के आते हैं. तभी तो आज अपराह्न में उन तीन मुद्दे पर चर्चा शुरू होने से पहले हंगामा हो गया और संसद को स्थगित तक कर देना पड़ा. वही जब अन्ना को अनसन तोड़ने के लिए मीरा कुमार (अध्यक्ष महोदया) अपने असं से खड़ी हो गयीं. सुषमा जी ने भी अपनी भूमिका को सही ढंग से निभाया. पर सर्वदलीय बैठक और इफ्तार पार्टी में क्या हुआ यह भी पूरे राष्ट्र ने देखा.

    August 28, 2011

    सिंह साहब नमस्कार, आपने खूब कहा कि- पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर ‘प्रेम’ का पढ़े सो पंडित होय| पर ये आप भी अच्छी तरह समझते होंगे कि ये कहावतें अब सिर्फ उद्धृत करने के लिए रह गई हैं क्योंकि कोई भी इन पर खरा नहीं उतरता| आपने खूब कहा कि संसद एक रंगमंच है और सभी सांसद उसके किरदार और यहाँ पर एक्ट करने से पहले रिहर्सल कर के आते हैं| जनता भ्रम में है कि संसद ने अन्ना की बात मान ली, हकीकत तो ये है कि मजबूरी हो गई थी मानना|

ajaysingh के द्वारा
August 26, 2011

राजेन्द्र जी,   कई ग़ज लम्बा लेख लिखने मे मेहनत तो लगती ही है लेकिन इसमे कुछ काम की बात भी करने की कोशिश ठीक बन पड़ी है। लेकिन….. 1.क्या देश में जो घोटाले हुए हैं उन घोटालों को करने वाले अशिक्षित हैं? PM स्वयं उच्च शिक्षित होने का साथ-साथ रिज़र्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके है. उनके आफि़स की रज़ामन्दी से ही करोड़ो के घपले उनकी नाक के नीचे (दिल्ली मे) हुए,  या तो वो खुद बेईमान और चोर हैं या उनमे चोरी बेईमानी  रोक पाने बूता नही है. जो भी हो पर मुझे इतना यकीं है कि उनकी आत्मा मर चुकी है वर्ना वो अब तक  राजनीति से सन्यास ले चुके होते. (शिक्षा का प्रभाव कहाँ गया……..?) 2. एक कानून तो 40 वर्षों से संसद के गलियारे मे संसद की गरिमामयी    प्रक्रिया द्वारा भटकाया जा रहा है, उसके लिये लाखों-करोंड़ो जनता सड़को पर उतर  आयी है (जिसे आप जैसे विचारक भी ड्रामा समझ रहे हैं ) फिर भी परिणाम सामने है. और आप संविधान की मूल संरचना मे ही परिवर्तन की हिम्मत कर रहे हैं दो-दलीय प्रणाली द्धारा…. ( आपको अपनी ही राय मे कितनी सम्भावना दिखायी देती है ?) 3.व्यवस्था नियम कानून से चलती है नैतिकता से नही…।   समाज नैतिकता से चलता है.

    August 28, 2011

    अजय जी, सबसे पहले तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं कोई बहुत बड़ा लेखक या विचारक नहीं हूँ बस कुछ कहने का मन होता है तो कह देता हूँ| अब रही बात मेरे कई गज लंबे लेख और मेहनत की तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैंने आज तक कभी भी लेख लिखने में मेहनत नहीं की और न ही कभी लेखों की लम्बाई मापने की कोशिश की| मेहनत करते हैं वो जो इधर-उधर से ढूँढ कर कापी पेस्ट कर लेख बनाते हैं| मैं तो वही लिखता हूँ जो मेरे भेजे में होता है, जितनी कि मेरी बुद्धि है| मुझे ये भी पता है कि मैं दुनिया का सबसे होशियार आदमी नहीं हूँ कि जो कहूँगा, वो ही सही होगा, एक सामान्य बुद्धिधारी होने के कारण मैं भी गलत हो सकता हूँ| हो सकता है कि आपने मेरा लेख ध्यान से पढ़ा हो, पर मुझे नहीं लगता| आपने सवाल किया है कि क्या देश में जो घोटाले हुए हैं उन घोटालों को करने वाले अशिक्षित हैं ? मैंने तो अपने कई गज लंबे लेख में किसी भी घोटाले का जिक्र ही नहीं किया| लगता है आपकी नजरों में घोटाला ही भ्रष्टाचार है| मुझ कमअक्ल के हिसाब से तो भ्रष्टाचार की परिभाषा है भ्रष्ट आचार, और अपने लेख में मैंने केवल इसी आचार और आचरण पर ही जोर दिया है| मेरे नजरिये में भ्रष्टाचार सिर्फ घोटाला ही नहीं बल्कि सभ्य आचरण के विपरीत जो भी किया जाय वो सब भ्रष्टाचार में आता है| अब रही बात एमएम सिंह साहब की तो अगर आपने लेख ध्यान से पढ़ा हो तो उसमें मैंने कैप्टेन सिंह का जिक्र किया है और वही बात कहने का प्रयास किया है जो आप कह रहे हैं| एक बात और कि लोग कहते है कि एमएम सिंह बहुत पढ़े लिखे और ईमानदार हैं तो सोनिया इनके ऊपर क्यों हैं? क्या वे एमएम सिंह से ज्यादा पढ़ी-लिखीं और ज्यादा ईमानदार हैं? ऐसी कौन सी विशेष शैक्षिक योग्यता है इनके पास जो इनसे ज्यादा किसी के पास नहीं है? आपकी दूसरी बात में बात आती है लोकपाल के ड्रामे की तो शायद सभी लोग इस शीर्षक से भ्रमित हुए| मैंने कहीं भी लोकपाल बिल को ड्रामा नहीँ कहा बल्कि मेरा इशारा इस को लेकर टीम अन्ना, अरुणा और सरकार के लोकपाल के बीच इतने दिनों से चली आ रही खींचतान और नेताओं द्वारा की जा रही ड्रामेबाजी की ओर था| रही बात द्वि-दलीय प्रणाली की तो वो मेरे दिमाग की उपज नहीं है| इसकी अवधारणा भी किसी अक्लमंद आदमी ने ही रखी होगी और विश्व का सबसे मजबूत देश अमेरिका इसे अपनाता है| मुझे अच्छा लगा तो मैंने लिख दिया| मैं पार्टियों में एक या दो व्यंजन ही लेता हूँ , इससे ज्यादा मेरी तबियत खराब कर देते हैं, लेकिन इस देश के अधिकांशतः लोग अपनी प्लेट में ज्यादा से ज्यादा भरने की कोशिश करते हैं, भले हफ्ते भर तक उनकी तबीयत खराब रहे| अपना-अपना हाजमा है भाई| आपकी आख़री बात तो self-explainatory है- व्यवस्था नियम कानून से चलती है नैतिकता से नही…। समाज नैतिकता से चलता है. चलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर समाज नैतिकता से चलता है और व्यवस्था नियम कानून से चलती है तो बताइये कि व्यवस्था और नियम कानून किसके लिए हैं?……समाज के लिए ही न?

    ajaysingh के द्वारा
    August 28, 2011

    राजेन्द्र जी, 1.   आपने स्पष्ट रुप से लिखा है  ”कि यदि राजनीति में पढ़े-लिखे और युवा लोग हों तो भ्रष्टाचार भी कम हो जाएगा” 1. क्या घोटाले करना भ्रष्ट आचार की श्रेणी मे नहीं आता? घोटाला ही भ्रष्टाचार है ऐसा तो मैने भी नहीं कहा.  घोटाला भी  भ्रष्टाचार है यदि ऐसा मानते हैं तो मेरा प्रश्न यथावत है. 2.जिस सरकार को अपने कुर्ते की उघड़ी सिलाई दुरुस्त करने मे 40 साल लग गये, उस सरकार से   नया कुर्ता बनवाने की अपेक्षा करना कितना व्यावहारिक है.    (एक कानून 40 साल से प्रतीक्षा मे था , जनता के दबाव  में अब शायद बन जाये,)    (संविधान संसोधन के लिये दो तिहाई मतों की आवश्यकता होगी,मुठ्ठी भर संसदो को ले कर सैदेबाजी करने     वाले क्या अपने अस्तित्व को मिटाने के पक्ष मे मत करेंगे?) 3.”चलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर समाज नैतिकता से चलता है और व्यवस्था नियम कानून से चलती है तो बताइये कि व्यवस्था और नियम कानून किसके लिए हैं?……समाज के लिए ही न” नैतिकता से समाज बनता है, समाज के हित के लिये व्यवस्था बनती है और  व्यवस्था को अच्छा बनाने के लिये नियम-कानून.   यदि  नैतिकता का बोल-बाला  हो जाये तो फिर समाज मे सुख-शान्ति होही जायेगी,                व्यवस्था की  कोई आवश्यकता नही होगी, और व्यवस्था नहीं तो कानून का क्या अर्थ. श्रीमान, आप तो बहुत आगे निकल गये. आपके गावश्कर को अम्पायर के इशारे की जरुरत नही है            मतलब आपकी टीम को अम्पायर की जरुरत नही. ओह क्षमा करें,   भ्रष्टाचार एवं व्यवस्था के मुद्दे पर मै अपनी सोंच व्यावहारिक रखना चाहता हूँ.काल्पनिक नहीं. !!!! मेरी प्रतिक्रिया पर ध्यान देने के लिये धन्यवाद, !!!! !!!! आन्दोलन की आंशिक सफलता पर आपको भी हार्दिक बधाई !!!!

    August 28, 2011

    अजय जी,  आपके विश्लेषण के लिए धन्यवाद, निश्चित ही मुझे इससे काफी-कुछ सीखने को मिला है|


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