अंगार

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जान लेना समस्या का हल नहीं है

Posted On: 12 Nov, 2011 Others में

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वैसे तो यह लेख पुराना यानी की दिसंबर २०१० का लिखा हुआ है, लेकिन ये अपील करना इस समय बहुत प्रासंगिक और जरूरी है| उस समय भी हाथी के उत्पात और मानवों की जान लेने के कारण कुछ लोगों ने इसे मार देने की मांग की थी| लेकिन अब तो इस कार्य के लिए शिकारी भी बुलाये जा चुके हैं| ये सच है की पिछले ११ माह में हाथी ऋषिकेश व आस-पास के क्षेत्रों में १० लोगों को मार चुका है और जनता के दबाव के चलते प्रमुख बन संरक्षक वन्य जीव ने इस टस्कर हाथी को सजा ऐ मौत का फरमान सुना दिया है और इसे मारने के आदेश जारी कर दिए हैं| इस अमानवीय कार्य के लिए वन प्रभाग ने बिजनौर से चार शिकारी बुला कर इस टस्कर हाथी की पहचान के लिए सर्वे का कार्य शुरू कर दिया है| हैरत की बात है की इस एडवांस तकनीक के जमाने में भी हमारे प्रशासक, वन्य जीव संरक्षक और बुद्धिजीवी जनता भी पुराने जमाने के वहशियाना तौर-तरीके की हिमायत कर रही है जबकि रोज ही डिस्कवरी, एनीमल प्लेनट, नेशनल ज्योग्राफिक जैसे चैनल इस प्रकार के कार्यक्रम नियमित दिखाते रहते हैं कि इस प्रकार की समस्याओं का अध्ययन और समाधान किस प्रकार किया जा सकता है| हिंसक जानवरों को ट्रेन्कुलाइज कर एक स्थान से दुसरे स्थान शिफ्ट कर देना अब कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं रह गई है| इसलिए एक बार फिर प्रशासकों, सम्बंधित विभाग और प्रबुद्ध जनता से अपील है कि कृपया इस निर्णय पर पुनर्विचार करें और बेहतर हल सोचें|

 

विगत कुछ दिनों से एक टस्कर हाथी ने देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर आतंक मचा रखा है और मात्र एक सप्ताह के भीतर यह हाथी तीन लोगों की जान ले चुका है. विगत ६ वर्षों में इस क्षेत्र में टस्कर हाथी कुल मिलकर १३ लोगों की जान ले चुके हैं. टस्कर का अर्थ होता है-गजदंतों वाला. विशेषकर अफ्रीका के सभी हाथी चाहे वह नर हो या मादा, टस्कर ही होते है. इस टस्कर हाथी के खौफ की वजह से फिलहाल देहरादून-ऋषिकेश मार्ग सांय ४ बजे से सुबह ८ बजे तक बंद कर दिया गया है. स्थानीय लोगों के जबरदस्त विरोध और प्रदर्शन के चलते दबाव में आकर वन विभाग के अधिकारियों ने इस हाथी को पागल घोषित करने और गोली मार देने की संस्तुति कर उच्च अधिकारियों को भेज दी है. लेकिन क्या सिर्फ गोली मार कर इस समस्या से छुटकारा पाने का यह समाधान उचित है? क्या जान से मार देने के बजाय इस जानवर की मनोदशा और ऐसे हालातों के लिए जिम्मेदार पहलुओं का अध्ययन कर वैकल्पिक और सकारात्मक समाधान नहीं ढूँढा जा सकता?
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डिस्कवरी और एनिमल प्लेनेट जैसे चैनलों पर हाथियों की मनोदशा और उनके मानव पर आक्रमण करने के हालातों का अध्ययन और विश्लेषण करने वाले कार्यक्रम कई बार प्रसारित हो चुके हैं और अब भी होते रहते हैं. इन कार्यक्रमों को बड़े चाव से देखने के बाद लोग आपस में चर्चा करते हैं कि वाह कितनी बढ़िया स्टोरी थी. भई क्या केवल स्टोरी ही बढ़िया थी या आपने इससे कुछ सीखा और समझा भी? हाथी के उन्मत्त और हिंसक हो जाने के पीछे कई कारण हो सकते हैं जिनका कि विश्लेषण किया जाना अत्यंत जरूरी है.
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प्राचीन काल से ही हाथी मनुष्य का शत्रु कम बल्कि मित्र ही ज्यादा रहा है. मनुष्य ने हाथी का प्रयोग युद्ध से लेकर जीविकोपार्जन, सवारियां और माल ढोने, जंगल सफारी, सर्कस में मनोरंजन और यहाँ तक कि शिकार में भी इसका प्रयोग किया है. हमारे देश में हाथी धार्मिक महत्व भी रखता है और थाईलैंड में तो आज भी हाथी का धार्मिक और सामाजिक महत्व है है और वहां पर इसकी पूजा की जाती है.
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हाथी के उन्मत्त और हिंसक होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. हाथी जब युवावस्था में आते हैं तब सहवास के लिए हाथियों में संघर्ष होता है और जो हाथी इस संघर्ष में हार जाता है, अपमानित और यौनेच्छा पूर्ण न होने से ‘मस्त’ हो जाता है और झुण्ड में उत्पात करने लगता है. हाथी की इस मस्त अवस्था को हाथी का पागल हो जाना भी समझा जाता है लेकिन यह अवस्था अस्थाई होती है. तब हाथी जिनका कि हमारी तरह ही एक सामाजिक तानाबाना होता है, इस मस्त हाथी को अपने झुण्ड से बहिष्कृत कर देते हैं. इस प्रकार झुण्ड से अलग होकर एकाकी हो जाने और यौनेच्छा पूर्ण न होने से हाथी हठी, उन्मत्त और हिंसक हो जाता है. लेकिन ये तो सिर्फ एक प्राकृतिक कारण है. हाथी की इस स्थिति के पीछे मानव जाति भी बहुत हद तक दोषी है. हाथी, जिन्हें कि अपने प्रवास और भोजन-पानी के लिए पर्याप्त घने और अनुकूल जंगल की आवश्यकता होती है, मानव जाति की बढती इच्छाओं के चलते आज उन्हें अपने अनुकूल वातावरण नहीं मिल पा रहा है. इस कंक्रीट युग के चलते जंगल के जंगल नष्ट हो रहे है और जानवरों का आश्रय समाप्त होता जा रहा है. जिस वन विभाग को इन जंगलों और जानवरों के सरंक्षण का जिम्मा सौंपा गया है, वही इन जंगलों को कटवा रहा है और जानवरों का शिकार करवा रहा है. कडवी बात है पर सच्चाई यही है कि वनों का कटान वन विभाग की मिली भगत से ही होता है और रसूख वाले लोगों को शिकार कि सुविधा भी वन विभाग ही मुहैया कराता है. वन विभाग के गेस्ट/रेस्ट हाउस किस प्रकार शराब पार्टियों के आयोजन, शिकार करने व पकाने और तफरी के लिए इस्तेमाल होते हैं, ये सभी जानते हैं. ऋषिकेश बाई पास मार्ग पर प्रतिदिन दिन-दहाड़े टनों लकड़ियाँ जंगल से काटकर लाते लोगों को कभी भी देखा जा सकता है और ये सब खुले आम सबके सामने हो रहा है. कभी इस जंगल के भीतर जाकर देखिये या गूगल अर्थ के माध्यम से भी आप देख सकते हैं कि यह जंगल अब सिर्फ नाम का ही रह गया है, इसके अन्दर पेड़ गिनती के ही बचे हैं. अब हाथी जैसे विशालकाय जानवर को अपने सुरक्षित प्रवास और भोजन-पानी जंगल के भीतर नहीं मिलेगा तो निश्चित ही वह मानव बस्तियों की और रूख करेगा और ऐसे में मानव से उसका सामना निश्चित है.
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अभी कुछ वर्ष पहले जब तक कि मल्टी नेशनल वाहन कंपनियों का आगमन नहीं हुआ था, देहरादून से ऋषिकेश के लिए आखिरी बस रात ८ बजे के करीब चलती थी. लेकिन जब से इन मल्टी नेशनल वाहन कंपनियों का आगमन हुआ है इस मार्ग पर देर रात तक ट्रैफिक चलता रहता है. चूंकि देहरादून-ऋषिकेश मार्ग जंगल के बीच से होकर जाता है, हाथी पहले भी सड़क पर अक्सर आ जाया करते थे लेकिन तब वे इतना असुरक्षित महसूस नहीं किया करते थे लेकिन पिछले कुछ वर्षों में घटते जंगल, बढ़ते ट्रैफिक, तेज लाइटों और कान-फोडू हार्न वाले वाहनों के लगातार देर रात तक चलते रहने के कारण हाथी स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं. ये बात जगजाहिर है कि हाथी तेज रोशनी और शोर से घबराता है. मानव बस्ती में कोई अनजान पशु घुस आये तो तो मानव भी पशु हो जाता है और मानव की पाशविकता से ज्यादा खतरनाक दुनिया में कुछ नहीं है, फिर अगर पशु की बस्ती में मानव घुस जाए तो पशु तो अपना प्राकृतिक व्यवहार ही तो कर रहा है, इसमें उसकी क्या गलती है. अपने अस्तित्व पर खतरा जानकार बिल्ली भी कुत्ते को रौद्र रूप दिखा देती है.

    हाथी को बहुत ही समझदार और संवेदनशील जानवर माना जाता है. बचपन में शायद सभी ने हाथी और दरजी के लड़के की कहानी पढ़ी होगी. हाथी मानव की तरह ही बहुत संवेदनशील होता है और बदला लेने की प्रवृत्ति भी उसमे होती है. इस बात की क्या गारंटी है कि इस एक हाथी को मार देने के बाद फिर ऐसी घटनाएं नहीं होंगी. फिर एक और मारोगे, फिर एक और… क्या सारे ही खत्म कर दोगे? पहले ही हमारे देश में संसारचंदों की कमी नहीं है, ऊपर से आप भी इस मुहिम को आगे बढ़ने को तत्पर हैं. वैसे हमारी ये मनुष्य जाति है बड़ी मानवतावादी, पहले जानवरों को मारो, बाद में लोगों को दर्द भरे किस्से सुनाओ कि अरे यार हमारे जमाने में तो फलाना जानवर होता था, फलाना पक्षी होता था, पर यार अब तो देखने को भी नहीं मिलते.

बस बहुत हो गया ड्रामा, अब बंद करो ये बकवास. क्या इन निरीह जानवरों को मारते-मारते 1411 की गिनती पर लाकर ही रुकोगे? फिर लाओगे पकड़ के अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान, आमिर खान और न जाने कौन-कौन से पठान और चौहान और ये टीवी पर आकर कहेंगे कि सिर्फ 1411 ही बचे हैं, जैसे एक भी कम हो गया तो इनकी रेपुटेशन ख़राब हो जायेगी. बाघ तो इतने ही रह गए हैं (भगवान ही जानता है), अब हाथी भी इतने ही कर लो, तैयार कर लो एडवांस में तख्तियां, पोस्टर, बैनर, टोपियाँ और टी-शर्टें जिन पर लिखा हो- “बस 1411 ही बचे हैं”.

 

“तुम तो मानव होकर भी पशुवत हो गए,

फिर भी मानवतावादी बने रहे,

हम तो पशु होकर पशु ही बने रहे,

फिर भी जिन्दा न रहे.”

    सुझाव- इस हाथी को मारने की बजाय ट्रेंकुलाईजर की मदद से बेहोश कर किसी अन्य संरक्षित पार्क या चिड़ियाघर में शिफ्ट कर दिया जाय|
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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

allrounder के द्वारा
November 18, 2011

नमस्कार भाई राजेंद्र जी, जैसे आपके इस ब्लॉग को उचित स्थान मिला है वैसे ही इन बेजुबान हाथियों को भी उचित संरक्षण मिले, अक अति सार्थक लेख के लिए आप बधाई के पात्र हैं !

    rajendra के द्वारा
    November 19, 2011

    धन्यवाद सचिन भाई, बड़े दिनों बाद दिखे…

राजेंद्र भारद्वाज के द्वारा
November 14, 2011

जागरण जंक्शन सम्पादक मंडल का धन्यवाद की इस अपील को टॉप ब्लॉग में जगह दी है, जिसकी वजह से यह लेख ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ पायेंगे और बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कर सकता है| क्या पता इस प्लेटफार्म के माध्यम से ये अपील उन लोगों तक भी पहुंचे जो की इस प्रकार के अमानवीय फैसले के पक्षधर हैं और वे अपनी राय बदलें| अंजाम कुछ भी हो कोशिश करना हमारा फर्ज है|

    santosh kumar के द्वारा
    November 15, 2011

    राजेंद्र जी ,.सादर नमस्कार टाप ब्लाग में आने के लिए आपको हार्दिक बधाइआ ,…JJ का बहुत-बहुत आभार,.एक संवेदनशील रचना को यथोचित मान देने के लिए ,…

    November 16, 2011

    संतोष जी आप सही कहते हैं, इस लेख को लगातार फ्लैश करने के लिए जेजे सम्पादक मंडल बधाई का पात्र है| धन्यवाद|

mparveen के द्वारा
November 14, 2011

मनोरंजन जी नमस्कार, वैसे तो किसी की निजी जिंदगी पर हमें कोई टिपण्णी करने का हक नहीं है पर इन फिल्म स्टार की जिंदगी निजी कहाँ है . आज की युवा पीढ़ी के लिए तो ये जैसे आदर्श बन गए हैं . अब आदर्श ऐसे हैं तो ………. क्या कहे सभी खुद समझदार हैं ……… धन्यवाद……..

    mparveen के द्वारा
    November 14, 2011

    राजेंद्र जी नमस्कार, प्रकृति से प्रेम करेंगे तो बदले में प्रेम ही पाएंगे . पर आज समय बदल गया है किसी को प्रकृति से या फिर बेजुबान जानवरों से कोई लेना देना नहीं रह गया है . अपने फायदे के लिए जब इंसानों का कत्ले आम हो रहा है तो फिर ये बेजुबान जानवर क्या है ?? इंसान जो बोल सकते हैं. अपने हक के लिए लड़ सकते हैं . न्याय मांग सकते हैं जब उनकी कोई सुनवाई नहीं तो इन बेजुबान जानवरों की कौन सुनेगा . ये तो बेचारे बोल नहीं सकते अगर अपने बचाव के लिए लड़ेंगे तो पागल करार कर दिए जायेंगे और गोली का शिकार हो जायेंगे ……. अपने सही कहा की जान लेना हल नहीं है पर जो जल्दी हो जाये आजकल वाही हल रह गया है … इन बेजुबानो को भी जीने का उतना ही हक है जितना इंसानों को तो कृपया इनको भी जीने दे … धन्यवाद ………. और क्षमा चाहूंगी पता नहीं मनोरंजन जी को दी गई प्रतिक्रिया आपकी प्रतिक्रिया के साथ कैसे पोस्ट हो गई है . पता नहीं ….

    November 14, 2011

    परवीन जी नमस्कार, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर मुझे ये गाना याद आ गया- जब जानवर कोई इंसान को मारे, कहते हैं दुनिया में वहशी उसे सारे, इक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है, चुप क्यों है संसार….. आपकी अपील भी अत्यंत प्रासंगिक है कि…..इन बेजुबानो को भी जीने का उतना ही हक है जितना इंसानों को तो कृपया इनको भी जीने दे…. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद….

rameshbajpai के द्वारा
November 13, 2011

विद्वान् श्री राजेन्द्र जी आज काफी दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर पंहुचा हु | पहले आत्मीय श्री शाही जी की रस सिक्त प्रतिक्रिया का आनन्द लिया फिर आपका उत्तर भी लगे हाथ समझ लिया | बाकि पोस्ट बाद में पढ़ लुगा | आज यहाँ आकर मुझे उपहार प्राप्ति जैसा अवर्णीय सुख मिला | वह यह की आपने कमेन्ट के जबाब देने शुरू किये है |आपसी संवाद महज संख्या के लिए नहीं होता | मेरा खुद इन बातो पर यकीं नहीं है ,पर इस भागम भाग के बिच दो शब्दों का संवाद आत्मिक सुख देता है | शुभ कामनाओ सहित

    राजेंद्र भारद्वाज के द्वारा
    November 13, 2011

    आदरणीय बाजपेई जी, आपके ये दो शब्द मेरे लिए हमेशा ही आशीर्वचन समान होते हैं| आपकी बात बिलकुल सही है कि आपसी संवाद बने रहना चाहिए, कोशिश करूंगा की इस संवाद को बनाए रखूँ|

आर.एन. शाही के द्वारा
November 12, 2011

आपका अन्त में दिया गया सुझाव ही रामबाण विकल्प है राजेंद्र जी । बड़े हर्ष का विषय है कि आपने एकबार फ़िर अपने इस दस्तावेज़ी प्रस्तुतिकरण के माध्यम से सीधी सच्ची भाषा में अपना प्रकृति एवं जन्तु प्रेम ज़ाहिर किया । हाथियों का प्राकृतिक कारीडोर जो उनका पुश्तैनी आवागमन का मार्ग हुआ करता था, हर जगह आबादी बसाकर हमने उजाड़ दिया है, जिसका बदला हाथी हर जगह कन्फ़्यूज्ड होकर मनुष्य से ले रहे हैं । झारखंड का भी यही हाल है । कई उन्मत्त हाथियों को पहचान के लिये ‘लादेन’ जैसे नाम देकर अन्त में उन्हें मार डाला गया । है तो यह मानववादी अत्याचार ही, इसमें कोई संदेह नहीं है । लेकिन आपने ऊपर जिस टस्कर की तस्वीर दिखाई है, वह तो अफ़्रीकी नस्ल के हाथी की है । उसका झुन्ड यहां कहां से बन गया । क्या यही वह टस्कर है ? कृपया ज़रूर स्पष्ट करें । उस बड़े गोलाकार कान वाले हाथी के अतिरिक्त आपकी शेष हाथियों की तस्वीरें भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ी प्रजातियों की हैं । कहीं आप भी ‘मस्त’ तो नहीं हो गए ? कल ही आपको कहीं पानी में घुसकर ठंडाते देखा था । थोड़ी शंका इसलिये भी हो रही है, क्योंकि आपने अपने ब्लाग अवतार की भी चिंदियां फ़ाड़कर मदहोशी में उसे चिरकुट जैसा बना डाला है । इस वयोवृद्ध को यदि भ्रम हुआ हो तो क्षमा करेंगे, परन्तु आज आपकी फ़ोटू देखकर मुझे लैला-मजनूँ का ॠषिकपूर याद आ गया । यानि ‘चाक़ गिरेबां…… खाक़ बसर’ ! धन्यवाद ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 12, 2011

    मेरी आखिरी लाइनों को किसी गुरुघंटाल की लंगोट उतारू हरक़त न मान लेना, थोड़ा मज़ाक़ तो करना ही पड़ता है ।

    राजेंद्र भारद्वाज के द्वारा
    November 12, 2011

    आपकी पारखी नजरों से तो कुछ भी बच नहीं पाता है| आपने पिछली बार भी इस पोस्ट पर बड़ा सार्थक और जानकारी बढ़ने वाला कमेन्ट दिया था| आपने इन निर्दोष जानवरों के प्रति अपनी संवेदना जिस प्रकार प्रकट की है वो आपकी पहचान है| रही बात अफ्रीकी नस्ल के हाथी की फोटो की तो आपकी बात सही है| ये फोटो केवल इसलिए डाली थी की तस्कर का मतलब लोगों को समझा सकूं| लेख की शुरुआत में ही मैंने लिखा भी है-…… टस्कर का अर्थ होता है-गजदंतों वाला| विशेषकर अफ्रीका के सभी हाथी चाहे वह नर हो या मादा, टस्कर ही होते है…….. वैसे भी अगर मैं इस असली हाथी की तस्वीर खींचने जाता तो इस लेख को कौन लिखता भला? इसलिए नेट से ये फोटो ले ली| रही बात मेरे ब्लॉग अवतार की तो जैसा की मैंने पहले भी कहा है की यहाँ पर मुझे कोई नाम नहीं कमाना है, बस सार्थक सन्देश देने की कोशिश है| आप जैसे कुछ पुराने लोग जानते हैं कि मैं कौन हूँ, और लोगों को मैं अपनी पहचान नहीं, सन्देश देना चाहता हूँ| इसलिए कृपया “राज” को राज ही रहने दें| और कृपया आपने को वयोवृद्ध कहकर हमारे आदर्श देवानंद जी का अपमान न करें| आपके विचारों में अभी भी २५ साल के नौजवान की सी शोखी और शरारत है| आपने श्रद्धेय गोपाल प्रसाद व्यास जी की वो कविता तो पढ़ी ही होगी- हाय न बूढा कहो मुझे तुम, शब्दकोष में प्रिये और भी बहुत गालियां मिल जाएंगी ….. क्या कहती हो दांत झड रहे, अच्छा है वेदान्त आएगा, दांत बनाने वालों का भी, अरी भला कुछ हो जाएगा…

    राजेंद्र भारद्वाज के द्वारा
    November 12, 2011

    आपकी ये शोखियाँ और मस्तियाँ हीं तो आपको इतना जवान बना देती हैं की हम जैसे नौजवानों से आपकी मित्रता इतनी प्रगाढ़ है| कृपया यूं ही एवेरग्रीन बने रहिये, जिन्दगी की बोरियतें दूर हो जाती हैं|

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 14, 2011

    गुरुवर को प्रणाम अर्पित तथा सादर समर्पित भी है। ऐसे तो काम नहीं बनने वाला। आने दीजिए अगले बड़े त्यौहार को। *************** भईया, देर लगी आने में हमको, शुक्र है फिर भी आये तो, आस ने दिल का साथ ना छोड़ा, वैसे हम घबराये तो; आपसे ज़्यादा कहने कि ज़रूरत नहीं है आप थोड़े में ही मेरी बात को समझ लेते हैं। आपसे “असहमत” तो शायद ही कभी हुआ हूँ और इस विशेष लेख पर, जिससे मैं पूर्व में भी रूबरू हो चुका हूँ, असहमत होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मैं वहाँ आया था तब भी आपने इस विषय पर मुझसे मौखिक चर्चा की थी। अंततः लेख के अंत में लाल रंग और इटैलिक्स में लिखे आपके नोट पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। भारत जैसा देश जहाँ बुद्ध, महावीर, गाँधी जैसे अहिंसा के पथ प्रदर्शक पैदा हुए हैं वहाँ इस तरह के अमानवीय कृत्यों से दूरी बना कर रखना ही श्रेयस्कर होगा ख़ास तौर से तब जब उन जंतु विशेष की प्रजाति पर विलुप्तता का ख़तरा मंडरा रहा हो। सादर प्रणाम।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 14, 2011

    जोगी जी धीरे-धीरे, नदी के तीरे-तीरे  ;-)

    November 14, 2011

    वाहिद भाई सही कहते हो| आपने सही कहा की आपके ऋषिकेश आगमन पर भी मैंने आपसे इस विषय पर चर्चा की थी| दरअसल सीधी और सच्ची बात यही है की जब तक हम किसी भी समस्या के निराकरण के प्रति नैतिक रूप से इमानदार नहीं होंगे, तब तक कोई भी समस्या हल हो ही नहीं सकती| किसी सेलेब्रिटी के एक दिन सड़कों पे दौड़ने से कोई समस्या हल नहीं हो जाती| इसके लिए तो तो एक विचारधारा बनानी होती है जो की आन्दोलन का रूप ले सके| अपने घर में महंगे-२ कुत्ते-बिल्लियों को गले लगाने वाले लोग जंगली पशुओं का शिकार करते हैं, गमलों में खरीद-२ कर पौधे लगाने वाले अपने फायदे के लिए जंगल के जंगल साफ़ करवा देते है| यदि मनुष्य ने इस ईको सिस्टम की जिसका की वह खुद भी अभिन्न अंग है, रक्षा नहीं की तो यह मानव जाति के लिए भी अच्छा नहीं होगा|

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 14, 2011

    बज़ा फ़रमाया, आप दोनों शीत-बसन्त का हार्दिक आभार ! शीत में कोई खास त्यौहार होता नहीं, बस संक्रान्ति का संक्रमण आता है, और तिलाहार का स्वाद चखा जाता है, मय दही के । लेकिन बसन्तराज की बात ही और है । वही आएंगे मीठी गुदगुदी और मदभरी होरी को संग लेकर, जिनके पलाशी रंगों में हम तो क्या, रमेश बाजपेयी सर जैसे लंगोट के धनी भी महीने भर तक बौराए फ़िरते हैं । तब तक तो इंतज़ार ही करना होगा । इस लेख के बेहद रोचक और स्तरीय होने के कारण जागरण परिवार ने भी अपने पशु-प्रेम के वशीभूत द्रवित होकर इसे ऊपर वाली खूंटी पर टांग दिया है, जनता के दर्शनार्थ मसाला लगाकर । राजेंद्र जी को पुन: बधाइयां !

    November 15, 2011

    लगे हाथ ये भी तो बता देते गुरुवर कि शीत कौन है और बसंत कौन ताकि हम लोगों को अपना रेफरेंस ठीक से दे सकते| लगता है आने वाली होली की आप खतरनाक तैयारियां कर चुके हैं| कई ब्लौगरों के पिछली होली के जख्म अभी तक हरे हैं, लगता है फिर से उन्हें कुरेदने की तैयारी है| जागरण जंक्शन सम्पादक मंडल टीम बधाई की हकदार है कि इस अपील को टॉप ब्लॉग में जगह दी है, जिसकी वजह से यह लेख ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ पायेंगे| आजकल रोज ही इस तरह की अपील अखबार में छप रही है और बहुत से लोग इस और सकारात्मक नजरिये से सोच रहे है| कोशिश करना हमारा फर्ज है बाकि प्रशासन के हाथों में है|

पीयूष पंत के द्वारा
November 12, 2011

वन्यजीवों के प्रति लोगों मे जिस तरह उपेक्षा का भाव है वो इन्हें जल्द ही इतिहास बना देगा….. इस सार्थक लेख को पुनः प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार…. ……

    November 12, 2011

    पियूष जी बहुत समय बाद आपको जेजे पर देखा है, इसलिए आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद कहे बिना नहीं रह सकता| वैसे तो समय की कमी के चलते मैं भी जेजे पर अब कम ही लिख पाता हूँ पर आजकल ये मुद्दा इधर काफी चर्चा में है तो अपना पक्ष फिर से रखना चाहता हूँ और सभी बुद्धिजीवियों से भी अपेक्षा है की वे भी इस और सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें| धन्यवाद|

rajkamal के द्वारा
November 12, 2011

प्रिय जुबली कुमार जी ….नमस्कार+शुक्रिया +आदर सहित अभिनन्दन और आभार ऐसा लगता है की आप अपना लेख जागरण के फीचर्ड विभाग से चैक करवा लेते है उसके बाद उसको छापते है ….. हा हा हा हा पिछली बार की जुबली आपने डिलीट कर दी थी लेकिन इस बार वाली संभाल कर रखियेगा आपका मुबार्कबाद सहित आभार न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/11/राजकमल-इन-पञ्चकोटि-महामण/ प्रतिकिर्या के लिए आपकी तरफ से मुझको धन्यवाद

    November 12, 2011

    प्रिय राजकमल जी ….आपको भी नमस्कार+शुक्रिया +आदर सहित अभिनन्दन और आभार| ये तो आपकी विनम्रता ही है हुजूर की आपने ही इस बन्दे को जुबली कुमार बना दिया …….इस उपाधि के बाद अब फीचर्ड की तो फिर बात ही क्या है| वैसे तो आप जानते ही हैं की कार्य की अधिकता और जिम्मेदारी बढ़ जाने के बाद जेजे के लिए समय कम है, पर बासी कढ़ी भी छौंका लगा के और राजकमलिया कमेन्ट के तडके के बाद खूब स्वाद देगी, इसका मुझे यकीन है| मुझे पता है की जेजे पर आपकी सक्रियता का जवाब नहीं है और आप जैसे ही कुछ और जागरूक लेखक/पाठक इस ग्रुप में जागरूकता और जीवन्तता बनाए रखते हैं| मेरे पिछले लेख पर जितने लोगों ने रेटिंग दी उतनी रेटिंग मुझे इससे पहले अपने किसी भी लेख पर तब भी नहीं मिली थी जब मैं खूब सक्रीय था| इससे इस प्लेटफार्म पर लोगों की जागरूकता का पता चलता है| समय की कमी की वजह से किसी को न तो प्रतिक्रिया दे पाता हूँ और न ही अपने लेख पर प्रतिक्रिया का जवाब दे पाता हूँ, पर इस लेख पर दो दूनी चार और चार दूनी आठ भी करना पड़े तो करूंगा क्योंकि मैं चाहता हूँ की लोग इस विषय पर गंभीरता से सोचें| नये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की कॉमन बधाई दे कर आप बच नहीं सकते, जब भी त्यौहार आएगा मैं आपको और आप मुझे बधाई देना| ईश्वर आपको यूंही प्रसन्न बनाए रखे| धन्यवाद|

Santosh Kumar के द्वारा
November 12, 2011

आदरणीय राजेंद्र जी ,.नमस्कार आपकी संवेदनाओं को नमन ,…हाथी जैसे संवेदनशील और मानव प्रजाति से मित्रवत जानवर को हमारी अंधी विकासशीलता बेघर कर रही है ..उनको भी गुस्सा आता है ,..लेकिन हमारे मुकाबले बहुत ही कम !…कारण सहित सुझाव देता बहुत ही अच्छा लेख ,…काश कुछ सार्थक हो सके …साधुवाद

    November 12, 2011

    संतोष जी नमस्कार, आपकी सक्रियता और जागरूकता को मेरा भी नमन है| मैं भले ही जेजे पर कम सक्रीय हूँ पर आप जैसे बुद्धिजीवी और संवेदनशील लेखक इस मंच को संभाले हुए हैं, इसके लिए आपको धन्यवाद और बधाई| मेरे द्वारा लेखों पर प्रतिक्रिया न दे पाने और न ही अपने लेख पर प्रतिक्रिया का जवाब दे पाने के बावजूद भी आपकी प्रतिक्रियाएं मेरे लेख पर आती रहती हैं, इसके लिए आपको शुक्रिया| इस संवेदनशील मुद्दे पर आपकी प्रतिक्रिया निश्चित ही विषय को ध्यानाकर्षित करने योग्य बनाएगी| धन्यवाद|

    Santosh Kumar के द्वारा
    November 12, 2011

    आदरणीय राजेंद्र जी ,.. मेरे अहोभाग्य जो आपने जबाब दिया ,..आपकी व्यस्तता को समझ सकता हूँ ,…मुझे बुद्धिजीवी कहकर आप सच में मूरख का मजाक उड़ा रहे हैं,..मेरे विचार से सब संवेदनशील होते हैं ,..रूचि के विषय अलग अलग हो जाते हैं ,.जो कुछ लिख पाता हूँ उसके लिए इस मंच और परिस्थितियों को जिम्मेदार मानता हूँ ,…अब तो ब्लागिंग का नशा सा हो गया है ,…उतार रहा हूँ ,..संतुलन बना रहा हूँ .. हरिद्वार- ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर हाथियों की समस्याएं बहुत बढ़ गयी हैं ,..इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं … आपका आलेख इस समस्या को बहुत ही अच्छे से उठा रहा है ,..इसपर अवश्य ही विमर्श होना चाहिए ..आपका हार्दिक आभार

    राजेंद्र भारद्वाज के द्वारा
    November 12, 2011

    संतोष जी आप ऐसा न कहें, हालांकि मै इस काबिल तो नहीं कि किसी की विशेषताओं का विश्लेषण कर सकूं पर मेरा मानना है कि हर इंसान बुद्धिजीवी होता है और उसमें बहुत क्षमता होती है| बस इतना है कि ये मैन टू मैन वैरी करता है कि वो अपने चरित्र का कौन सा पहलू एक्सपोज करता है| आपने स्वयं लिखा भी है…..मेरे विचार से सब संवेदनशील होते हैं ,..रूचि के विषय अलग अलग हो जाते हैं…. आपने ब्लागिंग का नशा होने का जिक्र किया है तो वो शुरू-२ में सबके साथ होता है….इसका जिक्र मैंने अपने लेख ‘बुरा मानो या भला’ में भी किया था| फिर भी चाहे कुछ भी हो ये एक सार्थक और रचनात्मक क्रिया तो है| इस मंच के माध्यम से हम अपना सन्देश, अपने विचार देश-विदेश के बहुत से लोगों तक तो पहुंचा ही पा रहे है| और यकीन मानिए इसका इम्पैक्ट भी होता है| आपकी भावनाओं के लिए धन्यवाद|


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