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क्या इस देश का वोटर गधा है?

Posted On: 23 Jan, 2012 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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अंगारचंद को खुद पर बड़ा अफ़सोस रहता है कि जिंदगी यूं ही बीत गई पर वो आज तक कुछ बन नहीं पाया| लेकिन अगर अंगारचंद अपने जीवन में आज तक बड़ा आदमी नहीं बन पाया तो इसके कुछ खास कारण हैं| एक तो अंगारचंद खुद को जरूरत से ज्यादा होशियार समझता है, दूसरे हर बात का नेगेटिव एनालाइसिस करता है, तीसरे वो खुद को बहुत ज्यादा आत्मसम्मानी समझता है| जबकि बड़ा आदमी बनने के लिए इन अवगुणों का न होना बहुत जरूरी होता है| यानी कि कोई भी काम करते समय अपना दिमाग हमेशा किनारे रखो, हर बात में हाँ में हाँ मिलाओ, और तुम्हारी कितनी भी उतारी जाय उफ़ न करो, बस चुप रहो| अगर अंगारचंद ने खुद में ऐसे गुणों का समावेश कर लिया होता तो निश्चित ही वो आज कुछ और नहीं तो कम से कम इस देश का प्रधानमंत्री तो बन ही गया होता| या अगर अंगारचंद भी बिना दिमाग लगाए सिर्फ छब्बीस या बत्तीस रुपये में आम आदमी को पौष्टिक भोजन खिलाने की कैलकुलेशन कर सकता तो वो अंगारचंद अहलूवालिया भी बन सकता था| या अंगारचंद तलवे चाटने के योग्यता रखता तो कोई छोटा-मोटा मंत्री भी बन सकता था|

 

अब देखिये कि चुनाव आयोग में भी तो बड़े-२ काबिल अधिकारी हैं, पर अपना अंगारचंद है कि इनके निर्णयों से सहमत ही नहीं होता, नेगेटिव थिंकिंग जो ठहरी| चुनाव आयोग का मानना है कि हाथी पर कपडा डाल दो तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि कपडे के नीचे क्या है क्यों कि इस देश का वोटर तो गधा है, उसे हाथी की क्या पहचान| लेकिन अपना अंगारचंद इससे सहमत नहीं है| अंगारचंद का मानना है कि इस देश का वोटर गधा नहीं है जिसे कि आप ‘चोली के पीछे क्या है, चोली में दिल है मेरा’ कहकर बेवकूफ बना सको| अट्ठारह साल के ऊपर का जो आदमी यह नहीं जानता कि चोली के पीछे क्या है, वही निश्चित रूप से गधा है| बल्कि अब तो अट्ठारह साल से नीचे के स्कूली लड़के भी इतना ज्ञान रखने लगे हैं कि चोली के पीछे क्या है| अंगारचंद का दिमाग तो कहता है कि कपडा डालना है तो किसी छोटे-मोटे जानवर के ऊपर डालो, जिससे कि वाकई में जनता को बेवकूफ बनाया जा सके और वो समझ न सके कि कपडे के पीछे कुत्ता है या बिल्ली, घोडा है या गधा| हाथी जैसे जानवर पर कपडा डाल के छुपाने की कोशिश करना ऐसा ही है जैसे सन्नी लियोन का जिस्म कपडे से ढंकने की कोशिश करना|

 

चुनाव आयोग के दानिशमंद लोगों ने आचार संहिता बनाई है कि चुनाव के दौरान कोई भी प्रत्याशी जनता मे कोई उपहार जैसे कम्बल, साड़ी/धोती, सिलाई मशीन, धन या शराब आदि बांटकर वोट खरीदने की कोशिश नहीं कर सकता| यहाँ भी चुनाव आयोग से अंगारचंद सहमत नहीं है| भाई अगर गरीबों को इस चुनाव के बहाने ही सही, कुछ मिल रहा है तो चुनाव आयोग के पेट में दर्द क्यों हो रहा है| क्या चुनाव आयोग खुद गरीबों के लिए कुछ करता है क्या? जब चुनाव आयोग गरीबों को कुछ दे नहीं सकता तो जो उन्हें मिल रहा है उसे छीन क्यों रहा है?

 

और शराब तो गरीबों की संजीवनी है| शराब सिर्फ उनके लिए अच्छी या बुरी है जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं| पैसे वालों के पास ही ये ऑप्शन होता है कि आज भूख है या नहीं, आज चिकन टिक्का खाना है या पनीर टिक्का, आज कौन सी पीनी है या मूड नहीं है, या पीते ही नहीं हैं| गरीबों के पास तो भूख हमेशा होती ही होती है और खाने या पीने में ऑप्शन नहीं होते| गरीबों के पास खाने का हमेशा अभाव होता है और उस अभाव को भूलने में मदद करती है शराब| दिन भर भूखे पेट रहकर हाड-तोड़ मेहनत के बाद कोई गरीब अपने दुखते जिस्म की किसी मसाज सेंटर में मालिश करवाने की औकात नहीं रखता और न ही उसे कोई पौष्टिक भोजन नसीब होता है| इसलिए गरीब नशे के पीछे अपने कष्टों को भुलाने की कोशिश करता है| मुंशी प्रेमचंद के पात्रों को ही उठा लीजिए| हलकू हो या होरी, पूस की सर्दी में ठण्ड से बचने के लिए कम्बल या रजाई के अभाव में तम्बाकू ही उनका सहारा होता है| इस कडाके की सर्दी में गरीबों को थ्री एक्स रम फ्री में मिल जाती तो उन की सर्दी मजे से कट जाती| सरकार यूं ही फौजियों को सस्ते दामों पर दारू की सुविधा नहीं देती, इसी के सहारे ही फ़ौजी बर्फीले इलाकों में ड्यूटी कर पाते हैं|

 

अब जो गरीब मजदूर अपनी औकात के हिसाब से घटिया, कच्ची-पक्की दारू पीता है, उसे चुनाव के दिनों में अगर उसकी औकात से ऊपर के ब्रांड फ्री में मिल रहे हैं तो किसी को क्या आपत्ति है| और अगर किसी को इस बात से परेशानी है तो वो आगे आकर उनके रोटी-कपडे की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता| ये तो वही बात हुई कि न तो खुद कुछ देंगे और न किसी को देने देंगे| और चुनाव आयोग को ऐसा क्यों लगता है कि इन चीजों से वोटर बहकाए जा सकते हैं| अगर चुनाव आयोग एक वोटर को इतना बेवकूफ समझता है तो उसे वोटर से वोट देने का अधिकार भी छीन लेना चाहिए|

 

पंजाब में चुनाव आयोग ने प्रकाश सिंह बादल के गाँव बादल में चल रहे सीवर, सड़क-नालियों के निर्माण कार्य पर यह कहकर रोक लगा दी कि बादल चुनाव की घोषणा/आचार-संहिता लागू होने के बाद भी काम करवा रहे हैं| भाई ये क्या बात हुई? इन कामों के रुकने से न तो चुनाव आयोग को कोई परेशानी होगी और न ही बादल को, परेशानी होगी तो सिर्फ जनता को| क्या इसकी जिम्मेदार जनता है?

 

चुनावों के दौरान सबसे ज्यादा खौफजदा रहते हैं सरकारी कर्मचारी और उनमें से भी खासतौर पर स्कूलों के मास्टर जिनकी इन चुनावों में ड्यूटी लगती है| अंगारचंद का अनुभव है एक भी शख्स इस ड्यूटी से खुश नहीं होता बल्कि खीजता ही है| कभी चुनाव आयोग ने इस पहलू पर भी ध्यान दिया कि ऐसा क्यों है| क्यों सरकारी कर्मचारी इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजन के अवसर पर अपना योगदान देने में खुशी से आगे नहीं आते| क्यों हर कोई कोशिश करता है कि किसी तरीके से इस ड्यूटी से छुटकारा मिल जाय| इसका कारण है कि एक सरकारी कर्मचारी के पूरे सेवाकाल में यही एक ऐसी ड्यूटी होती है जिसे कि उसे अपनी जेब से खर्चा करके करना पड़ता है| चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों को मिलने वाला यात्रा और दैनिक भत्ता न सिर्फ काफी कम होता है बल्कि कई बार तो यह मिलता ही नहीं है| क्या चुनाव आयोग ने कभी इस तथ्य की और ध्यान दिया और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि चुनाव कर्मियों को पर्याप्त भत्ता मिलता भी है या नहीं| इसके अतिरिक्त दुर्गम स्थानों पर ड्यूटी लगने की स्थिति में चुनाव कर्मियों को होने वाली परेशानियों पर भी किसी का ध्यान नहीं जाता| एक बार अंगारचंद की भी चुनाव में पहाड़ में ऐसी जगह ड्यूटी लग गई जहां कि एक दो कमरे का प्राइमरी स्कूल बिलकुल सुनसान में था| उस स्कूल में न तो कोई टॉयलेट-बाथरूम था, न पानी की कोई व्यवस्था, न खाने और सोने की कोई व्यवस्था, न बिजली, न कोई फर्नीचर| मुख्य सड़क से पांच किमी० की पैदल खडी चढाई और सुरक्षा के नाम पर सिर्फ दो नए-नवेले ठु….मतलब पुलिस वाले जिनके पास डंडा तक नहीं था| एक टूटी-फूटी कुर्सी को उधार की चद्दर से घेर कर जैसे-तैसे पोलिंग बूथ बनाया गया और मतदान कराया गया| विश्वास नहीं होता कि इस तरह की फटीचर व्यवस्था से राजा और कलमाडी जैसे चुने जाते हैं जो करोड़ों-अरबों का घोटाला करते हैं| इस भिखारी व्यवस्था से तो बेहतर है कि किसी प्रत्याशी को यह व्यवस्था सौंप दी जाय तो वह चुनाव कर्मियों को चुनाव आयोग से कहीं बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवा देगा|

 

इस समय समूचे उत्तराखंड में कडाके की सर्दी पड रही है और कई स्थानों पर भारी हिमपात हुआ है| चुनाव आयोग किसी भी कीमत पर इन विषम परिस्थितियों में भी मतदान कराने पर अडा हुआ है लेकिन उसका ध्यान इस और बिलकुल भी नहीं है कि चुनाव कर्मियों खास-तौर पर उम्रदराज लोगों को कितनी परेशानी उठानी पड़ेगी| किस बंदे को क्या तकलीफ है, क्या बीमारी है, क्या मजबूरी है, इससे चुनाव आयोग को कोई मतलब नहीं है, बस जोत दो बूढ़े बैलों को भी भ्रष्टाचारी नेताओं की उत्पादन प्रक्रिया में|

 

अंगारचंद चुनाव के दौरान प्रत्याशियों द्वारा संपत्ति की घोषणा के ड्रामे से भी असंतुष्ट है| यह सारा ड्रामा इस देश की जनता का मजाक सा उड़ाता हुआ प्रतीत होता है| आज के दौर में मजदूर-मिस्त्री, धोबी-मोची, सब्जी बेचने वाले तक मोटर साइकिल, मोटरकार, कम्प्यूटर-लैपटॉप, मोबाइल जैसी चीजें मेंटेन कर रहे हैं| ऐसे में क्या ये बात हजम होने वाली है कि इसी देश में उन सोनिया-राहुल के पास अपनी साइकिल तक न हो, अपना घर न हो जिनके खानदान ने आजादी मिलने के बाद से ही लगातार इस देश पर राज किया है| अगर इमानदारी से ऐसा है तो धिक्कार है हमें कि जिस परिवार ने इस देश के लिए इतनी कुर्बानियां दी, इतनी सेवा की कि खुद के लिए कुछ नहीं कर सके, हम उनके लिए कुछ भी नहीं कर सके| आज भी राहुल दलितों के घर पर रूखी-सूखी खाकर जमीन पर सो जाते हैं तो ये उनका दिखावा नहीं बल्कि आर्थिक अभाव है| एक बार तो उन्होंने तसला उठाकर मजदूरी तक की| इसके लिए उन्हें मनरेगा के तहत कुछ तो मिलना ही चाहिए ही था| हमारे देश का प्रधानमंत्री भी देखिये कितना ईमानदार है कि आज तक एक खटारा मारुती-800 से ऊपर अपना स्तर नहीं उठा पाया| इस नजरिये से देखें तो आज की तारीख में तो एक फोर्थ क्लास कर्मचारी भी इनसे कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में है| पर जिन्हें इस देश की सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध हों तो वो अपनी क्यों ले, जनता के पैसों की मौज क्यों न ले|

 

राहुल ने कहा कि उमा भारती उत्तर प्रदेश के बाहर से आकर चुनाव लड़ रही हैं| अंगारचंद का कहना है कि जब बाहर का क्रॉस ब्रीड कीनू नागपुर के संतरों को बर्बाद कर सकता है तब उमा भारती तो फिर भी भारत की ही हैं|

 

इस देश में कुछ तथाकथित लोग जनता के स्वयम्भू हितैषी बनकर विदेशों में काले धन का राग अलापे हुए हैं| जनता का भावनात्मक शोषण कर खुद काले धन के ढेर पर बैठकर वो जिस हाथ से दूसरों के काले धन की ओर एक उंगली दिखा रहे हैं, उसी हाथ की तीन उंगलियां उनकी खुद की ओर हैं पर उनकी समझ में ये बात नहीं आ रही है| एक चोर की ये प्रकृति होती है कि वो कभी अपने तकिये के नीचे छुपे धन को नहीं देख पाता और उसे दूसरों के तकिये के नीचे खोजता रहता है| अंगारचंद का दावा है कि इस देश के भीतर इतना काला धन है कि देश के बाहर का काला धन इसके सामने ऊँट के मुंह में जीरा है|

 

जॉर्ज बुश के ऊपर जूता फेंके जाने की घटना ने इस देश के उत्साही लोगों को एक नई ही दिशा प्रदान की है| यह एडवेंचरस खेल बड़ी तेजी से फैशन का रूप ले चुका है और पहचान पाने का शॉर्ट कट बन चुका है| जितना बड़ा निशाना, उतनी प्रसिद्धि| और तो और जूता फेंकने वाले को माफ करना भी बड़े लोगों का फैशन बन चुका है| देहरादून में टीम अन्ना के बाद आज राहुल की सभा में भी जूते का जलवा चर्चा में रहा| जूता फेंकने की कोशिश करने वाले को एक और जूता फेंकने का निमंत्रण देकर राहुल भी चर्चा में आ गए|

 

बड़ा आदमी न बन पाने के इन्फीरियरटी कॉम्प्लेक्स के चलते हताशा में कभी-कभी तो अंगारचंद का मन भी करता है कि काश कोई उस पर भी जूते फेंके जिससे कि वह भी अपनी पहचान बना सके, सेलेब्रिटी बन सके| लेकिन अंगारचंद ये नहीं जानता कि बड़े लोगों पर जूते चलें तो उनका नाम होता है और आम आदमी पर चलें तो उसकी बेइज्जती होती है और अंगारचंद एक आम आदमी से ज्यादा कुछ नहीं है|

 

इस लिए प्यारे अंगारचंद आम आदमी ही बन के रहो और अपनी इज्जत बचाए रहो| इज्जत कमाने में जिंदगी बीत जाती है और गंवाने में एक पल भी नहीं लगता|

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

February 1, 2012

प्रिय मनोज जी, आपका अनुमान बिलकुल सही है, भारद्वाज मेरा गोत्र है| अन्गार्चंद को आपकी कोई भी बात बुरी नहीं लगी है, बल्कि अंगारचंद भी आपमें अपना अक्स देखता है| बहुत समय बाद आपसे संवाद हुआ, बड़ा अच्छा लगा| हम सब अपनी-२ व्यस्तताओं के चलते आपस में संवाद भले नहीं कर पाते हों पर हमारे लक्ष्य एक से हैं| जल्द ही आपसे बात होगी|

viplavimayank के द्वारा
February 1, 2012

प्रिय भाई राजेन्द्र जी भरद्वाज तो संभवतः आपका गोत्र होगा ऐसा प्रतीत होता है|भाई अंगारचंद को यह बात बुरी लगी हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ..वैसे अंगारचंद का फिजिक कुछ कुछ इस बन्दे से भी मेल खाता है|चुनाव आयोग की तो मति मारी गयी है..हांथी को कपडा पहनाता है और बी एड डिग्री धारकों को चुनाव आचार संहिता के नाम पर यूपीटीइटी उत्तीर्ण कर लेने के वावजूद तिगनी का नाच नचा देता है|अब तो चुनाव काम न करने का एक बहाना भी बन गया है|कभी कभी ऐसा लगता है की जब चुनावों के समय ऐसी दशा है तो राष्ट्रिय आपातकाल के समय क्या होता होगा?एक बहुत ही सुन्दर आलेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएं

deepak badwal के द्वारा
January 26, 2012

बहुत खूब…. wonderful… अति सुन्दर Marvelous धेरै राम्रो … बहुत सुन्दर लेखिउं छ … भैजी

    January 26, 2012

    धन्यवाद दीपक भाई, इस बहुभाषीय प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया|

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 26, 2012

प्रणाम, आजकल नेट पर आनाजाना कम ही हो पाता है और जागरण पर तो न के बराबर आज आया तो टॉप ब्लॉग में आपका यह करारा और आपके चिरपरिचित अंदाज़ में लिखा लेख देख कर बड़ा हर्ष हुआ। एक ही बार में ऊपर से नीचे तक पूरा पढ़ गया वो भी दो कारणों से। पहला कि ये आपका लेख है और दूसरा ये कि जाने फिर कब यहाँ आने का मौक़ा मिल पाए। ;-) बखिया उधेड़ता शानदार लेख, 5/5

    January 26, 2012

    वाहिद भाई प्रणाम, जो स्थिति आपकी है कमोबेश वही स्थिति मेरी भी है| आप तो जानते ही हो मुझे लेख लिखने के लिए रात्री में ही समय मिल पाता है और बिना किसी रीटेक के एक ही बार में लेख लिख देने में रात भर का जागरण हो जाता है| कल क्षणभर को यह लेख फीचर में आकर हट गया तो मैं निराश था कि इतनी रात जाग-२ कर लेख लिखा और लोग पढ़ भी नहीं पाए| आपसे ही पता चला कि यह लेख टॉप ब्लॉग में टंगा पडा है| इसके लिए जेजे की सम्पादकीय टीम बधाई की पात्र है| काफी दिनों बाद यह लेख लिखा तो इसका कारण चुनाव हैं| चुनावी प्रत्याशी अपने भविष्य के लिए चिंतित हैं, चुनाव आयोग अपने कामों के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा है, अन्ना और बाबा अपनी मुहिम छेड़े हुए हैं, सबको अपनी-अपनी पडी है पर आम जनता से किसी को मतलब नहीं है| खासतौर पर उत्तराखंड के चुनावकर्मी इस खराब मौसम में अपनी ड्यूटी लगने पर परेशान फिर रहे हैं| मैंने तो बस जनता के दुखड़ों का संकलन भर करने की कोशिश की है| …और हाँ ये भी सच है कि मेरा भी अगला लेख लिखना कब संभव हो, कह नहीं सकता| प्रतिक्रिया के लिए थैंक्स….

dineshaastik के द्वारा
January 26, 2012

राजेंद्र जी नमस्कार, आपने बहुत ही स्वादिष्ट व्यंग व्यंजन परोसा है। मजी आ गया। चुटीला एवं करारा व्यंग साथ ही रोचक भी। व्यवस्था पर सही निशाना लगा है आपका। धारा प्रवाह व्यंग। अधिकाधिक बधाई…… कृपया इसे भी पढ़े- “क्या यही गणतंत्र है” http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    January 26, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी, आपको मजा आया तो हमारा भी लिखना सार्थक हुआ| आपका लेख अवश्य ही पढूंगा| फिर से धन्यवाद….

ashok kumar dubey के द्वारा
January 25, 2012

अंगारचंद के विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ राजनीती में अब दिखावे के आलावा कुछ नहीं बचा है कथनी और करनी में कितना फर्क है यह इस देश की जनता अछि तरह जान चुकी है कितने चुनाव आजादी के बाद हुए हर चुनाव में नेताओं ने तरह तरह के वादे किये पर उनको पूरा कितनों ने किया हाँ जो नेता लखपति थे वे अरबपति बन गए और करोड़पतियों की तो गिनती नहीं देश में विकास जरुर हुवा है काम भी बहुत हुवा है पर जिसको समग्र विकास कहें ऐसा कुछ नहीं हुवा कहा जा रहा है चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र और सशक्त संस्था है पर इस आयोग का क्या हाल किया सलमान खुर्शीद ने जब चुनाव आयोग ने एतराज किया उनके मुस्लिम आरक्छन के एलान पर उनका कहना था एतराज हीं किया है न कोई फाँसी की सजा सुनाई है क्या ? अब भला इतने वरिष्ट नेता इस तरह का बयां देंगे उससे क्या पता लगता है क्या सचमुच चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संस्था है नहीं कतई नहीं यह भी सरकार के मर्जी का कम करता है वर्ना जो धर पकड़ हो रहें हैं उनका खुलासा होता की किस पार्टी के कार्यकर्त्ता कौन सा रुपया कहाँ ले जा रहें हैं हो सकता है केवल विरोधी दलों के पैसों को ये पुलिसवाले पकड़ रहे हों यहाँ तो सीबीआई भी उनके खिलाफ कार्रवाई करती है जिनको सरकार या कांग्रेस ने सबक सिखाना हो या धमकाकर अपने पक्छ में वोट लेना हो समर्थन लेना हो आज अचानक यूपी में छापे क्यूँ पड़ने लगे अब तक ये छापे क्यूँ नहीं पड़े थे जब तक मायावती इस सरकार का समर्थन करती रही ये चुप रहे भ्रस्ताचार होने दिए और मायावती ने इन नेताओं को गले लगाया और चुनाव की तारीख तय होते हिन् २५ नेता भ्रष्ट हो गए ऐसा क्यूँ ? अब तो बिचारे वे नेता बलि के बकरे बने अब तक तो वे माननीय मायावती के घर हप्ता पहुंचाते रहे और आखिर में धरे गए ऐसे माहौल में आम आदमी तो यूँ हीं तमाशबीन बनकर सब कुछ देखता रह जायेगा सहता रह जायेगा और इस चुनाव में फिर से उन्हें हीं जिताने का काम करेगा क्यूंकि वोट देना उसका कर्तव्य है जनता का पैसा लूटना नेताओं का कर्तब्य एवं अधिकार दोनों है अतः आम आदमी बने रहना ज्यादा ठीक है बनिस्पत इस चुनाव में टिकट लेकर चुनाव लड़ना और किसी अछि छाबिवाले नेता की कल्पना करना कोरी बकवास है जैसे चलता है चलता रहेगा और चुनाव आयेंगे जायेंगे यही नेता हमसबपर राज करेंगे

    January 25, 2012

    अशोक जी, आपने जिस तसल्लीबख्श तरीके से प्रतिक्रिया दी है और अपने विचार भी रखे हैं उससे साफ़ पता चलता है कि आप गंभीरता से लेख पढते हैं और आपके विचार आपकी जागरूकता को प्रदर्शित भी करते हैं| इस तरह की प्रतिक्रया से हमारे लिखने का उद्देश्य भी सार्थक हो जाता है और हममे नई ऊर्जा का निर्माण भी करता है|लेकिन यकीन मानिए कि इस सब का असर हो रहा है भले ही धीरे-२…….वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को बदलने में थोडा समय जरूर लग रहा है पर ये तस्वीर बदलेगी जरूर…बस हम कोशिश करते रहें ….जैसे भी हमारे बस में हो….. धन्यवाद…

abodhbaalak के द्वारा
January 25, 2012

राजेंद्र जी आपने बड़े ही खूबसूरत ढंग से लपेटा है उन्हें भी ……….. आखरी लाइन ने तो जैसे ………. सदा की तरह एक उत्कृष्ट … http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    January 25, 2012

    अबोध जी, आपका भी जवाब नहीं| हमेशा के तरह से जिस खूबसूरत अंदाज में आप प्रतिक्रया देते हैं और आखिर में…….छोड़ देते हैं, वो वाकई में, ये एक शानदार अंदाज है|

allrounder के द्वारा
January 25, 2012

नमस्कार भाई, चुनाव के इस माहौल मैं जब सारे लोग नेताओं को खदेड़ने पर तुले हुए हैं आपने तो आयोग को ही खदेड़ डाला ! बेहतरीन प्रस्तुति पर बधाई आपको !

Rajkamal Sharma के द्वारा
January 24, 2012

अब जब अपने इज्जतदार अंगार चंद भाई (आम) गरीब की जोरू और बेटी की तरह से अपनी इज्जत की फ़िक्र करने लग जाए तो फिर उन से भी आर्डिनरी लोगों का क्या होगा ?…… सन्नी लियोन का जिस्म ढकने वाली बात गुदगुदा गई ….. सभी बाते अच्छी लगी किस का जिक्र करु और किस को छोडू हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    January 25, 2012

    प्रिय राजकमल जी, मुझे पता था कि मैं भले ही जेजे पर ज्यादा सक्रिय नहीं हूँ पर आपकी नजरों से इस लेख का बचना मुमकिन नहीं है| जनाब हमारा मुद्दा तो कुछ और ही था पर आपने पकड़ा तो सन्नी लियोन को| चलिए इसी बहाने आपकी इश्वर प्रदत्त कृतियों के प्रति श्रद्धा का तो पता चला| हमने तो इसे ढंकने की बहुत कोशिश की पर आपकी भेदती नजरों से इसका बचना नामुमकिन था|….


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