अंगार

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नेकी कर और कुँए में डाल

Posted On: 2 Mar, 2012 Others में

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अंगारचंद ने पिछले कई दिनों से जेजे अर्थात जागरण जंक्शन की तरफ जाना काफी कम कर दिया था| बरसाती मेंढकों की तरह उग आये लेखकों की भीड़ में अंगारचंद की अपनी पहचान गुम सी होने लगी थी| अंगारचंद कोई बहुत बड़ा लेखक तो नहीं पर अगर कुछ लेखक अंगारचंद से ऊपर होंगे तो शायद कुछ तो नीचे भी होंगे, ऐसा अंगारचंद को लगता है| भले ही अंगारचंद में अद्वितीय लेखन प्रतिभा न हो पर उसने अपने लेखों के माध्यम से सामाजिक हित में कुछ न कुछ सार्थक सन्देश देने की हमेशा ही कोशिश की है| लेकिन इस मंच पर दो दूनी चार और चार दूनी आठ की बढ़ती निरर्थक परंपरा के चलते अंगारचंद को लगने लगा है कि इस प्रतिस्पर्धा में केवल एक ही चीज हार सकती है और वो है सार्थक लेखन| इसलिए अंगारचंद ने इस जंक्शन पर घूमना कम कर दिया है, कभी कदम इस ओर उठते हैं तो सिर्फ कुछ सम्माननीय साथी लेखकों की मित्रता के नाते|

 

अभी कल की ही बात है, फेसबुक पर भ्रमण करते-२ अचानक जेजे पर किसी लफड़े की बू आई तो अंगारचंद ने जेजे पर जाकर हालात का जायजा लिया और यह जानकर अत्यंत दुःखी  हुआ कि कई लेखकों के सम्माननीय और इस मंच के वरिष्ठ लेखक श्री रविन्द्रनाथ शाही जी को इस कदर ठेस पहुँची कि उन्हें अपनी व्यथा लेख के माध्यम से प्रकट करनी पड़ी| शाही जी जैसे विनोदी स्वभाव के व्यक्ति की इस प्रतिक्रिया का मतलब साफ़ है कि उन्हें बहुत ज्यादा ठेस पहुंचाई गई है, चाहे वो जाने में हो या अनजाने में| जेजे के पुराने लेखकों और पाठकों में से शायद ही कोई होगा जो शाही जी की सुधी लेखन प्रतिभा का प्रशंसक न हो| शाही जी की इस प्रतिक्रिया का कारण अंगारचंद साफ़ समझ और महसूस कर सकता है क्योंकि इस मंच पर जो भी लेखक सार्थक लेखन कर रहे हैं वे अपने व्यस्ततम समय से भी समय निकालकर कैसे इस निस्वार्थ लेखन के कार्य को अंजाम दे रहा है, सिर्फ वही जानता है| उस पर भी उसकी रचना कबाड के ढेर में दबा दी जाय तो ठेस पहुंचना तो स्वाभाविक ही है|

 

अंगारचंद का अपना विचार है कि जेजे को स्तरीय लेखन और लेखकों की कोई खास परवाह नहीं है| इसका कारण भी स्पष्ट है कि इस मंच पर बरसाती कुकुरमुत्तों की भाँती रोज ही कितने ही तथाकथित लेखक जन्म ले रहे हैं| कोई क्या लिख रहा है, कोई पढ़ रहा है या नहीं, इससे किसी को कोई मतलब नहीं है, बस दो के चार और चार के आठ करने में ही जनता व्यस्त है, और जेजे की साईट भी दिनों-दिन लोकप्रिय हो रही है| लोग एक-दूसरे से उलझ रहे है, एक-दूसरे को अभद्र कमेन्ट कर रहे हैं तो इससे किसी को क्या फर्क पड रहा है, मंच तो दिनों-दिन लोकप्रिय हो रहा है| इसका जिम्मेदार कौन है?

 

पिछले दिनों अंगारचंद ने रा-वन फिल्म पर एक समीक्षा लिखी थी| इस पर किसी समथिंग मालपानी नाम के एक शख्श ने जो कि शायद अपनी माता का अत्यंत सम्मान करता होगा, अपनी माता के नाम के आगे कुछ अलंकार लगाकर प्रतिक्रिया की| शायद कुछ लोगों ने उसे पढ़ा भी होगा| लेकिन पता नहीं जेजे ने ब्लॉगर ऑफ द वीक, चर्चित, पठित, टॉप ब्लॉग्स आदि से फुर्सत पाकर इसे देखा या नहीं| मजबूर होकर अंगारचंद को स्वयं ही इस मंच से बाहर जाकर उस मालपानी के घर में घुसकर उससे निपटना पड़ा और उसकी माता का सम्मान करना पडा और उसे बताना पडा कि आग (अंगार) और भाईसाहब दोनों से पंगा लेना कितना घातक होता है|| इस मंच पर कोई भी किसी को गाली देने की स्वतंत्रता रखता है, ये बड़ी जोरदार बात है और इसका अनुभव अंगारचंद को पहले भी कई बार हो चुका है|

 

अंगारचंद जेजे की इन नीतियों का खुलासा पहले भी अपने लेख ‘बुरा मानो या भला’ में कर चुका है और फिर स्पष्ट कर देना चाहता है, भले किसी को इससे कोई फर्क पड़े या न पड़े | जेजे को फ्री-फंड में दिमाग खपाने वाले बंदे बिना मांगे मिल रहे हैं तो वो उन्हें कौन सी दिक्कत है| एक सधी-सधाई स्ट्रेटेजी के तहत जेजे नए मुर्गे तलाशता है और सबसे पहला चुग्गा फेंकता है ‘मोस्ट व्यूड ब्लोगर ऑफ द वीक’ का| सिर्फ २-३ पोस्ट लिखकर ही एक चीकना पात इस खिताब पा लेता है (एक-बार से ज्यादा चुने हुए अपवाद हैं)| अब जब आदमी इस तथाकथित महान खिताब को पा लेता है तो मानवीय गुणों के वशीभूत होकर वह खुद को एक महान लेखक समझ बैठता है हो फिर कम से कम पच्चीस लेख तो इसी गलतफहमी में आकर लिख बैठता है| फिर उसकी नजर पड़ती है ज्यादा पठित, ज्यादा चर्चित और अधिमूल्यित कैटेगरी पर, बस फिर वो महान लेखक इस कैटेगरी में घुसने की होड में उसी प्रकार की हरकतें करने लगता है जैसे कि एक भुट्टा भूने जाते समय भडभड़ाता है|

 

अंगारचंद का तो सुझाव है कि जैसे ही कोई नया ब्लॉगर जेजे पर ज्वाइन करता है उसे शाही जी की रचना ‘टॉप ब्लॉगर’ इंस्ट्रक्शन मैनुअल के तौर पर पढ़ने को देनी चाहिये जिससे कि वो बकरा न बन पाए| वरना नया-२ ब्लॉगर अपनी तरफ से तो बड़ी सफाई से काम करता है पर उसे ये एहसास नहीं होता कि यहाँ पर एक से बढ़के एक खुर्रांट ब्लॉगराचार्य उसकी सारी हरकतों पर नजर रखे हुए हैं| अंगारचंद ने बहुत कोशिश की कि वह भी अपनी छाती पर कुछ तमगे लटकाकर टॉप पे लटक जाय पर तमाम कोशिशों के बावजूद ३५-४० रचनाओं पर भी कुल मिलाकर इतने तमगे नहीं लटक पाया जितने कि कुछ महान लेखक एक ही रचना पर खुद ही टाँक लेते है|

 

वैसे ये प्रतिक्रियाओं का खेल है बड़ा मजेदार| कोई एक करे तो आप उसका जवाब तीन किश्तों में भी दे सकते हो| इस प्रकार आपको वास्तविक कमेन्ट तो एक मिलता है पर कम्प्यूटर गिनता है चार, और खुदान्खास्ता कोई पंगे बाज कमेन्ट कर दे तो तुम भी उसके उंगली करते रहो और दो के चार, चार के आठ,……करते रहो और बल्ले-२ करते रहो….

 

वैसे कभी-२ अपवाद भी हो जाते हैं, अर्थात कोई रचना ही ऐसी महान होती है जिन पर लेखक को खुद कमेन्ट करने की जरूरत ही नहीं होती बल्कि लोग खुद ही ताबडतोड कमेन्ट कर देते हैं| पिछले वर्ष एक महान (?) रचना जो कि बाबा रामदेव पर लिखी गई थी, पर लेखक को इतनी गालियां पड़ीं कि उन्हें अपना एक भी कमेन्ट करने की जरूरत ही नहीं हुई और वो रचना साल की सर्वाधिक चर्चित, पठित और टॉप रचनाओं में थी| इस महान उपलब्धि का पैमाना क्या था, और वो कौन सी किताब के टोटके थे, अंगारचंद आज तक समझ नहीं पाया|

 

खैर, ये सब तो चलता ही रहेगा| कोई आये या जाए, रहे न रहे, दुनिया रुकती नहीं, चलती ही रहती है, और यही इस जिंदगी का फलसफा है| इसलिए अंगारचंद का सन्देश तो यही है कि आप अपना काम करते रहो, आप लिखते रहो, आप दाने बिखेरते रहो ताकि कल कबूतरों को शिकायत न रहे| वैसे तो अंगारचंद खुद को इस काबिल नहीं समझता कि शाही जी को सलाह दे सके पर फिर भी निवेदन करना चाहता है कि आप जैसे लेखकों से इस मंच की रौनक है, आपके बहुत से मुरीद भी यहाँ पर हैं, इसलिए आप जनहित में फैसला लें, व्यक्तिगत तौर पर नहीं|

 

अंगारचंद जेजे को भी सलाह देना चाहता है कि नए लेखकों को प्रोत्साहित करने के साथ-२ अपने उन पुराने, सम्मानित और सार्थक लेखन के माध्यम से इस मंच की गरिमा को बढाने वाले लेखकों के सम्मान का भी ध्यान रखें और उन्हें इस मंच से पलायन करने से रोकने के लिए यथोचित कदम उठायें| कृपया लेखों का मूल्यांकन किसी भी कैटेगरी में गुणवत्ता के आधार पर करें न कि सिर्फ नए लेखकों को चुग्गा डालने के लिए| साथ ही प्रतिक्रियाओं पर भी नजर रखें जिससे कि मंच की गरिमा बनी रहे|

 

चलते-२ चार लाइनें आदतन पेश हैं-

 

‘तेरी बेरूखी का सबब पता है लेकिन,

महफ़िल से जाने की इजाजत नहीं है,

कितनी भी उंगली कर ले कोई,

यूं खफा हो जाना तेरी आदत नहीं है’

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
March 3, 2012

राजेन्द्र जी नमस्कार,. जे जे मंच पर मेरा घुसना अचानक ही हुआ था. लगा कि यहाँ अच्छे अच्छे लेख पढने को मिलेंगे और कुछ अपनी सुनाने का मौका भी मिलेगा.लेकिन और जगहों की तरह यहाँ भी घमासान देख कर बड़ी तकलीफ पहुंची.आप के लेख पहले भी पढ़े थे लेकिन प्रतिक्रिया देने के लिए मैं खुद को अल्पग्य समझती थी.मेरी लिमिट ज़रा इमोशनल है.. लेकिन हर मित्र से यही बात सुन कर लगता है कि मामला गंभीर है. अगला लेख लिखने कि हिम्मत नही हो रही….या यूँ कहूँ कि मन नही हो रहा..

    minujha के द्वारा
    March 4, 2012

    राजेन्द्र जी नमस्कार मैं भी सरिता जी की बात से सहमत हुं कि आप जैसे वरिष्ठ लेखकों के लेखों पर टिप्पणी करने में हमें ये महसुस होता रहा कि कोई ऐसी बात ना लिख दे जो उस विषय पर हमारे कम ज्ञान को प्रदर्शित कर दे,या उचित ना लगे,हम मंच पर नए है और हमें आप सबके उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है कृप्या हमें हमारी गल्तियों से अवगत कराएं और सही दिशा दिखाएं बस हम नए लोगों की यही अपेक्षा है,आदर सहित आभार

    March 4, 2012

    सिनेसरा जी नमस्कार, मुझे आश्चर्य हो रहा है कि आपको इस मंच पर अच्छे लेख पढने को नहीं मिले और वो भी ऐसे समय में जब कि आप खुद इस हफ्ते की बेस्ट ब्लॉगर चुनी गई हैं| इस मंच पर हर हफ्ते एक बेस्ट ब्लॉगर चुना जाता है, इसके अलावा दो टॉप ब्लॉग्स, दस सर्वाधिक् चर्चित, दस सर्वाधिक पठित, दस अधिमूल्यित और कितने ही अच्छे-२ लेखों से ये मंच हमेशा भरा पडा रहता है| यहाँ कोई घमासान नहीं मचा है बल्कि एक सार्थक मुद्दे पर बहस हो रही है| यदि आप इससे परिचित या सहमत नहीं हैं तो आपको इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए और सिर्फ अच्छे लेख पढ़ने और लिखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए| इस मंच को आपसे बहुत सी श्रेष्ठ रचनाओं की उम्मीद है| आपको हार्दिक शुभकामनाएं और धन्यवाद|

    March 4, 2012

    मीनू जी नमस्कार, दुनिया में कोई भी मनुष्य सर्वश्रेष्ठ या सर्वज्ञाता नहीं है| बहुत सी बातें और विषय ऐसे हैं जिनका हमें भी ज्ञान नहीं है तो इसमें संकोच कैसा| कम ज्ञान होना और गलत बात कहना दोनों में फर्क है| हर कोई कभी न कभी इस मंच पर नया ही था |कभी कहीं आपको सलाह देने की जरूरत महसूस हुई तो अवश्य सलाह देंगे और कहीं आपसे कुछ सीखने को मिलेगा तो उसे भी सीखने की कोशिश जरूर करेंगे| यह प्रक्रिया तो म्युचुअल होती है| इस मंच पर बहुत से प्रबुद्ध श्रेणी के लेखक लिखते है जिनसे कि हमें भी बहुत कुछ सीखने को मिला है| आपको शुभकानाएं एवं धन्यवाद|

Anant srivastava के द्वारा
March 3, 2012

अपनी बात को आपने जितने स्वाभाविक रूप से रक्खा है उसकी तारीफ़ में कुछ कहना सूरज को दीप दिखाने जैसा होगा . एक दम से ना काहू से दोस्ती और ना काहू से बैर जैसा लेख लिखा है . बाक़ी जाने वाले के लिए दुःख तो होता ही है . अब जो बचे है भगवान उनको सुमति दें यही प्रार्थना है . नेकी कर और दरिया में दाल ….

    March 4, 2012

    अनंत जी मुझे तो विश्वास है कि कोई भी इस मंच को छोड़कर नहीं जा रहा है, हाँ कुछ समय का अवकाश जरूर हो सकता है| आपने सही लिखा है कि ……एक दम से ना काहू से दोस्ती और ना काहू से बैर ….मैं इसी सिद्धांत पर चलने की कोशिश करता हूँ पर सच्चे लोगों के प्रति मेरा पक्ष हमेशा ही रहेगा| ईश्वर सबको सुबुद्धि दे| धन्यवाद|

sadhana thakur के द्वारा
March 3, 2012

सम्मानीय सर ,क्या कहूं ,बस हतप्रभ हूँ …………….सर आपको इतना ही कहूँगी .बहुत -बहुत धन्यवाद् ………..

    March 4, 2012

    साधना जी आपका भी बहुत-२ धन्यवाद कि आप भी इस विषय पर हम सबसे सहमत है|

mparveen के द्वारा
March 2, 2012

राजेंदर जी नमस्कार, आप सभी से अनुरोध है की युहीं अपना बड़ापन दिखाते हुए हमारा मार्गदर्शन करते रहें ….. आप सभी के बिना मंच सूना है …. :( धन्यवाद..

    March 3, 2012

    परवीन जी यह अत्यंत हर्ष की बात है कि इतने सारे लोग बिना आपस में मिले भी इस मंच में माध्यम से वैचारिक रूप से जुड गए हैं| यह तो आप सभी का बड़प्पन है कि आप दूसरों का उचित सम्मान करते हैं और उनकी अहमियत महसूस करते हैं| हम सभी को लगता है कि शाही जी जैसे ब्लॉगर का इस मंच पर बने रहना कितना जरूरी है| धन्यवाद|

Sumit के द्वारा
March 2, 2012

अंगार जी पूर्ण आग्रह है की वो लिखना न बंद करे….बहुत ही सुंदर और अच्छा लेख

    March 3, 2012

    सुमित जी मुझे पूरा यकीन है कि आपके विचार शाही जी तक अवश्य पहुँच रहे होंगे और वे इसका सकारात्मक जवाब देंगे| धन्यवाद|

ashvinikumar के द्वारा
March 2, 2012

बहुत ही खेद का विषय है और यह कोई नया प्रचलन अथवा त्रुटि नही है जे0 जे की यह पुरानी परिपाटी है कभी कभी तो हैरानी भी होती है यूं मै भड़ास निकालने टाइप का व्यक्ति हूँ भाई कोई उंगली करेगा तो लट्ठ ही नही सब कुछ ले कर चढ़ दौढ़ता हूँ ,,लेकिन एक कहावत है न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा , बिना विवाद कोई काम न होगा ,,तो भाई जे0 जे0 की यही नीति है अनेकों प्रकरण से आप विदित होंगे विवाद मैं मजा लेने के बाद ही जे जे ने अपना पक्ष /निर्णय रखा (वैसे मै बहुत संयम बरत रहा जो कि मेरे आदत मे शुमार नही है ) तो भाई जय भारत (वैसे ये मालापानी कौन है जागरण पर बहुत दिनो बाद आगमन हुआ है इसलिए जिज्ञाशा हो रही है ?

    March 3, 2012

    अश्वनी जी इस विषय पर सबके मत लगभग एक जैसे ही हैं यानी कि सभी कहीं न कहीं अपनी उपेक्षा महसूस कर रहे हैं| मुझे तो यह भी महसूस होता है कि बहुत से पुराने ब्लॉगर इसी वजह से या तो इस मंच से दूर हो गए हैं या उनकी सक्रियता यहाँ पर काफी कम हो गई है| चूंकि मैं स्वयं भी यहाँ पर बहुत कम सक्रिय हूँ इस लिए बहुत से नए लोग मेरे लिए भी अपरिचित हैं| विवादों से दूर रहने की कोशिशें जारी हैं पर फिर भी कभी-२ ऐसी बातों पर नजर पड ही तो चुप भी रहा नहीं जाता| जय भारत|

Santosh Kumar के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय राजेन्द्र जी ,.सादर नमस्कार यह मामला वाकई बहुत दुखद है ,..जे जे का रवैय्या तो शुरू से ही ऐसा है ..आत्मसंतुष्टि के लिए लिखने वालों का स्वाभिमान आहत होना स्वाभाविक है ,.और बड़े मंच पर विचारों का कुछ टकराव भी स्वाभाविक है .. मैं भी आपके निवेदन में अपने हाथ जोड़ता हूँ की श्रद्धेय शाही जी जनहित में फैसला लें ..उनसे इस मंच की रौनक है और हम जैसे बच्चे उनके अनमोल आशीर्वाद और प्रबुद्ध विचारों से वंचित न हों …सादर आभार सहित

    March 3, 2012

    संतोष जी नमस्कार, आपका कहना दुरुस्त है कि एक अवैतनिक लेखक की अपेक्षा ही यही होती है कि जो उसने लिखा है उसका उचित विश्लेषण और सम्मान हो, इससे उसे आत्मसंतुष्टि मिलती है| लेखक का स्वाभिमान आहत होना तब स्वाभाविक ही होता है जब कि कम स्तर की रचना को उससे ऊंचे स्तर पर रखा जाय| पर जैसा कि आपने लिखा है, ये मंच अब काफी विस्तृत हो चुका है और ऐसे में कई बार एक बेहतर रचनाएं उचित स्थान न मिलने के कारण बिना पाठकों की नजर में आये गुम भी हो जाती हैं| ऐसे में एक लेखक की मेहनत व्यर्थ चली जाती है| मुझे पूरा विशवास है कि शाही जी की यह सब देख पढ़ रहे होंगे और आपकी-हमारी भावनाओं को भी समझ रहे होंगे| इस होली पर उनसे एक शानदार रचना की अपेक्षा भी है|

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 2, 2012

कब से प्रतीक्षा थी कि आप भी इस मसले पर कुछ कहें। आपने नीर-क्षीर का अलगाव बहुत ही बेहतरीन ढंग से कर दिखाया है। जे जे द्वारा अपने हितों को साधना और ब्लॉगरों के सम्मान की उपेक्षा करना निरंतर होता जा रहा है। इन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं कि क्या सही है और क्या ग़लत। इनके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने व्यवसायिक हित साधना ही परम उद्देश्य है। आदरणीय शाही जी जैसे विनोदी स्वभाव के व्यक्ति द्वारा उठाया गया क़दम स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि जे जे की दृष्टि में निःस्वार्थ ब्लॉगिंग करने वालों की क्या छवि है। इनकी महानता तो देखिये कि लेख के माध्यम से व्यथा व्यक्त करने के बावजूद इन्होने व्यक्तिगत रूप से अपना रटारटाया स्पष्टीकरण शाही जी को मेल कर दिया। यदि उन्होंने आकाश जी की पोस्ट स्वयं इसे नहीं डाला होता तो हम सब इससे कभी वाकिफ़ नहीं हो पाते। बेहयाई का इससे अच्छा नमूना मैंने कभी नहीं देखा। साफ़ है कि इन्हें अपना अनमोल समय दे कर ब्लॉगिंग में योगदान करने वाले ब्लॉगरों के सम्मान और भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। इनके इस रवैये को तानाशाही की संज्ञा देने में कोई गुरेज़ नहीं। आपने जिस साफ़गोई से अपने विचारों को प्रस्तुत किया है उसके लिए आप बधाई के पात्र है। आपकी स्पष्टवादिता को नमन है।

    March 3, 2012

    वाहिद भाई आपने बिलकुल सही कहा कि जे जे के लिए अपने व्यवसायिक हित साधना ही परम उद्देश्य है। पर यह स्वाभाविक ही है क्योंकि जेजे एक व्यासायिक ग्रुप का पोर्टल है| उन्हें तो अपनी साईट पर ज्यादा से ज्यादा एक्सेस और हिट्स की संभावनाएं बढानी ही हैं| पर हाँ इस जेजे के मंच पर ऐसा माहौल जरूर विकसित हो गया है जहां कि निस्वार्थ और सकारात्मक लेखन करने वालों की भावनाएं आहत हो रही हैं| नए लोगों को चुग्गा डालने का फायदा ये है कि वे जल्दी बकरे बन जाते हैं और पुराने ब्लौगरों से ज्यादा मंच पर नजर आने लगते हैं| पर साथ ही इस मंच का एक इनडाइरेक्टली सकारात्मक पहलू भी रहा है कि हमें बहुत से अच्छे लेखकों से भी परिचित होने का अवसर मिला है| एक आपसी सौहार्द्रपूर्ण माहौल का दायरा भी बना है, भले ही वो हमने खुद ही बनाया है पर माध्यम तो यही मंच बना| पर हाँ, शाही जी जैसे विनोदी स्वभाव के व्यक्ति के इस कदर आहत हो जाने के पीछे निश्चित है कि कहीं न कहीं उनकी भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है वर्ना वे यूं अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त न करते| हमें अब इस बात को समझ जाना चाहिए कि जेजे की भी अपनी मजबूरियाँ हैं कि उनको को इन सब बातों के लिए फुर्सत नहीं है, यह सब हमें स्वयं ही टैकल करना पड़ेगा, अगर इस मंच पर मौजूदगी बनाए रखनी है तो| वरना जै राम जी की|

shrikant के द्वारा
March 2, 2012

साही जी को एक बार मैं भी पढ़ चुका हूँ . तो क्या वे यहाँ से छोड़ कर चले गए ? लेकिन ऐसा लगता नहीं है की जागरण किसी अच्छे लेखक को भगा देगा . जरूर उनहोंने कोई छेड़छाड़ की होगी . बढ़ती उम्र में लोग सठिया भी जाते हैं कभी-कभी .अंगार जी आप भी कोई कम बढ़िया नहीं लिख रहे हैं . आसा है की आगे उस महान लेखक की परम्परा को जीवित रखने में आप और उनके दुसरे मीटर गन अपना अमूल्य सहयोग देते रहेंगे ताकी उनकी आत्मा तृप्त और शांत रहेगी . जय हिंद .

    ashvinikumar के द्वारा
    March 2, 2012

    श्रीकांत जी ,,नमस्कार ,, मै हालांकि आपके कमेन्ट पर कुछ कहना नही चाह रहा था परंतु आपकी मधुर भाषा के मोहपाश में बाध कर मजबूर होकर मुझे दो चार शब्द लेखने पड़े ,,प्रथम यह की प्रतिक्रिया देते समय एक बार आप स्वयं अपनी प्रतिक्रिया को अगर पढ़ लें तो यह आपकी प्रतिक्रिया में चार चाँद लगा देगा फुंदके तो कई टाँक रखें हैं आपने अपनी प्रतिक्रिया में वैसे आपके शब्द आपको तथा आपके व्यक्तित्व को पूर्णतः वक्त कर रहें हैं ,,,अपने आप को प्रकट करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार …………..जय भारत (जुबली जी आपके हक में /अमानत में ख़यानत कर रहा हूँ )

    March 3, 2012

    श्रीकांत जी, सर्वप्रथम तो आपको स्पष्ट कर दूं कि न तो कोई यहाँ से छोड़ कर गया है और न ही किसी ने किसी को भगाया है| मुझे नहीं पता कि आपने ये सठियाने वाली बात मजाक में कही है या जानबूझकर, पर यहाँ पर ऐसी बात कहना आपको शोभा नहीं देता| इस मंच पर बहुत से लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और स्वयं भी इसकी अपेक्षा रखते हैं| आपके इस शब्दों को और भी बहुत से लोग पढ़ रहे होंगे और मुझे पूरी उम्मीद है कि वे आपको सम्मान की दृष्टि से नहीं देख रहे होंगे|

    shrikant के द्वारा
    March 3, 2012

    आदरणीय अंगार जी, अगर भूल-चुक हो गई तो छमा कर दीजिएगा . मैं कभी-कभी पड़ने आता हूँ इस बार तो बहुत दिन बाद आया तो एक पुराने बलागर का चर्चा गर्म देखकर आप पर लिख दिया . संयोग से साही जी का जोकरई वाला कोई लेख पडा था जिसमे खूब हँसी भी थी . वही याद आया तो थोड़ा बहक गया. मेरा इरादा आपके मित्तर का अपमान नहीं है . माफी चाहूँगा . थोड़ा जानकारी चाहता था की बलाग लिखने के लिए क्या करना होता है . बता पाए तो एहसान होगा . जय हिंद .

    March 3, 2012

    अश्वनी जी आप बिलकुल भी गलत नहीं कर रहे हैं| मुझसे पहले प्रतिक्रया व्यक्त करके आपने उचित कार्य किया है| इस तरह की भाषा का विरोध तो सभी को एक स्वर में करना ही चाहिए जिससे कि आपसी वैमनस्य न फैले| धन्यवाद|

    March 4, 2012

    श्रीकांत जी, मुझे तो आपकी प्रतिक्रिया पर पहले ही संशय था तभी मैंने लिखा भी था कि कहीं आपने मजाक में तो ये बात नहीं लिखी है| अच्छा हुआ कि आपने अपनी बात स्पष्ट कर दी| पर फिर भी आपके शब्द ऐसे समय में किसी को भी उचित नहीं लग सकते| अगर आप वाकई में ब्लॉग्गिंग के प्रति गंभीर है तो श्री शाही जी के लेख आपका सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन कर सकते है, पर शायद शाही जी ने अपने ज्यादातर लेख इस पोर्टल से हटा दिए हैं| ऐसे में आप उनके एक-दो लेख मेरे ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं जिन्हें कि मैंने रिपोस्ट किया था| उनकी ये रचनाएँ आपका उचित मार्गदर्शन कर सकती हैं| धन्यवाद|

satish3840 के द्वारा
March 2, 2012

राजेन्द्र जी नमस्कार / में कोई लेखक तो नहीं न कोई साहित्य से मेरा दूर दूर का वास्ता है / परन्तु जागरण जाक्सन में क्या चल रहा हे ये आपके ब्लॉग से पता चल रहा हे / आपने सही कहा हे नेकी कर कुवें में डाल/ आपकी बात ये भी सही हे कि -”कोई आये या जाए, रहे न रहे, दुनिया रुकती नहीं, चलती ही रहती है, सही यदि मुर्गा बाग़ नहीं देगा तो क्या सुबह नहीं होगी / में जागरण में बिलकुल नया हूँ यहाँ की नीति , रीति को नहीं जानता पर में ब्लॉग को एक अभिवक्ति का माध्यम मानता हूँ , जरूरी नहीं कोई मेरी बात से सहमत हो / पर ब्लॉग में सभी को अपने अन्दर का लेखक निकाल कर लिखना चाहिए /

    March 3, 2012

    सतीश जी नमस्कार, शुक्र है कि इस मंच पर आप जैसे पाठक भी हैं वरना मैं तो समझता था कि यहाँ पर सिर्फ लेखक ही लेखक हैं| आपने बिलकुल सही कहा कि ब्लॉग अभिवक्ति का सशक्त माध्यम है और ब्लॉग में सभी को अपने अन्दर का लेखक निकाल कर लिखना चाहिए| यकीन मानिए कि इस मंच पर बहुत अच्छे लेखक उपलब्ध हैं और आपको उनकी विद्वता के दर्शन होते रहेंगे….इसलिए आप इस मंच पर लेख लिखते/पढते रहें| धन्यवाद|

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय श्री राजेन्द्र जी, ये तो कुछ भी नहीं जब हमारे दिल को ठेस पहुंची तो हमने अपने हिसाब से शिकायत की.हमें उसका फल ये मिला की कुछ आदरणीय सम्मानित ब्लागर जी को टापिक मिल गया लेख लिखने का.और वो हमारी ही बुराई कर बैठे,..इनका तो सीधा सा मतलब तो यही जान पड़ता है की जैसे राजनीति में नेता चाहे जैसा हो बस उसे ही वोट दो चाहे वो देश राज्य का जो भी करे..वैसे ही उनका यहाँ भी यही तात्पर्य था की चाहे जो भी बस लेखन करते जाओ शिकायत मत करो.भले जागरण की तरफ से अपमान हो या कोई नौसिखिया ब्लागर गाली दे.क्या कहे ऐसे लोगों के ऐसे विचारों का..मै जब इस मंच पर वापस आया तो मैंने देखा की यहाँ बहुत से ऐसे ब्लागर जुड़ गए है जो मुखौटा पहने हुए है.उनकी अपनी कोई असली पहचान नहीं जान पड़ती.लेकिन कहने को महान रचनाकार है..सच्चाई और महानता तो लेखो और प्रतिक्रिया से ही समझ में आ जाता है अगर आपको थोडा भी ज्ञान हो..मगर जो लोग हमारी बुराई करते है वो इनका कुछ नहीं करते क्यूंकि कमेन्ट का व्यवसाय जो है..मै लगभग २ साल से ब्लोगिंग में हूँ मैंने कभी कमेन्ट की लालसा में न कोई पोस्ट की न किसी को कमेन्ट किया..और ब्लागर धर्म का बाखूबी निर्वहन किया..मेरे भी एकाध पोस्ट में लोग गरजने को कोशिश किये लेकिन मैंने उन्हें गरजने नहीं दिया क्यूंकि मुझे कमेन्ट नहीं चाहिए ये तो मेरा एक पैशन है लेखन.. जैसा की मैंने अपनी जीवनी यहाँ आप सब से साझा की थी तो ये भी आपको मालुम होगा की बहुत बार बहुत लोगों ने आग्रह किया था तभी मैंने उसे सही समय पर पोस्ट किया था..मै अपनी सफाई तो नहीं दूंगा क्यूंकि मेरे ब्लॉग पर जिनके भी कमेन्ट है वो शायद मुझे अच्छे से समझते होंगे यही मेरा पुरस्कार है…क्या खुद पर होने वाले जुल्म को सहना महानता है..अगर ऐसा कोई कहता है तो आज के समय में वो धूर्त है… बहुत ज्यादा लिख चूका हूँ. बस इतना कहूँगा इधर तीन या चार दिनों के पोस्ट को जब आप खंगाल कर देखेंगे तो शायद आप खुद हथ्प्रध रह जायेंगे… धन्यवाद आकाश तिवारी

    March 3, 2012

    आकाश जी, चूंकि यह मंच सार्वजनिक है इसलिए किसी पर अपने विचार थोपना तो संभव नहीं है पर विचार प्रकट करने में कोई बुराई नहीं है| मैं पहले भी कहता आया हूँ कि ये प्रतिक्रियाओं का निरर्थक खेल सिर्फ आपसी विवाद को ही जन्म देता है, इससे कुछ भी सकारात्मक नहीं मिलता| ये ठीक उसी प्रकार है जैसे कि दो मूंगफली बेचने वाले पूरे दिन आपस में ही एक-दुसरे को मूंगफली बेचते रहे और शाम तक कमाई कुछ नहीं की| मेरा विचार है कि या तो लेख पर प्रतिक्रियाएं पब्लिश ही न हों या फिर जेजे उनकी स्क्रूटनी की जिम्मेदारी ले| प्रिंट मीडिया में …यानी कि अखबारों या पत्रिकाओं में प्रतिक्रियाओं की या तो गुंजाइश ही नहीं होती या चुनी हुई प्रतिक्रियाओं को ही प्रकाशित किया जाता है| सीधे-२ लेख पर मनमाफिक प्रतिक्रया दे सकने और व्यक्तिगत आक्षेप करने की ये सुविधा कई बार कलह और विवाद को बढाने का काम करती है| पर ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं…..हो सकता है कि बहुत से लोगों को इस प्रतिक्रियाओं के खेल में मजा भी आता हो| जैसी स्थिति आपने बताई है, मैं स्वयं कई बार इसका सामना कर चूका हूँ| फिर भी मैं कहता हूँ कि जब आपमें लिखने का पैशन है तब आप लिखते रहें, कोई क्या कहता है इसकी परवाह न करें| धन्यवाद|

yogi sarswat के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय , राजेंद्र जी नमस्कार ! मुझे नहीं मालुम की श्री शाही जी क्यों व्यथित हैं , लेकिन आपका ब्लॉग पढने पर लगा की शायद उनके सम्मान को कहीं ठेस पहुंची है ? मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूँ की अगर ऐसा हुआ भी है तो श्री शाही जी को इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि वो जब लिखते हैं तो उनके चाहने वाले उन्हें ढूढ़ ढूंढ कर भी पढ़ ही लेते हैं ! वो बहुत अच्छा लिखते हैं और अगर वो ये मंच छोड़ते हैं तो निश्चित रूप से इस मंच को कमी खलेगी ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/23

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 2, 2012

    योगी जी, घायल की गति घायल जाने … जिसपर पड़ती है वो ही जान सकता है..जागरण ने जो किया वो तो अलग बात है मगर आजकल जो हो रहा है वो बहुत पीडादायक है..मैंने कभी लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं की थी..बात किसी के पढने की और न पढने की तो बिलकुल नहीं है बात तो बहुत पुरानी है..बस वक्त वक्त पर कुरेदा जाता है जख्मों को…… ये मेरा व्यक्तिगत विचार है. आकाश तिवारी

    March 3, 2012

    आदरणीय , योगी जी नमस्कार, जहां तक मेरा विचार है, जो भी लेखक गंभीरता पूर्वक सार्थक लेखन करते हैं, वे अपने लेखों के सम्मान की अपेक्षा भी रखते हैं| सम्मान से तात्पर्य सिर्फ पुरस्कार आदि से नहीं है बल्कि उसका उचित विश्लेषण व मूल्यांकन लेखक को आत्मसंतुष्टि देता है| इसके अतिरिक्त यदि लेखक से कमतर व्यक्ति को वह सम्मान मिलता तब उसकी आत्मा का आहत होना स्वाभाविक ही होता है| इसी लिए कई साहित्यकार सिर्फ धन या पुरस्कार के लिए समझौता नहीं करते बल्कि उचित सम्मान न मिलने पर पुरस्कारों को ठुकरा भी देते हैं| इस मंच पर ऐसा कोई धन या पुरस्कार तो ठुकराने के लिए नहीं है पर कई काबिल लेखक उचित सम्मान न मिलने की वजह से धीरे-२ मंच से दूर हो गए हैं या उनकी इस मंच पर उपस्थिति बहुत कम हो गई है| आपकी ही तरह मेरा भी मानना है कि श्री शाही जी को इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि आपको और हमें पता है कि वे कितने उच्च श्रेणी के लेखक हैं और जब लिखते हैं तो उनके चाहने वाले उन्हें ढूढ़ ढूंढ कर भी पढ़ ही लेते हैं ! सच है कि अगर वो ये मंच छोड़ते हैं तो निश्चित रूप से इस मंच को कमी खलेगी ! धन्यवाद|

    March 3, 2012

    आकाश जी, हर आने वाला नया दिन कुछ न कुछ नया ही सिखाता है| यहाँ इस मंच पर जो भी मिला है उसमें काफी कुछ सकारात्मक भी रहा है| जब भी हमें किसी सामाजिक कार्य के लिए आगे आना है तो अपने कष्टों को कहीं छुपा लेना ही पड़ेगा| इस लेखन को भी मैं एक सामाजिक कर्तव्य ही समझता हूँ | भावनाएं हैं तो आहत भी होंगी, पर ये जीवन का हिस्सा है और आजीवन चलता ही रहेगा….

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 2, 2012

राजेंद्र जी नमस्कार…….. इस ब्लॉग पर मैं नया हूँ. लिखना तो दूर की बात है,मुझे तो प्रतिक्रिया देनी भी नहीं आती. पर मुझे ऐसा लगा है कि कुछ यहाँ चल रहा है.यह कहानी क्या है, यह भी नहीं जनता और न ही जानना चाहता हूँ. लेकिन कई ऐसे ब्लॉग पढ़े तो ऐसा लगा जैसे यहाँ कोई धर्म-युद्ध छिड़ा हुआ है. जो की अनावश्यक है. मेरे जीवन का तो एक ही फलसफा है ‘ प्रेम बंटते चलो…………………………… धन्यवाद्……

    March 3, 2012

    अजय जी नमस्कार, यदि आप इस मंच पर नए हैं तो सर्वप्रथम तो आपका स्वागत है| आपकी प्रतिक्रया से ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता कि आपको लिखना नहीं आता| रही बात किसी धर्म-युद्ध की तो ऐसा कुछ खास नहीं है, जहां इतने सारे लोग और वो भी सारे के सारे बुद्धिजीवी होंगे तो कुछ न कुछ वैचारिक माय्भेद या द्वंद्व तो छिड़ा ही रहेगा| लेकिन इसमें कुछ ज्यादा गंभीर नहीं है| जैसे-२ इस मंच पर आपका संपर्क और दायरा बढ़ेगा, आप धीरे-२ सब समझ जायेंगे| आपके फलसफे …. प्रेम बंटते चलो….का मैं भी समर्थक हूँ| धन्यवाद|


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