अंगार

My thoughts may be like 'अंगार'

84 Posts

1247 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3502 postid : 1089

कमबख्त केंचुए

Posted On: 14 Mar, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कम पढ़ा-लिखा होने के नाते मुझे ज्यादा तो नहीं पता पर सुना है कि अंग्रेजी में स्पाइनलेस कोई बड़ी गाली होती है| एक डरपोक नागरिक होने के नाते मैं कोई गाली तो नहीं दे सकता पर स्पाइनलेस की जगह मैं केंचुए शब्द इस्तेमाल करूँगा क्योंकि केंचुओं की भी स्पाइन नहीं होती|

 

समझ नहीं आता कि कहाँ से शुरू करूं| आज अन्गारचंद की आड नहीं लूँगा| चलिए रेल बजट से ही शुरू करता हूँ| आज रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने सदन में रेल बजट पेश किया| इतने सालों से से वही घिसे-पिटे और राजनैतिक लोलुपता से भरे बजट देखते-देखते सोच इस कदर सेचुरेट हो गई थी कि ऐसे बजट की उम्मीद ही नहीं की थी| पहली बार लगा कि कोई आदमी जिसकी शैक्षिक योग्यता एम बी ए है तो वो इसके काबिल है, वरना कितने ही कहने को पढ़े लिखे लोगों को गधे की तरह आचरण करते देखा है| लेकिन दिन भर रेल बजट की चर्चा तारीफ़ के बजाय धीरे-२ शाम तक दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटाने तक पहुँच गई है| फ्री फंड के सरकारी वाहनों का उपयोग और मुफ्त की यात्राएं करने वाले केंचुए रेल किराया बढ़ने पर यूं हल्ला मचा रहे हैं कि मानो सबसे ज्यादा नुक्सान इन्हीं को हुआ हो| पेट्रोल के दाम प्रतिवर्ष कितने भी गुना चाहे क्यों न बढे हों, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा, पर रेल के किराए दस साल बाद मात्र कुछ पैसे बढ़ गए तो इन केंचुओं के पेट में दर्द होने लगा| पक्ष के हों या विपक्ष के हों, किसी केंचुए में इतनी हिम्मत नहीं है कि दिनेश त्रिवेदी के साथ खड़ा हो सके|

 

इस देश का दुर्भाग्य ही है कि पश्चिम बंगाल में एक बिगडैल किस्म की ऐसी स्त्री मुख्यमंत्री बन गई है जो हमेशा से ही सरकार के पिलर हिलाने का ही काम करती रही है और स्थायित्व के एवज में रेल-मंत्री का पद लेती रही है| इस स्त्री को देश के नाम पर पश्चिम बंगाल ही नजर आता है और रेल-मंत्री के पद पर रहते हुए इसने उसी देश की ही हमेशा बात की है, बाकी देश गया भाड में| सच कहता हूँ कि अगर मेरे बस में होता तो सदन में हवाई चप्पल पहन कर देश की जनता को बेवकूफ बनाने वालों को सदन में घुसने ही न देता| ऐसा ही कुछ सौदा सरकार बिहार के रेल मंत्रियों से भी करती रही है ताकि उसके पिलर हिलते न रहें| ये बात और है कि इन भाड़े के रेल मंत्रियों ने न तो बिहार का ही भला किया, न ही पश्चिम बंगाल का और न ही देश का| रेल मंत्री कोटा पद बन गया लेकिन केंचुओं के बस में कभी कुछ भी नहीं रहा| ये इस देश का दुर्भाग्य ही है कि चंद सीटें जीतने वाले कुछ घोंघे केंचुओं को हमेशा साध लेते हैं| ऐसा ही एक घोंघा आजकल इस देश की विमानन सेवा को संभाल रहा है और केंचुए हमेशा की तरह आज भी मजबूर हैं|

 

ये बात समझ में नहीं आई कि मंत्री सरकार का प्रतिनिधि होता है या किसी पार्टी का| मेरे विचार से तो दिनेश त्रिवेदी मनमोहन सरकार का रेल मंत्री है और उसके सभी कार्यों के प्रति सरकार जवाबदेह होनी चाहिए लेकिन हो क्या रहा है, रेल मंत्री पश्चिम बंगाल से नियंत्रित हो रहा है, बल्कि नियंत्रित भी नहीं हो पा रहा है| प्रधानमंत्री अपने रेल मंत्री के प्रति जवाब देह नहीं है? अब सुना है कि दिनेश त्रिवेदी को हटाने के लिए तिनके ने केंचुए को धमकी दी है|

 

सिक्ख शब्द सुनते की मुझे गुरु गोविन्द सिंह जी का नाम ध्यान में आता है जिन्होंने सिखों को आत्मसम्मान और अस्त्र-शस्त्र चलाना सिखाया। सिखों  को अपने धर्म, जन्मभूमि और स्वयं अपनी रक्षा करने के लिए संकल्पबद्ध किया और उन्हें मानवता का पाठ पढाया। उनका नारा था- ‘सत् श्री अकाल’- सत्य ही ईश्वर है’। लेकिन जो अपने धर्म, जन्मभूमि और स्वयं अपनी रक्षा करने के लिए संकल्पबद्ध न हो, जो ‘सत् श्री अकाल’का मतलब ही न जानता हो, जो विदेशियों का गुलाम हो गया हो वो सिक्ख कैसा| जो केंचुआ हो वो सिक्ख कैसा|

 

आजकल टी वी पर कुछ केंचुओं को बुलाकर बहस का आयोजन किया जाता है| इन केंचुओं का एकमात्र उद्देश्य होता है प्रतिद्वंद्वी पार्टी के केंचुओं को कुछ भी न बोलने देना, जैसा कि ये सदन में भी करते हैं, देश की इन्हें न तो कभी परवाह होती है न ही देशवासियों की| इन केंचुओं से भी बड़े होते हैं वो टीवी रिपोर्टर जो कि इन केंचुओं से ज्यादा बोलते हैं और एक समयबद्ध सीमा के अंदर हमेशा अपनी ही टांग सबसे ऊपर रखते हैं| बहस का निष्कर्ष क्या होता है ये कभी पता नहीं चल पाता लेकिन इस बहस के विजेता हमेशा ही रवीश या अभिज्ञान ही होते हैं|

 

बरसात में कच्ची जमीन से असंख्य केंचुए निकलकर रेंगने लगते है तो लगता है कि मानो केंचुए इस धरती पर राज कर लेंगे| लेकिन बढ़ती गर्मी के साथ-२ केंचुए जमीन में घुसने लगते हैं या धूप से सूख जाते हैं| लगता है कि केंचुए समाप्त हो गए, लेकिन फिर बरसात आती है और फिर केंचुए निकलकर धरती पर रेंगने लगते हैं| ये क्रम यूं ही चलता आया है और लगता है यूं ही चलता रहेगा| क्या वाकई यूं ही चलता रहेगा? क्या इस घर में हमेशा पांच सौ बावन केंचुए रहेंगे या किसी केंचुए की स्पाइन निकलेगी और ये मिथक टूटेगा?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

20 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Tufail A. Siddequi के द्वारा
March 18, 2012

राजेंद्र जी सादर अभिवादन, बहुत ही सुन्दर और विचारणीय लेख. बहुत-२ बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    March 18, 2012

    सिद्दीकी जी आपको लेख अच्छा लगा इसके लिय आपका बहुत-२ धन्यवाद|

jlsingh के द्वारा
March 17, 2012

आदरणीय राजेंद्र जी, सादर अभिवादन! आपने सधे शब्दों में सभी केंचुए की अच्छी खबर ली है! हमारे देश का दुर्भाग्य ही है की इतने बड़े देश की सरकार की चाभी किसी क्षेत्रीय नेता के हाथ में रहती है! दमदार लेख के लिए आपको बधाई और अभिनन्दन !

    March 18, 2012

    आदरणीय सिंह साहब, सादर अभिवादन! वाकई ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि दो-चार सांसद वाले छोटे-२ दल भी सरकार को चलने देने के लिए ब्लैकमेल करते हैं और एवज में मंत्री पद झटक लेते हैं| अजीत सिंह इसकी एक बानगी हैं| आपका धन्यवाद|

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 16, 2012

सादर प्रणाम, बिलकुल उपयुक्त विषय पर लेखनी चलाई है आपने। देशहित में सोचने और करने वालों के लिए राजनीति में क्या स्थान है ये हमें मालूम हो गया है। रेलवे के सुधार हेतु अपेक्षित क़दम उठाने के प्रयास में दिनेश त्रिवेदी को अपने पद से ही हाथ धोना पड़ गया है। ईमान से कहूँ तो रेल बजट के पहले मैंने कभी दिनेश त्रिवेदी की सूरत भी नहीं देखी थी और अपने बजट में उन्होंने जिस तरह से रेलवे के उन्नयन का ख़ाका पेश किया है वो निश्चय ही सराहनीय हैं मगर इस क़दम ने उन्हें त्यागपत्र देने पर भी विवश कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम से राजनीति का कुत्सित चेहरा एक बार फिर से उजागर हो गया है। हालाँकि कि रेलवे को बेहतर बनाने के लिए प्रायोजन का प्रयोजन भी किया जाना चाहिए था। कोई आईडिया एक्सप्रेस, टाटा दूरंतो इत्यादि ट्रेनें चला कर रेल बजट का आवश्यक हिस्सा प्राप्त किया जा सकता था मगर ये बिना रीढ़ के जंतु कोई बदलाव नहीं होने देना चाहते क्यूंकि उन्हें उनके वोट बैंक को क्षति पहुँचती दिख रही है जबकि असलियत में ऐसा नहीं नहीं है। कुंठित मानसिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के कार्य अब किसी भी राजनेता के एजेंडे में नहीं हैं और जिनके में हैं उनका हाल दिनेश त्रिवेदी जैसा है। सार्थक विषय पर लेखन हेतु आपका हार्दिक आभार,

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    वाहिद भाई आपने उचित विश्लेषण किया है कि कुंठित मानसिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के कार्य अब किसी भी राजनेता के एजेंडे में नहीं हैं| दिनेश त्रिवेदी एक अपवाद मात्र है और जल्द ही उनका पत्ता साफ़ हो जाएगा| ये घटिया राजनीति की पराकाष्ठा है और कांग्रेस इस परम्परा को बढ़ावा देने के लिए दोषी है| दो पंक्तियाँ मन ही मन में रच रहा हूँ- मैं जीता हूँ इस आशा में, कल कुछ नए फूल खिलेंगे, कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलें, हम इक दिन ये हालात बदल देंगे आपका धन्यवाद|

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 16, 2012

आदरणीय राजेन्द्र जी, बहुत दिनों बाद आये और इतना आक्रोश लेकर ..वाकई में आजके वक्त में राजनीति स्तरहीन हो चुकी है..सबसे ज्यादा खीझ तो तब आती है जब बहादुर समझे जाने वाले सिख्ख की ये हालात है तो और सबकी क्या बात कहे.. बहुत ही शानदार लेख..इतना आक्रोश देखकर बहुत अच्छा लगा… बहुत अच्छा लेख. आकाश तिवारी

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    आकाश जी आपने सही कहा कि आज के वक्त में राजनीति स्तरहीन हो चुकी है और ये इसकी इन्तहा है कि छोटे-२ राजनैतिक दल भी सरकार को गाहे-बगाहे झटका देते रहते हैं और सरकार को ब्लैकमेल करते रहते है| रेल मंत्रालय एक प्रकार से सरकार बचाने की कीमत मात्र बन चुका है, जनता के हित का इससे कोई मतलब नहीं रह गया है| जनता क्या चाहती है इससे कोई मतलब नहीं, ममता क्या चाहती है, इससे मतलब है| आपका धन्यवाद|

March 16, 2012

सादर नमस्कार! केंचुए के माध्यम से आपने एक सार्थक सोच को बहुत ही अच्छे तरीके से दर्शाया है….विचारणीय. कृपया मेरी सच्ची प्रेम कहानी पर अपना बहुमूल्य सुझाव और प्रतिक्रिया देना चाहें……. http://merisada.jagranjunction.com/2012/02/15/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81-%E0%A4%B8/

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    अनिल जी नमस्कार, आपका धन्यवाद कि आपने लेख पर प्रतिक्रिया की| आपकी सच्ची प्रेम कहानी को मैं अवश्य पढूंगा…

ashok kumar dubey के द्वारा
March 15, 2012

आपने केंचुआ नाम सही रखा है और ये केंचुए जब जब चुनाव रुपी बरसात आता है ये इस देश की प्रजातंत्र को रीढ़ हिन् प्राणी बनाने का कम शुरू कर देते हैं रेल बजट पेश करने वाले रेल मंत्री त्रिवेदी का कहना है वे रेलवे एवं देश की चिंता ज्यादा करते हैं इसीलिए वे ऐसा बजट पेश किये हैं इस पर भूतपूर्व रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव की टिप्पणी भी आपने जरुर सुना होगा अपने समय में वे रेलवे को फैदे में दिखा रहे थे पर नागरिक सुरक्छा समय से रेलों को चलने की कवायद और साफ सफई का उन्होंने कितना ख्याल किया यह जग जाहिर है यह बात समझ से परे है की जो रेल २ महीने से लेकर चार महीने पहले हिन् यात्रिओं से आरक्छन के नाम पर पैसा वसूल लेती है उस धनराशी पर बैंकों से इतना ब्याज मिलता होगा जिससे रेल को चलने का खर्चा तो बखूबी निकल जाता होगा हाँ नयी रेल लाईने बिछाना सिग्नलिंग प्रक्रिया में सुधर एंटी कोलिसन डिवाईस इस तरह की आधुनिक तकनिकी सुविधा के लिए जरुर रेलवे को धन की आवश्यकता है लेकिन इतने महत्वपूर्ण मौके पर भी किसी नेता या मंत्री के जबान से यह नहीं निकला की जो देश से बहार अपना पैसा पड़ा है वह किस दिन किसके कम आएगा कांग्रेस ने कसम खायी है वह काला धन और भ्रष्टाचार के माध्यम से kamaye पैसा कभी देश में नहीं लाएगी और मिला जुलकर बिपक्छ भी यही चाहता है ऐसी घटनाएँ बताती हैं की सभी नेताओं का हिन् कला पैसा टैक्स चोरी का पैसा स्विस बैंक में जमा है और धीरे धीरे ये नेता इन पैसों को कहीं और जमा कर रहें है इसका खुलासा भी बहुत जल्द हो जायेगा , अंत में धन्यवाद एक अच्छा ब्लाग लिखने के लिए

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    अशोक जी लालू प्रसाद यादव को तो मैं एक मदारी के जमूरे से ज्यादा नहीं समझता जो कि सिर्फ जनता के मनोरंजन के लिए होता है| इस देश का दुर्भाग्य ही है कि कोई योग्यता न होते हुए भी ऐसे लोग लोकतंत्र के मंदिर में घुसने में सफल हो जाते है| रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने पूरे देश की जनता को उसी प्रकार बेवकूफ बनाने की कोशिश की जैसे कि वे अपने भोले-भाले बिहारी मतदाताओं को बनाते रहते हैं| कांग्रेस की घटिया और सत्ता के लोभ की राजनीति ने रेल मंत्रालय को कोटे का पद बना दिया है और इसका चुग्गा कभी लालू तो कभी ममता को फेंक कर वह अपनी कुर्सी का हिलता पाया थामे रहती है| एक सौ इक्कीस करोड की जनता का दुर्भाग्य है कि रेल मंत्रालय जनता के हित के लिए नहीं बल्कि सत्ता का एक हिलता पाया है| यदि ऐसा न होता तो देश की जनता के हित में रेल मंत्रालय योग्यता के आधार पर दिया जाता| आपका धन्यवाद|

yogi sarswat के द्वारा
March 15, 2012

राजेंद्र भरद्वाज जी नमस्कार ! आप की अपनी एक खास लेखन शैली है ! गंभीर विषय को भी इस तरह से मसालेदार बनाकर पेश करते हैं कि जिसे पढना भी नहीं आता होगा वो भी कोशिश करेगा कि देख तो लूं क्या लिखे है ? वाही बात इस लेख में भी है ! सच्चाई के साथ कौन चलना चाहता है ? और बड़ी बात ये कि राजनेतिक दल से ऊपर उठकर कौन सोच पाता है ? त्रिवेदी जी ने सोचा तो मुश्किल में पड़ गए , फिर कोई क्यों अपनी सीट खोना चाहेगा ? बहुत बेहतरीन लेख ! बधाई !

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    योगी जी नमस्कार ! आप को मेरी लेखन शैली पसंद आई, इसके लिए शुक्रिया| और आपका ये कहना भी सही है कि कोई भी नेता अपनी दलगत राजनीति और सोच से ऊपर उठना ही नहीं चाहता, तभी इस देश का भला नहीं हो पा रहा है|  आपका पुनः धन्यवाद|

chandanrai के द्वारा
March 15, 2012

आदरणीय , आपने हर महत्वपूर्ण बिंदु को छुआ है और उसका आंकलन किया है ! बहुत सटीक विश्लेषण और बिलकुल ठीक विचार ! बहुत बेहतर आलेख pLS COMMENT ON http://chandanrai.jagranjunction.com/बेरोजगार ,/आत्महत्या

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    चन्दन जी आपका धन्यवाद और आपके पोस्ट को मैं पहले ही पढ और कमेन्ट कर चुका हूँ|

dineshaastik के द्वारा
March 15, 2012

मैने तो इनकी तुलना कुत्ता और वेश्या से की थी, तो कुछ पाठकों ने आपत्ति दर्ज की थी कि आप कुत्तों और वेश्याओं से इनकी तुलना करके कुत्तों और वेश्याओं का अपमान कर रहें हैं। मुझे लगता था कि शायद उनकी आपत्ति उचित थी। लेकिन भाई आपने इनकी तुलना केंचुओं से बिल्कुल ही सही की है। सशक्त व्यंग की प्रस्तुति के लिये बधाई..

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    दिनेश जी मैंने तो पहले ही कहा है कि मैं एक डरपोक नागरिक हूँ इसलिए कुत्ता और वेश्या तो मैं नहीं कह सकता पर रीढ़हीन केंचुआ आसान शब्द है और इसे कोई गाली भी नहीं कहेगा…. आपका धन्यवाद|

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 15, 2012

भरद्वाज साहब नमस्कार, हमारी संबैधानिक व्यवस्था ही ऐसी है. केंचुओं का निर्माण सतत जारी रहेगा…..

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    March 17, 2012

    अजय जी नमस्कार, दिनेश त्रिवेदी का विद्रोही बजट और अपने रूख पर अड़े रहना इस व्यवस्था से हट कर है| इस उम्मीद के साथ कि कभी ये व्यवस्था कुछ बदलेगी….. आपका धन्यवाद|


topic of the week



latest from jagran