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लन्दन में भारतीय हॉकी की मौत

Posted On: 9 Aug, 2012 Others,sports mail में

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07 अगस्त के दिन लन्दन ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीम का मैच बेल्जियम से था|इससे पहले हालांकि भारत हॉलैंड, न्यूजीलैंड, जर्मनी, दक्षिण कोरिया से हार कर अपनी अच्छी-खासी फजीहत करवा चुका था लेकिन एक खेल-प्रेमी होने के नाते फिर भी मैंने इस मैच को भी पूरा देखा, ये सोचकर कि शायद भारत कुछ इज्जत बचा सके| लेकिन अफ़सोस कि खेल समाप्त होते-२ बेल्जियम ने भारत पर तीन गोल ठोक कर भारतीय हॉकी के ताबूत में आख़िरी कील भी ठोक दी|

 

भारत की इस शर्मनाक हार के बाद मैंने फेसबुक पर पोस्ट किया- आज लन्दन में भारतीय हॉकी की मौत हो गई| इस पर मेरे कुछ मित्रों ने अपनी प्रतिक्रया दी और हॉकी फेडरेशन, खेलों में राजनीति और भाई-भतीजावाद, पैसे एवं सुविधाओं की कमी को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया| कुछ ने क्रिकेट के प्रति ज्यादा आकर्षण को इसका कारण बताया|इनमें से कुछ बातों पर मैं भी सहमत हूँ पर सब पर नहीं|

 

ये सच है कि भारत में लोग क्रिकेट के दीवाने हैं और ये भी सच है कि भारतीय क्रिकेट में पैसा भी खूब है लेकिन ये भी सच है कि ये पैसा सरकार नहीं देती बल्कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) स्वयं ये पैसा कमाता है| और ये भी सच है कि भारत में क्रिकेट के खेल ने न केवल जबरदस्त उन्नति की है बल्कि भारतीय टीम ने एक साधारण पिछले दर्जे की टीम से लेकर विश्व क्रिकेट में नंबर एक टीम बनने तक का सफर भी तय किया है| इस बीच में भारत ने क्रिकेट में कई महत्वपूर्ण खिताब भी जीते जैसे दो-२ बार विश्व-कप, T-20 का विश्व-कप, शारजाह कप, बेन्सन हेजेज ट्रोफी आदि जैसे कितने ही खिताब भारतीय क्रिकेट टीम जीत चुकी है| हालांकि जैसी हम भारतीयों की आदत है, बीच-२ में हम भारतीय टीम के खराब प्रदर्शन पर गरियाते भी रहते हैं लेकिन ये भी सच है कि चाहे जो भी कारण हो पर भारतीय क्रिकेट टीम भारत में अन्य खेलों की अपेक्षा कहीं ज्यादा बेहतर प्रदर्शन तो कर ही रही है|  जहां एक ओर लन्दन ओलम्पिक में एक के बाद एक निराशाजनक प्रदर्शन होते रहे, वहीं दूसरी ओर भारतीय क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को न केवल वन-डे सीरीज में 4-1 से बुरी तरह पटखनी दी बल्कि T-20 में भी ठोका| फुटबॉल का शौक़ीन होने के कारण मैं क्रिकेट का दीवाना तो नहीं पर जो सच है तो है|

 

अब रही बात खेल संघों में राजनीति और भाई-भतीजावाद की तो ये घटियापन तो अपने यहाँ है ही| सबसे पहले तो तमाम खेल संघों में ऐसे-२ नेता घुसे हुए हैं जिनके बाप ने भी कभी कोई खेल नहीं खेला होगा| ये तो वही बात हुई कि बाप ने न मारी मेंढकी और बेटा तीरंदाज| इसके अलावा कुछ खिलाड़ी भी यहाँ ऐसे हैं जो जरा सी सफलता मिलते ही अपनी औकात भूल जाते है और अपने को देश से भी बड़ा समझने लगते हैं| इसका हालिया उदाहरण है महेश भूपति| ओलम्पिक में लिएंडर पेस के साथ न खेलने को लेकर इसने जो ड्रामा किया उससे साफ़ दिखता है कि इसके लिए अपना अहम और स्वार्थ ज्यादा बड़ा है और देश-भावना गई भाड़ में| ये उल्लेखनीय है कि ओलम्पिक खेल जाने ही देश-भावना के लिए जाते हैं और यही कारण है कि यहाँ कई अनजान खिलाड़ी अपने जीवन का बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं क्योंकि वे अपने लिए नहीं देश के लिए खेलते हैं जबकि कई नामी खिलाड़ी हार भी जाते हैं| यही कारण है कि रोजर फेडरर जैसा महान खिलाड़ी भी अभी तक ओलम्पिक में स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया है, इससे ओलम्पिक पदक के महत्त्व का पता चलता है|अगर महेश भूपति ने ये सब ड्रामा न किया होता तो शायद भारत को टेनिस में एक पदक मिलना काफी हद तक संभव हो सकता था| लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात तो ये थी कि बजाय इसके कि भारतीय टेनिस संघ भूपति और बोपन्ना पर कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही करता, भारतीय टेनिस संघ ने इनके आगे झुक गया और इनकी मर्जी से ही टीम बनाई गई| यानी कि खिलाड़ी खेल संघ और देश से भी बड़े हो गए| धिक्कार है ऐसे घटिया खेल प्रशासकों को|

 

ऐसी ही एक और खिलाड़ी है सानिया मिर्जा जिस के आगे भारतीय टेनिस संघ नतमस्तक है| सर्वप्रथम तो सानिया मिर्जा जो अब पाकिस्तान की नागरिक हो चुकी है, किस हैसियत से भारत की ओर से खेल रही है समझ से बाहर है| क्यों किसी गधे को ये बात समझ में नहीं आती| इस देश की संस्कृति के हिसाब से इटली की सोनिया गांधी राजीव गांधी से विवाह कर इस देश की नागरिक हो गई तो इसी तरह से सानिया मिर्जा भी क्या अब पाकिस्तानी नहीं हो गई है? अगर सानिया मिर्जा भारत भारत की ओर से खेल सकती है तो इसके पति शोएब मालिक को भी क्यों भारतीय क्रिकेट टीम में नहीं ले लेते| हद और घटियापन की बात तो ये रही कि भारतीय टेनिस संघ ने सानिया मिर्जा की माँ को भी टीम प्रबंधन का हिस्सा बनाकर टीम के साथ लन्दन ओलम्पिक में भेज दिया| समझ में नहीं आता कि सानिया मिर्जा ने इन खेल-प्रशासकों को और देश के करता-धर्ताओं को क्या सुंघा दिया है|

 

जो हाल कभी राज्यवर्धन राठौर का हुआ था वही अब विजय कुमार का भी हो रहा है| राठौर को भी ओलम्पिक मैडल मिलने से पहले शायद ही कोई जानता था लेकिन मैडल मिलने के बाद मिले सम्मान से इसको इतना अहम हो गया था कि ये अपनी औकात ही भूल गया था और यही कारण रहा कि इस बार टीम में इसकी जगह ही नहीं बनी| ऐसा ही अहम अब विजय कुमार को भी होने लगा है| मैडल जीतने के तुरंत बाद इसने लन्दन से ही सेना में उचित सम्मान न मिलने का राग अलापना शुरू कर दिया जबकि सेना की वजह से ही इसको शूटिंग जैसे महंगे खेल को खेलने का अवसर मिल पाया वरना आम आदमी के बस में इतना महंगा खेल खेलना नहीं है| यही नहीं सेना में एक साधारण जवान भर्ती हुए विजय कुमार को मात्र आठ साल में सूबेदार बना दिया गया जबकि एक साधारण सिपाही सामान्य प्रक्रिया में बीस साल बाद सूबेदार बनता है| अब ये बन्दा आई. ए. एस. के बराबर की पोस्ट चाहता है, और शायद इसे मिल भी जाय| 

 

जहां तक बात है पैसे और सुविधाओं की तो जहां तक इतिहास बताता है, दुनिया के महानतम खिलाड़ियों ने गरीबी और असुविधाओं के संघर्ष से ही जन्म लिया हैं| आज अमेरिका खेलों में मजबूत विश्व-शक्ति है तो उन अश्वेत खिलाड़ियों के कारण जिन्होंने कई पीढ़ियों तक गुलामी और दासता का जीवन जिया है| अगर सिर्फ पैसे और सुविधाओं से ही महान खिलाड़ी बनते तो सारे अमीरों के बच्चे महान खिलाड़ी बनते| लेकिन इतिहास बताता है कि गरीबी और अभाव से ही महान खिलाड़ियों ने जन्म लिया है, फिर चाहे वो पेले हो, मैराडोना हो, टाइगर वुड्स हो, मुहम्मद अली या माइक टायसन हो| और जो सफलता के बाद अपनी औकात भूल जाते हैं, जल्दी ही उनका पतन भी हो जाता है| 

 

अंत में चलते-२ एक चौंकाने वाला तथ्य जो अभी हाल ही में सामने आया है| कई वर्षों से हम पढते सुनते आये हैं कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है, यहाँ तक कि भारत सरकार की अधिकारिक वेबसाइट पर भी हॉकी को राष्ट्रीय खेल बताया गया और उसकी उपलब्धियों का ब्यौरा भी दिया गया है। किन्तु सूचना के अधिकार कानून के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में खेल मंत्रालय ने हैरान करने वाला जवाब दिया है। मंत्रालय ने कहा है कि सरकार ने किसी भी खेल को राष्ट्रीय खेल का दर्जा नहीं दिया है। लखनऊ की 10 वर्षीय ऐश्वर्य पाराशर ने प्रधानमंत्री कार्यालय को आरटीआई के तहत राष्ट्रगान, राष्ट्रीयगीत, राष्ट्रीयखेल, राष्ट्रीयपक्षी, राष्ट्रीयपशु, राष्ट्रीयफूल और प्रतीक की घोषणा के आदेशों की प्रति मांगी थी। पीएमओ से यह सवाल गृह मंत्रालय को भेजे गए, जिसने राष्ट्रीय खेल का मसला खेल मंत्रालय को भेजा। खेल मंत्रालय के अवर सचिव शिवप्रताप सिंह तोमर ने ऐश्वर्य को जवाब में लिखा कि सरकार ने किसी खेल को राष्ट्रीय खेल का दर्जा नहीं दिया है।

पुरानी कहावत है कि डूबते जहाज को चूहे सबसे पहले छोड़ देते हैं| 

 

“मेरा भारत महान”

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
August 13, 2012

अगर सिर्फ पैसे और सुविधाओं से ही महान खिलाड़ी बनते तो सारे अमीरों के बच्चे महान खिलाड़ी बनते| लेकिन इतिहास बताता है कि गरीबी और अभाव से ही महान खिलाड़ियों ने जन्म लिया है, फिर चाहे वो पेले हो, मैराडोना हो, टाइगर वुड्स हो, मुहम्मद अली या माइक टायसन हो| और जो सफलता के बाद अपनी औकात भूल जाते हैं, जल्दी ही उनका पतन भी हो जाता है| बहुत सही सोच के साथ आपने अपना लेखन दिया है ! सटीक एवं सार्थक

kapil_cosmos के द्वारा
August 11, 2012

राजेंद्र जी Namaskar, बहुत ही उम्दा विश्लेषण किया है अपने. मैं भी भारत के ओलंपिक अभियान पर एक ब्लॉग लिखना चाहता था, लेकिन लगता है अपने वो सब लिख दिया जो मेरे दिल में था. हलाकि लेखनी से मजबूर हूँ तो शायद इस विषय पर कुछ लिख ही दूंगा, लेकिन फिर कहना चाहूँगा की अपने मेरा मन का लगभग ९० प्रतिशत लिख दिया है. हलाकि ये सच है की हमारे देश में क्रिकेट के बराबर किसी और खेल को तवज्जो नहीं दी जाती लेकिन इन घटिया प्रदर्शनों पर आप किस हौसला अफजाई की उम्मीद लगा सकते है? जहा तक होसला देने की बात है तो मुझे लगता है भारत के खिलाडियों को तो काफी समर्थन था, न केवल देश में टीवी के माध्यम से बल्कि लन्दन में भी, इसके विपरीत क्या उन अफ्रीकन और छोटे छोटे द्वीपों जैसे देशो को कोनसा समर्थन और कितनी सुविधी मिलती होंगी जिन्होंने अपनी उपस्थिति मेडल टेली में स्वर्ण पदको से कराइ है?

rekhafbd के द्वारा
August 10, 2012

राजेन्द्र जी ,खेल संघों में राजनीति और भाई-भतीजावाद के घटियापन के कारण खेलों का स्तर गिर रहाहै | सबसे पहले तो तमाम खेल संघों में ऐसे-२ नेता घुसे हुए हैं जिनके बाप ने भी कभी कोई खेल नहीं खेला होगा| बिलकुल सही लिखा है आपने ,बढ़िया आलेख ,बधाई


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