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आरक्षण से देश का भला नहीं होगा

Posted On: 7 Sep, 2012 Others में

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आरक्षण व्यवस्था को लेकर देश में जो असंतोष और भेद-भाव व्याप्त है उसके लिए न केवल राजनीति और नेता बल्कि स्वयं दलित भी बराबर के जिम्मेदार हैं| यदि समय के साथ-२ ये आरक्षण व्यवस्था समाप्त हो गई होती तो शायद दलितों और सवर्णों के बीच कोई भेद कर पाना भी संभव नहीं हो पाता| जहां तक मेरा व्यक्तिगत अनुभव है एवं मेरा जो सामाजिक दायरा है, उसमें कोई भी किसी की जात नहीं पूछता और न ही कोई भेद-भाव रखता है| बहुत से दलित जो शिक्षित हो गए हैं एवं आर्थिक रूप से भी संपन्न हो गए हैं, स्वयं नहीं चाहते कि उनकी अलग से पहचान हो या किसी को पता चले कि वे दलित हैं|  एक आम आदमी इस बात की पहचान करने के लिए कि कौन एस सी/एस टी या ओबीसी है, जातियों की कोई लिस्ट लेकर नहीं घूमता, लेकिन आरक्षण के चलते आसानी से उसे दलितों की पहचान हो जाती है|


दलितों में भी दो प्रकार के वर्ग हैं| एक वर्ग में वे दलित है जो अब अपनी शैक्षिक योग्यता के आधार पर सामान्य वर्ग के बराबर ही सफलता प्राप्त कर रहे हैं| इन्हें न तो अब आरक्षण की आवश्यकता महसूस होती है और न ही वे अपनी दलित वर्ग की पहचान को सामने लाना चाहते हैं| इस प्रकार के दलित अपनी नौकरी एवं अपने कार्य के प्रति इमानदार भी हैं| वहीं दूसरी और दलितों का ऐसा वर्ग भी है जो सिर्फ आरक्षण के आधार पर ही नौकरी या प्रमोशन पाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है| इस प्रकार के लोग न तो अपने कार्य के प्रति इमानदार हैं और न ही वे अपना स्तर सुधारना चाहते है|


आरक्षण को लेकर दलील दी जाती है कि हजारों वर्षों तक दलितों के साथ अन्याय हुआ है| अब कोई ये भी बताये कि उन हजारो वर्ष पुराने अन्याय की सजा आज उन सवर्णों को क्यों मिले जिन्होंने कोई अन्याय नहीं किया है| दादा-पडदादा के किये की सजा कोई क्यों भुगते? ये तो वही बात हुई कि तूने मुझे कई साल पहले गाली दी थी, तूने नहीं दी तो तेरे दादा ने दी होगी, दादा ने भी नहीं तो पडदादा ने दी होगी पर दी जरूर होगी|


मैं यकीन से कह सकता हूँ कि यदि आज ये आरक्षण व्यवस्था समाप्त हो जाय तो समाज से न केवल ये वर्ग भेद की विसंगति दूर हो जायगी बल्कि लोग अपने कार्य में मेहनत कर सफलता प्राप्त करने की और प्रेरित होंगे और देश सामाजिक-आर्थिक आधार पर सुदृढ़ भी होगा| जो समय बीत गया वो बीत गया, अब ऐसा नहीं है बल्कि ऐसा माहौल बनाया जा रहा है| देश को सामाजिक रूप से सुदृढ़ बनाना है तो देश की जनता को आर्थिक आधार पर संरक्षण दिया जाय न की जाति के आधार पर और शिक्षित किया जाय| अनिश्चित काल तक चलने वाले इस आरक्षण रूपी पट्टे से न तो देश का भला होगा और न ही जनता का|


अभी हाल ही में चीन की खेलों में बढ़ती हैसियत के ऊपर एक विश्लेषण पढ़ा था| चीन के लोगों ने अपनी मेहनत से न केवल देश की आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया बल्कि इस आर्थिक सुदृढिकरण के कारण वहां चीनियों की ब्रीड में भी सुधार हुआ है| जो चीन कभी छोटे कद के लोगों की वजह से पहचाना जाता था, वहां अब लम्बे कद के हृष्ट-पुष्ट लोग पैदा हो रहे हैं जो अपनी मेहनत से सफलता प्राप्त कर रहे हैं और अमेरिका जैसी महाशक्ति को चुनौती दे रहे हैं| वहीं दूसरी और हमारा देश इस आधुनिक जमाने में भी आरक्षण जैसी सड़ी-गली व्यवस्था को विकसित करने में मेहनत कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप कमजोर और कामचोर किस्म की ब्रीड विकसित हो रही है और देश पतन की और अग्रसर हो रहा है|


मानव जाति प्रकृति का एक हिस्सा है और प्रकृति के लिए डार्विन की थ्योरी – Survival  of fittest” एक सार्वभौमिक सत्य है| …..और यकीन मानिए कि आरक्षण से कभी भी कोई fittest नहीं हो सकता बल्कि अंततः उसका पतन हो जायगा|

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yogi sarswat के द्वारा
September 10, 2012

मैं यकीन से कह सकता हूँ कि यदि आज ये आरक्षण व्यवस्था समाप्त हो जाय तो समाज से न केवल ये वर्ग भेद की विसंगति दूर हो जायगी बल्कि लोग अपने कार्य में मेहनत कर सफलता प्राप्त करने की और प्रेरित होंगे और देश सामाजिक-आर्थिक आधार पर सुदृढ़ भी होगा| जो समय बीत गया वो बीत गया, अब ऐसा नहीं है बल्कि ऐसा माहौल बनाया जा रहा है| देश को सामाजिक रूप से सुदृढ़ बनाना है तो देश की जनता को आर्थिक आधार पर संरक्षण दिया जाय न की जाति के आधार पर और शिक्षित किया जाय| अनिश्चित काल तक चलने वाले इस आरक्षण रूपी पट्टे से न तो देश का भला होगा और न ही जनता का|सही कहा आपने , ये सिर्फ समाज को बांटने का एक तरीका है ! प्रभावित करता हुआ लेखन !

rajanbheem1 के द्वारा
September 10, 2012

दलितों का सवर्णों से विवाह करवाने का मतलब यह नहीं है की दलितों की ब्रीड अच्छी हो जाएगी…इसका तात्पर्य यह है की इस प्रकार जातिवाद ख़त्म हो जायेगा जो की आरक्षण का मूल कारण है|अगर सभी लोग जातियां तोड़ कर एक जाती की दूसरी जाती में विवाह करेंगे तभी तोह यह जातिवाद ख़त्म होगा|जातिवाद ख़त्म होगा तभी तो आरक्षण समाप्त होगा| महोदय कृपया आप अपने आस पास के दलितों के अलावा पूरे समाज के दलितों की स्तिथि का ज्ञान करें तब आप कुछ कहे| आप कह रहे हैं की आरक्षण को समाप्त कर दें तो वर्ग भेद की विसंगति स्वतः समाप्त हो जाएगी,पहले आप वर्ग भेद की विसंगति को समाप्त करने का सार्थक प्रयास करे आरक्षण व्यवस्था ही स्वतः समाप्त हो जाएगी| आप में तो सत्य स्वीकारने की हिम्मत तो है हे नहीं|अतः हमारा बौद्धिक स्तर आंकने से पहले आप अपने गिरेबान में झांकें एवं आप अपने बौद्धिक स्तर का उत्थान करें| आरक्षण को लेकर देश में जो असंतोष व्याप्त है उसके लिए आप केवल दलितों को ही उत्तरदाई क्यों ठहरा रहे हैं?

rajanbheem1 के द्वारा
September 10, 2012

आरक्षण से देश का भला नहीं होगा तोह क्या जातिवाद से भला हो जायेगा दलितों पे ऊँगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झाँक के देखो……..आज जो देश में आरक्षण की स्तिथि पैदा हुई है वो सब आप ही के कु:कर्मो का नतीजा है……दादा पडदादा ने जो कु:कर्म किये हैं उसका हर्जाना तोह भरना ही पड़ेगा…आरक्षण कोई भीख या खैरात नहीं है बल्कि यह तो हर्जाना है आपके के कु:कर्मो का रही बात इमानदारी की अगर आप या आप के पूर्वज ही इतने इमानदार होते तो आज देश में आरक्षण की स्तिथि ही पैदा नहीं होती.अगर आरक्षण को ख़त्म करना है तो पहले जातिवाद को ख़त्म करो..पता नहीं क्यों इन सबको जातिवाद दिखाई ही नहीं देता…या यह सब कूप मंडूक हैं. जातिवाद ख़त्म करने की हैसियत है ही नहीं या ख़त्म ही नहीं करना चाहते और दोष दे रहे हैं दलितों को…… अपनी बहु बेटियों का ब्याह दलित समाज के लडको से और उनकी लडकियों से अपने लडको का ब्याह करवा दो… ब्रीड भी अच्छी होगी जातिवाद भी ख़त्म हो जायेगा….जातिवाद ख़त्म हो जायेगा तो आरक्षण भी अपने आप ख़त्म हो जायेगा…. आरक्षण का जनक ही जातिवाद है….जातिवाद के जनक आप जैसे संकीर्ण मानसिकता वाले ढोंगी लोग….

    September 10, 2012

    सर्वप्रथम तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि यह लेख मैंने अपने आस-पास के उन दलितों के विचारों के आधार पर लिखा है जो कि पढ़-लिख कर अच्छी पोजीशन पर आ चुके हैं और नहीं चाहते कि उनके लिए दलित शब्द का विशेष तौर पर संबोधन किया जाय|  दूसरे यह कि विश्व में शायद हमारा देश एकमात्र होगा जहां कि लोग अपने को विकसित बताने में हिचक महसूस करते है बल्कि अपने को पिछड़ा साबित कर कोई न कोई लाभ प्राप्त कर लेना चाहते हैं| यही कारण है कि अब कई अन्य जातियां भी अच्छी स्थिति में होने के बावजूद अपने लिए आरक्षण व्यवस्था चाहती हैं|  आपकी कुंठा और आपके विचारों से बिलकुल स्पष्ट है कि कई वर्षों से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था के बावजूद स्थिति जस की तस है| आरक्षण से शायद आपका आर्थिक विकास हो गया हो पर आपका बौद्धिक स्तर वहीं का वहीं है वरना आप लेख के मूल भावों को सही प्रकार से समझ पाते| अगर मैं भी आपकी ही भाषा में बात करूं तो जैसा कि आपने लिखा है कि…… दादा पडदादा ने जो कु:कर्म किये हैं उसका हर्जाना तोह भरना ही पड़ेगा………यदि आपके जैसी ही सोच समाज की अन्य जातियों में भी बनी रहे तो आप सोच सकते हैं कि स्थिति क्या होगी| हमारे देश के राजनीतिज्ञों में सोच के अभाव के चलते ही आज आरक्षण समर्थक और विरोधी आपस में लड़ रहे हैं और नेता अपना उल्लू साध रहे हैं| लेकिन इस सब के बावजूद भी समाज का एक बड़ा तबका दलितों को अपने बीच में जगह देता है और इसकी वजह है उनका बौद्धिक स्तर विकसित हो जाना, न कि आरक्षण|  आपका कहना है कि दलितों के विवाह सवर्णों के साथ हो जाने से दलितों की ब्रीड सुधर जायगी तो आप स्वयं ही इस बात का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि दलितों की ब्रीड कैसी है| अगर आपने लेख ध्यान से पढ़ा होता तो देखते कि मैंने मेहनत और परिश्रम से ब्रीड में सुधार की बात कही थी न कि किसी जाति विशेष में रिश्ते बनाकर|  कृपया पुनः लेख को पढ़ें और समझें| इसीलिए मैं पुनः कहता हूँ कि दलितों को आरक्षण की नहीं बल्कि अच्छी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे कि उनका बौद्धिक विकास हो| धन्यवाद|

drbhupendra के द्वारा
September 7, 2012

श्री राजेन्द्र जी मैं आप की उस बात से बिलकुल असहमत हूँ की जो दलित आज आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो गए है वो अब कोटे की चाह नहीं रखते अगर उनमे इतना त्याग आ गया होता तो कब तक देश में वास्तविक गरीबो को उसका लाभ मिला होता.. दूसरी बात आपने कही की की ब्रीड सुधार की , उसके लिए हमारी सरकार की हम दो हमारे दो की निति जिम्मेवार है ,उस निति को पढ़े लिखे लोग तो मानते है , पर अनपढ़ चाहे जिस जाति के हो और धर्म विशेष के लोग मानने से इनकार कर जाते है , जिसके कारण कूड़ा करकट टाइप के जींस समाज में बढ़ रहे है , सबसे ज्यादा घाटा उन शादियों से हो रहा है जिसमे एक ही परिवार के लोगो के बिच शादी करा दी जा रही है … क्योकि इससे reccesive genes को भी domonant में बदलने का मौका मिल रहा है अतः ब्रीड सुधार करना है तो ऐसी शादियों को धर्म सीमाओं को तोड़कर रोक लगवानी पड़ेगी… मैंने भी इसी विषय पर लेख लिखा है आपको लेख पर आमंत्रित करता हूँ ,बस निवेदन है की पूरा लेख पढ़ने के बाद ही आप उसमे क्या सुधार किये जा सकते है उस पर अपनी राय जाहिर करे … http://drbhupendra.jagranjunction.com/2012/09/05/%E0%A4%90%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/#comment-326

pitamberthakwani के द्वारा
September 7, 2012

होना ही चाहीये इनका पतन इसी योग्य हैं ये दलित

    rajanbheem1 के द्वारा
    September 10, 2012

    आपकी इस टिपण्णी से ही ज्ञात होता है की आप का समाज में जातिवाद के प्रति कैसा रविया है एवं आपका बौद्धिक स्तर कैसा है|पतन के सच्चे हकदार तो आप हैं महाशय|

pitamberthakwani के द्वारा
September 7, 2012

अपना भला हो देश के भले की किसे चिता है?,श्री भारद्वाज जी,आप भोले हैं!!


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