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भगत सिंह पैदा हों पर...

Posted On: 26 Sep, 2012 Others में

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दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त

मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी


शहीदे आजम भगत सिंह का जन्म २८ सितंबर, १९०७ में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में १३ अप्रैल, १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। उस समय भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे| लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन । इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है

सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं.


भगत सिंह मूलतः मार्क्स समाजवाद के सिद्धांतो से प्रभावित थे. इस कारण से उन्हें अंग्रेजों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी. ऐसी नीतियों के पारित होने के खिलाफ़ विरोध प्रकट करने लिए क्रांतिकारियों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची.


भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा ना हो तथा अंग्रेजो तक उनकी आवाज़ पहुंचे.निर्धारित योजना के अनुसार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंक दिया. वे चाहते तो भाग सकते थे पर भगत सिंह की सोच थी की गिरफ्तार होकर वे अपना सन्देश बेहतर ढंग से दुनिया के सामने रख पाएंगे.


करीब २ साल जेल प्रवास के दौरान भगत सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े रहे और लेखन व अध्ययन भी जारी रखा. इसी दौरान उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’| फांसी पर जाने से पहले तक भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हडताल की.


२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई. फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे –


दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त

मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी .


फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में भगत सिह ने लिखा था –


उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है

हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है

दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,

चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें

सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें.


इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है. शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए. चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर उन्होने कसम खाई कि उनका जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा, और उन्होंने ऐसा किया भी|


भगत सिंह ने कहा था कि मैं अगर फाँसी चढ़ा तो आने वाली नस्लों में मातायें दुआ किया करेंगी कि उनकी कोख से भगत सिंह जैसा बेटा पैदा हों| लेकिन अफ़सोस कि ऐसा हुआ नहीं| बरसों पुरानी शहादत अब कहावत बन कर रह गई है, हर आदमी चाहता है कि भगत सिंह पैदा हों पर अपने घर नहीं, पडोसी के यहां|


भगत मैं तुम्हें सिर्फ नमन ही कर सकता हूँ|

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 5, 2012

भारद्वाज जी नमस्कार ,बहुत ही अच्छे आलेख के लिये आभार ,घर फूंक तमाशा तो कोई कोई देखता है , अपने घर को फूको तो जाने ,,,

    October 5, 2012

    अनुराग जी नमस्कार, आपने सही कहा …ढोल दूर के ही सुहावने होते हैं, कान के पास बजें तो दिक्कत होती है…

manoranjanthakur के द्वारा
September 29, 2012

आपको पहलीबार पढ़ रहा हु राजेंद्र जी अब श्री योगी भाई ने जिस अंदाज में आपकी तारीफ की है मेरे पास कुछ बचा ही नहीं …….. सिर्फ इतना की भगत सिंह पर आपकी रचना निसंदेह सुपर डुपर है .. बधाई

    September 29, 2012

    मनोरंजन जी भगत सिंह जैसे महान शहीद पर लिखकर मैं धन्यवाद लेने के काबिल नहीं हूँ| धन्यवाद तो इन शहीदों को देना चाहिए कि इन्होने अपनी जवानी देश पर कुर्बान कर दी वरना आज ये भी नेहरू-गांधी परिवार की तरह सत्ता का मजा लूट रहे होते या फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बनकर सरकारी सुविधाओं का लाभ पा रहे होते|  रही बात पहली बार पढ़ने की तो आपका तो पता नहीं पर मैं कई बार आपको पढ़ चुका हूँ, हाँ ये बात और है कि अब मैं जेजे पर ज्यादा सक्रिय नहीं हूँ और कमेन्ट करने से बचता हूँ| पर हाँ इस मंच पर सभी पुराने ब्लॉगर्स को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ और उनमें आप भी है| धन्यवाद|

yogi sarswat के द्वारा
September 29, 2012

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें. एक महान शहीद के जन्मदिन के अवसर पर आपने सार्थक और सटीक लेख दिया है ! आज ऐसे ही वीरों की फिर जरुरत है इस हिंदुस्तान को

    September 29, 2012

    योगी जी, शहीदे आजम भगत सिंह को उनके जन्म दिवस पर याद करने के लिए आपका धन्यवाद|  सच है कि हमारे देश को आज ऐसे ही वीरों की फिर जरुरत है लेकिन ईमानदारी से यह भी विचार करने की जरूरत है कि हमने शहीदों को उनकी शहादत के बदले क्या दिया,  यहाँ तक कि अब तो उन्हें याद करने का भी किसी के पास वक्त नहीं है|

Ravinder kumar के द्वारा
September 28, 2012

राजेंद्र जी, नमस्कार. आपने बिल्कुल सही लिखा के, हर आदमी चाहता है कि भगत सिंह पैदा हों पर अपने घर नहीं, पडोसी के यहां| इतनी स्वार्थपरता हमारे समाज में कहाँ से आई पता नहीं. हम ये चाहते हैं के कोई दूसरा ही हमारे हिस्से की लड़ाई लड़ ले. हमें घर बैठे ही उत्तम व्यवस्था मिल जाए. राजेन्द्र जी, खूबसूरत लेख के लिए आपको बधाई. नमस्ते जी.

    September 29, 2012

    रविंदर जी नमस्कार, शहीदे आजम भगत सिंह को उनके जन्म दिवस पर याद करने के लिए आपका धन्यवाद|  आपने सच ही कहा कि हमारे समाज में स्वार्थपरता का समावेश हो चला है| सच में, हम चाहते हैं के कोई दूसरा ही हमारी लड़ाई लडे और हमें घर बैठे ही उत्तम व्यवस्था मिल जाए|

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
September 28, 2012

राजेन्द्र जी, एकदम सत्य लेखन है आपका आज हमारा समाज स्वार्थ से ऐसा जकड़ा हुआ है की भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ भी उठाता है और कहीं फसने पर रिश्वत देकर छूटने या अपना काम बनाने से उसे कोई गुरेज नहीं…. यहाँ दोमुहे लोग ज्यादा रहते हैं…भगत सिंह ऐसा भावुक व्यक्ति था जिसने हम सबको जगाने के लिए अपनी जान दे दी…..लेकिन आजादी के बाद हम और बदतर होते चले जा रहे हैं

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    September 29, 2012

    अनिल जी, शहीदे आजम भगत सिंह को उनके जन्म दिवस पर याद करने के लिए आपका धन्यवाद| आपने सच कहा कि आजादी के बाद हम शहीदों को भूलते चले गए| प्रेम धवन ने ‘शहीद’ फिल्म के गाने में लिखा भी है- जब शहीदो की डोली उठे धूम से देशवालो तुम आंसू बहाना नही पर मनाओ जब आज़ाद भारत का दिन उस घडी तुम हमे भूल जाना नही… अफ़सोस कि ऐसा हो गया है….

santosh kumar के द्वारा
September 27, 2012

आदरणीय भाई जी ,..सादर नमस्ते बहुत सही लिखा आपने ,..अफ़सोस कि ऐसा हुआ नहीं| बरसों पुरानी शहादत अब कहावत बन कर रह गई है, हर आदमी चाहता है कि भगत सिंह पैदा हों पर अपने घर नहीं, पडोसी के यहां|……बहुत आभार

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    September 29, 2012

    संतोष जी सादर नमस्कार, शहीदे आजम भगत सिंह को उनके जन्म दिवस पर याद करने के लिए आपका धन्यवाद| अत्यंत अफसोस की बात है कि नेहरु-गांधियों के जन्म-मरण दिवस सबको जबरन याद करवाए जाते हैं पर भगत सिंह जैसे शहीदों के जन्म और शहादत को लोग भूलते जा रहे हैं| बस कभी-कभार कुछ उत्साही लोग फेसबुक जैसी नेट्वर्किंग साइट्स पर उनके फोटो पोस्ट कर याद दिलाने की कोशिश करते हैं| लेकिन क्या यह पर्याप्त है?


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