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जब कारवां चलता है तो ........

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टीवी चैनल आज तक पर ‘एजेंडा आजतक’ कार्यक्रम में अरविन्द केजरीवाल, मणिशंकर अय्यर और रविशंकर प्रसाद की बहस संभवतः देश के बहुत से लोगों ने देखी होगी| आज तक द्वारा आयोजित इस बेतुकी बहस का औचित्य मुझे तो समझ नहीं आया| अगर अरुण पुरी (आजतक) को इस बहस का आयोजन करना ही था तो कम से कम केजरीवाल को भी अपनी टीम के साथ बहस में बुलाते| एक अकेले केजरीवाल पर इतने सारे राजनेता यूं एकतरफा आक्रमण कर रहे थे जैसे कि शेर को अकेला पाकर लकडबग्घे भी घेर लेते हैं| इस महफ़िलनुमा बहस में सिर्फ और सिर्फ राजनेता थे जो साथ मिलकर अकेले अरविन्द केजरीवाल पर भौंक रहे थे| भौंक रहे शब्द का प्रयोग करने का साहस और प्रेरणा मुझे मणिशंकर अय्यर जैसे विद्वान से प्राप्त हुई जिन्होंने चर्चा के दौरान आलोचकों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब कारवां चलता है, तो कु्त्ते भौंकते ही हैं| इस पर लोगों का गुस्सा भड़कने पर उन्होंने इसे एक प्रसिद्द कहावत बताकर साहित्यिक शब्द साबित करने की भी कोशिश की|



इस बहस में मणिशंकर अय्यर और रविशंकर प्रसाद दोनों के लहजे में न केवल घमंड बल्कि बदतमीजी भी थी| ये नेता जो चुनावों के समय जनता के आगे वोट के लिए गिडगिडाते फिरते हैं, जीतने के बाद उसी जनता को अत्यंत तुच्छ समझने लगते हैं| ये इस बात को भूल जाते हैं कि ये कोई बहुत बड़े विद्वान या काबिल व्यक्ति नहीं हैं बल्कि जनता ने इन्हें अपना नुमाइंदा बनाकर सदन में भेजा है| इन्हें भ्रम हो चला है कि ये जनता के मालिक हैं जबकि ये जनता के नुमाइंदे मात्र हैं और बिना जनता के इनका वजूद कुछ भी नहीं है| अधिकांशतः नेताओं का इतिहास उठाकर देख लीजिये, किसी ज़माने में इनकी हैसियत बमुश्किल साइकिल तक हुआ करती थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद इन्होने न सिर्फ जनता के द्वारा प्रदत्त शक्तियों का दुरुपयोग किया बल्कि भ्रष्टाचार के सहारे अकूत धन भी कमाया| आज इन लोगों को यही जनता कुत्ता नजर आती है क्योंकि जनता आज केजरीवाल के साथ है|


रविशंकर प्रसाद तो बहस में इस तरह से भाग ले रहे थे कि मानों घर से लड़कर सेट पर पहुंचे हों| जिस दिन से केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस को एक जैसा बता दिया है उस दिन से भाजपा के नेताओं को केजरीवाल से एलर्जी हो गई है| रविशंकर प्रसाद केजरीवाल को बता रहे थे कि राजनीति में आकर पिटने के लिए भी तैयार रहना चाहिए और वे स्वयं भी कई वर्षों तक खूब पिट कर और मार खाकर ही राजनीति में आये हैं| मैं भी उनकी बात से सहमत हूँ कि उन सभी नेताओं को जो कि अपने कर्तव्य और जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूल गए हैं आगे भी पिटने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि जनता का कोई भरोसा नहीं है| अगर जल्द ही ये सुधर न गए तो आज तक सदन में अपने प्रतिनिधि भेजने वाली जनता को कहीं खुद ही सीधे सदन में न घुसना पड़े|


इसी बहस में जावेद अख्तर केजरीवाल से इस कदर खफा दिखे मानो केजरीवाल ने इनकी भैंस खोल ली हो| कलाकार कोटे से सदन में पहुंचे जावेद अख्तर से एक राजनेता की बू आती देखकर मुझे अत्यंत हैरानी हुई| इसी महफ़िल में अमर सिंह नामक एक पुराने सपाई भी मौजूद थे जो केवल अपने पैसे की वजह से राजनीति में थे वरना ये नेता के बाल बराबर भी नहीं हैं| इनकी पहचान मुलायम सिंह और अमिताभ बच्चन के छोटे भाई के तौर पर ही लोगों को पता है क्योंकि ये हमेशा उनको ‘बड़े भईया’ कहते थे (पहले, अब नहीं)| जावेद अख्तर से बहस के दौरान केजरीवाल ने उन्हें अमीर क्या कहा कि अमर सिंह को पता नहीं क्यों मिर्चें लग गईं कि केजरीवाल ने जावेद अख्तर को अमीर क्यों कह दिया और वे बंदरों की तरह कूदने लगे कि केजरीवाल अपने शब्द वापिस लें क्योंकि जावेद अख्तर अमीर नहीं है और उनकी पहचान बताने लगे कि वे जांनिसार अख्तर के बेटे हैं| ये बिलकुल ऐसा ही बेतुका था कि बात हो जानी लीवर की और बताया जाय जयाप्रदा की ख़ूबसूरती के बारे में| मतलब जिस बात का कोई तुक ही नहीं वो बात अमर सिंह वहां पर करने लगे| अब कोई अमर सिंह से ये पूछे कि जावेद अख्तर अगर अमीर नहीं हैं तो इतने सालों से फिल्म इंडस्ट्री में क्या घास छील रहे हैं| मैं गीतकार नीरज को गरीब मान सकता हूँ पर जावेद अख्तर को नहीं| क्योंकि जिनका ईमान उन्हें अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करने देता, वही गरीब रह जाते हैं| नीरज भी अगर पैसे और शोहरत के पीछे भागे होते तो उन्होंने फ़िल्मी गीत लिखना छोड़ न दिया होता और शायद वे भी आज जावेद अख्तर जितने ही गरीब होते| और अमर सिंह ज़रा ये बताये कि अगर जावेद अख्तर अमीर नहीं हैं तो अमीरी का पैमाना उनकी नजरों में क्या अपने जैसे अमीरों से है? अगर ऐसा है तब तो ये माना जा सकता है कि जावेद अख्तर अमर सिंह के सामने गरीब हैं|


इलेक्ट्रानिक मीडिया इस समय अपने निकृष्टतम दौर में है| कभी इस बात पर ध्यान दीजिए कि जब भी इन टीवी चैनलों के पत्रकार अन्ना हजारे से बात करते हैं तो इनका एकमात्र मकसद होता है कि अन्ना हजारे के मुंह से अरविन्द केजरीवाल के बारे में कुछ ऐसा कहलवा लें जिसे तोड़-मरोड़कर ये सुर्खी बना लें| क्यों कि चौबीस घंटे बकने के लिए कुछ न कुछ तो चाहिए ही| अगर इन्हें अन्ना हजारे से कुछ पूछना ही है तो ये उनके भविष्य के कार्यक्रम के बारे में क्यों नहीं पूछते, उनके सामाजिक कार्यों के बारे में क्यों नहीं पूछते| पिछले दिनों NDTV के एक पत्रकार ने रालेगन सिद्धि में अन्ना हजारे का एक इन्टरव्यू लिया था जिसे शायद बहुत से लोगों ने देखा होगा| लगातार कोशिश करने के बाद अंततः उन महाशय ने अन्ना हजारे के मुंह से चंद शब्द ऐसे निकलवा ही लिए जिनका बाद में NDTV ने तोड़-मरोड़कर अपने हिसाब से सुर्खी के तौर पर उपयोग किया| उस इन्टरव्यू में अन्ना हजारे ने अपना अनुमान प्रकट करते हुए कहा था कि- ‘……शायद अरविन्द को सत्ता का स्वार्थ हो सकता है’| इसके बाद NDTV ने इस बात को तोड़-मरोड़कर दो दिन तक यह खबर लगातार चलाई कि- ‘अरविन्द केजरीवाल को सत्ता का लालच – अन्ना हजारे’ |


अब रही बात अन्ना हजारे की| पुरानी कहावत है कि बुढापे में आदमी सठिया जाता है| अन्ना हजारे के साथ भी यही हो रहा है| वे अपने सठियाए हुए वक्तव्यों से अरविन्द केजरीवाल को हतोत्साहित करने पर तुले हुए हैं| इसी आजतक के मंच पर उन्होंने अत्यंत बेवकूफी भरा वक्तव्य दिया कि वे अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को वोट नहीं देंगे| उन्हें इस बात की गंभीरता का अहसास नहीं है कि उनके वक्तव्यों का मीडिया और राजनीतिक दल फायदा उठा रहे हैं और सकारात्मक दिशा की और जाता एक आन्दोलन प्रभावित हो रहा है| और यदि वे सठियाए हुए नहीं हैं और जानबूझकर ऐसे बयान दे रहे हैं तो फिर संभवतः उन्हें अरविन्द केजरीवाल की प्रसिद्धि से जलन हो रही है| जिन लोगों ने जनलोकपाल आन्दोलन देखा होगा उन्हें पता होगा कि आन्दोलन की समाप्ति के समय अन्ना हजारे ही वो शख्श थे जिन्होंने मंच से राजनीति में उतरने की घोषणा की थी| अब जब केजरीवाल बहुत आगे बढ़ गए हैं तो उन्होंने वापस गुलाटी मार ली है| अन्ना हजारे अपना वोट अरविन्द केजरीवाल को नहीं देंगे तो किस महान राजनैतिक व्यक्ति या दल को देंगे, ये उत्सुकता वाली बात हो सकती है| अन्ना अपना वोट केजरीवाल को दे न दें पर उनके बारे में अपने व्यर्थ के विचार सार्वजनिक न करें, उन्हें अपने ही भीतर रखें| अन्ना हजारे इस देश, जनता और अरविन्द केजरीवाल की पार्टी के भाग्यविधाता नहीं हैं, उन्हें इस बात को समझना चाहिए| इस देश की जनता ने जो अभूतपूर्व सम्मान अन्ना को दिया है, अन्ना को उसे सहेज कर रखना चाहिए क्योंकि अन्ना को प्रसिद्धि अचानक उठे दूध के उफान की तरह मिली है वरना जनलोकपाल आंदोलन से पहले उन्हें महाराष्ट्र के कुछ इलाकों से बाहर कोई नहीं जानता था|


अकसर मीडिया और राजनीति के लोग कहते हैं कि अरविन्द केजरीवाल फ़ासिस्ट है, घमंडी है| लेकिन मुझे लगता है कि अरविन्द कुछ जरूरत से ज्यादा विनम्र है जो आज भी अन्ना हजारे को इतनी अहमियत देता है| आज अरविन्द का वक्तव्य अखबार में पढ़ा कि वे अन्ना हजारे से पूछेंगे करेंगे कि उनसे क्या गलती हुई| मुझे इस वक्तव्य से अरविन्द की मायूसी का अहसास हुआ जो कि अन्ना हजारे की सठियाई हुई हरकतों से उपजी है| यदि मैं अपना सन्देश अरविन्द केजरीवाल तक पहुँचा सकता तो उनसे अपील करता कि अरविन्द भाई अब बहुत हो चुका अन्ना-अन्ना, अब अन्ना गुरु समान नहीं रहे क्योंकि सच्चा गुरु कभी भी सही मार्ग पर बढ़ते शिष्य की टांग नहीं खींचता| अब अन्ना गुजरी बात हुए, उन्हें पीछे छोडो और आगे बढ़ो| मीडिया और राजनैतिक दल तुम्हारी टांग खींचकर गिराने की कितनी भी कोशिशें करें, तुम हतोत्साहित मत होना| तुम भी मणिशंकर अय्यर की कोट की गई उसी कहावत को अपना राजनैतिक मूल मन्त्र बना लो कि-


“जब कारवां चलता है, तो कु्त्ते भौंकते ही हैं”


-एक “आम आदमी”

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
December 9, 2012

आदरणीय राजेंद्र भाई, सादर अभिवादन! मैंने भी और भी कांग्रेसी नेताओं को देखा है स्टार न्यूज़ की महाबहस में अरविन्द केजरीवाल के टीम के सदस्यों की खिल्ली उड़ाते या उन्हें नीचा दिखाते! मेरी भी यही मान्यता है कि अरविन्द के टीम में और भी ईमानदार और बुद्धिजीवी वर्ग जुड़े और उनका सपोर्ट करें! आज नहीं तो कल हमें परिवर्तन के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा तो आज क्यों नहीं! मीडिया वर्ग अभी तक अरविन्द का साथ दे रहा है …

    December 10, 2012

    आदरणीय सिंह साहब नमस्कार, मुझे पता है कि अन्ना हजारे की आलोचना से बहुत से लोग नाराज हो सकते है| मैं भी अन्ना हजारे का सम्मान करता हूँ लेकिन उनकी उम्र और उनके पूर्व में किये सामाजिक कार्यों की वजह से| लेकिन अब जो वे कर रहे हैं वो सही नहीं है| क्या कभी अरविन्द केजरीवाल के मुंह से अन्ना हजारे की आलोचना किसी ने सुनी है? फिर अन्ना हजारे को भी वक्तव्य देते समय इसका ख़याल रखना चाहिए और उनके आंदोलन का खुलकर साथ नहीं दे सकते तो उनकी आलोचना तो कम से कम नहीं करनी चाहिए| अरविन्द केजरीवाल बहुत ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का सामना करने में बखूबी सक्षम है किन्तु एक अन्ना की आलोचना से वे हतोत्साहित हो सकते हैं| मीडिया केजरीवाल का कुछ हद तक साथ तो दे रहा है पर उससे ज्यादा उनकी मुहीम पर उंगलियां भी उठा रहा है| मीडिया समूह भी अब राजनीतिक दलों से प्रेरित दिखते हैं| धन्यवाद|

mayankkumar के द्वारा
December 8, 2012

आपकी कलम से निकले शब्द वाकई दिल की भीतरी दीवार से जा टकराये हैं ….. !!! अगली रचना की प्रतीक्षा ….. !! सधन्यवाद !!

    December 10, 2012

    मयंक जी, आपको मेरे विचार सही लगे तो मेरा लिखना सार्थक हुआ…धन्यवाद…


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