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बलात्कार पीड़ित की पहचान छुपाएं क्यों?

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भारत सरकार ने दिल्ली सामूहिक बलात्कार पीडिता युवती की एवं उसके परिवार की पहचान गोपनीय रखने की पूरी कोशिश की| यहाँ तक की पीडिता का दाह-संस्कार भी दबे-छुपे तरीके से किया गया| हो सकता है कि पीडिता का परिवार भी शायद यही चाहता हो| लेकिन पीडिता की तस्वीरें और नाम फेसबुक जैसी सोशियल साइट्स और अखबारों के माध्यम से सार्वजनिक हो ही गए| हालांकि पीडिता की तस्वीरें और नाम सत्य हैं या नहीं, इस बारे में कहा नहीं जा सकता| यहाँ तक कि देहरादून स्थित उस संस्थान, जहां से पीडिता ने चार वर्षीय फिजियोथेरेपी का कोर्स किया है, ने भी समाचार पत्रों के माध्यम से उसकी पहचान लगभग सार्वजनिक कर ही दी है| इस संस्थान ने यह भी कहा है कि युवती की पढ़ाई हेतु ली गई फीस भी उसके घरवालों को वापस कर दी जायगी|


लेकिन सरकार या पीडिता युवती के परिवार की पहचान गोपनीय रखने की कोशिशों के पीछे कारण क्या हैं? यही न कि युवती और उसके परिवार की बदनामी होगी, लड़की की शादी में परेशानी आयेगी आदि-आदि? यानी कि हर तरफ से पीड़ित ही शर्मिंदगी या परेशानी उठाएगा, बलात्कारी नहीं| शायद बलात्कार या छेड़-छाड के अधिकतर मामलों में हमारे समाज की मानसिकता यही है| सरकार में शामिल बुद्धिजीवियों की मानसिकता भी शायद यही रही होगी| लेकिन ऐसी सोच क्यों है? बलात्कार को पीडिता के साथ हुई एक दुर्घटना मात्र की तरह क्यों नहीं समझा जाता? हैरत की बात है कि हमारे समाज में जहां विधवा विवाह स्वीकार होने लगे हैं, लोग तलाकशुदा औरत से भी शादी कर रहे हैं, तब बलात्कार पीड़ित स्त्री को अपनाने में हिचक क्यों है? जहां विधवा या तलाकशुदा महिला के पर पुरुष से संबंध स्वेच्छा से बनाए गए होते हैं वहीं दूसरी ओर बलात्कार पीड़ित के साथ तो संबंध उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन बनाए गए होते हैं?


बलात्कार या छेड़-छाड के मामलों में हमारे समाज की यही गलत अवधारणा ही इस दिनोंदिन बढ़ती समस्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है| इस गलत मानसिकता की वजह से ही बलात्कार या छेड़-छाड के अधिकाँश मामले सार्वजनिक नहीं हो पाते और दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है| यह तथ्य दीगर है कि बलात्कार और छेड़-छाड की कई घटनाएं घरों में, रिश्तेदारों, पड़ोसियों या करीबी परिचितों द्वारा होती हैं पर इसी पीड़ित की बदनामी वाली मानसिकता की वजह से इस तरह के अधिकांशतः मामले सामने नहीं आ पाते| कई मामलों में तो अपराधी पीड़ित का फोटो या वीडियो बनाकर उसे निरंतर ब्लैकमेल करता रहता है| इसका परिणाम यही होता है कि बलात्कारी या छेड़छाड़ करने वाला और निर्भय होकर लगातार पीड़ित का शोषण करता रहता है| यानी कि जिस जुर्म की सजा पहली बार में ही अपराधी को मिल जानी चाहिए, वही जुर्म बार-बार होता रहता है|


क्यों हम अपने समाज की इस मानसिकता को बदल नहीं पा रहे? क्यों पीड़ित ही समाज की नजरों में बदनाम हो? क्यों हमारा समाज अपनी मानसिकता को इस तरह नहीं बदल सकता कि पीड़ित के साथ सहानुभूति हो और दोषी को सार्वजनिक रूप से बदनाम किया जाय और उसे दंड दिया जाय|


अब जरा कल्पना कीजिये उस समाज की जहां पीड़ित और उसके घर वालों के मन से यह भय समाप्त हो जाय कि उनकी बदनामी होगी और वे निर्भय होकर सबके सामने बता सकें कि उनके साथ फलां व्यक्ति ने दुराचार किया है| यकीन मानिए, जिस दिन हमारा समाज इस कुप्रथा (मानसिकता) को सकारात्मक रूप में उलट देगा, दुराचार की घटनाओं में बहुत हद तक कमी आ जायगी| जिस दिन पीड़ित युवतियां बदनामी का भय छोड़कर अपने घर वालों और समाज के सामने निर्भय होकर यह कह सकेंगी कि फलां व्यक्ति ने उसके साथ दुराचार किया है या उसका अश्लील फोटो अथवा वीडियो बना लिया है, और समाज उस दुराचारी को सार्वजनिक रूप से बदनाम कर उसका सामाजिक बहिष्कार करेगा, न केवल उस दुराचार की पुनरावृत्ति पर रोक लगेगी बल्कि कुत्सित विचार वाले लोगों बीच यह सन्देश भी जाएगा कि जीवनभर उन्हें इस कुकृत्य के लिए शर्मिंदगी उठानी होगी|


इस दिल्ली सामूहिक बलात्कार वाले मामले को ही लें| इस केस में कैसे हर तरफ यही सन्देश प्रसारित हुआ है कि पीड़ित युवती बहादुर थी, उसके जज्बे को सबने सलाम किया और उसके घर वालों की हर तरह से मदद करने के लिए सरकार और पूरा देश सामने आया| वहीं दूसरी ओर अपराधियों पर हर कोई थू-थू कर रहा है और उन्हें नपुंसक बनाने से लेकर अंग-भंग और मौत की सजा तक की मांग कर रहा है| यहाँ तक कि सरकार और समाज के प्रत्येक वर्ग में बैठे बुद्धिजीवियों में भी अपराधियों को रासायनिक तरीके से नपुंसक बनाने पर चर्चा चल रही है| सरकार इन आरोपियों का डाटा बेस वेबसाईट पर अपलोड कर उसे सबके सामने सार्वजनिक करने की भी तैयारी कर रही है| आज ही समाचारों में पढ़ा कि आरोपी राम सिंह और मुकेश के घर वालों का उसके गाँव ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया है और वे भी अपने लड़कों की करतूत पर शर्मिंदा हैं| इस तरह तरह का नजरिया और मानसिकता सरकार और समाज बलात्कार के प्रत्येक मामले में क्यों नहीं अपनाता? सरकार इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में मान रही है, वाकई यह केस ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ है| लेकिन उन मामलों का क्या जहां छह माह या साल भर की बच्ची से बलात्कार और हत्या होती है? जहां विक्टिम इस लायक ही नहीं होता कि उसे यह महसूस भी हो सके कि उसके साथ क्या हुआ और किसने किया| क्या ऐसे मामले ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं है, बल्कि ये तो उससे भी कहीं जघन्य और वीभत्स श्रेणी के अपराध है|


तो क्या सरकार को बलात्कार का हर मामला इसी तरह से नहीं लेना चाहिए और आगे आकर समाज की इस गलत मानसिकता का तोड़ने का बीड़ा नहीं उठाना चाहिए जहां पीड़ित युवती और उसका परिवार बदनामी के भय से चुप बैठने की बजाय निडर होकर समाज के सामने आएं और अपराधी की पहचान सार्वजानिक करें| सरकार को चाहिए कि कि वो हर बलात्कार पीड़ित और उसके परिवार को इस तरह के मामले सार्वजनिक करने के लिए प्रेरित करे, पीड़ित की सुरक्षा, कानूनी सहायता और पुनर्वास की जिम्मेदारी ले| साथ ही अपराधी की पहचान सार्वजनिक कर इस तरह की सजा दे कि वह जीवन भर अपने कुकृत्य के लिए पछताता रहे|


क्या ये सोच, ये मानसिकता बदलेगी?

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    January 9, 2013

    महोदय इसके लिए आपको दोहरा धन्यवाद देना चाहता हूँ कि एक तो आपने इस लेख को इस काबिल समझा और दूसरे चर्चामंच से मुझे अवगत भी कराया, जिससे कि मैं अभी तक अनभिज्ञ था|

    January 9, 2013

    धन्यवाद सर, इसके माध्यम से यह सन्देश अधिकाधिक लोगों तक पहुंचेगा|

seemakanwal के द्वारा
January 5, 2013

या तो हम सोच बदलें या फिर तय्यार रहें की की दामिनी हमेशा इसी तरह प्रताड़ित होती रहे

    Rajendra Bhardwaj के द्वारा
    January 6, 2013

    सीमा जी, आपका कहना सही है कि अगर हमने अपनी सोच न बदली तो इस तरह की घटनाएं बढ़ती ही रहेंगी| आपका शुक्रिया…

priyankatripathidiksha के द्वारा
January 5, 2013

यह तथ्य दीगर है कि बलात्कार और छेड़-छाड की कई घटनाएं घरों में, रिश्तेदारों, पड़ोसियों या करीबी परिचितों द्वारा होती हैं पर इसी पीड़ित की बदनामी वाली मानसिकता की वजह से इस तरह के अधिकांशतः मामले सामने नहीं आ पाते| कई मामलों में तो अपराधी पीड़ित का फोटो या वीडियो बनाकर उसे निरंतर ब्लैकमेल करता रहता है| महोदय ! आपका उपरोक्त चिंतन तथ्यपरक एवं यथार्थ है । साधुवाद ! इसके साथ ही मेरा निमंत्रण भी स्वीकार करें : http://priyankatripathidiksha.jagranjunction.com/wp-admin/?c=1

    January 5, 2013

    प्रियंका जी आपका धन्यवाद| मैंने आपका लेख पढ़ा है और उसमें आपने भी लगभग यही बातें लिखी हैं| आपके इस विषय पर सार्थक प्रयास के लिए मैं भी आपको साधुवाद देता हूँ|

jlsingh के द्वारा
January 3, 2013

आदरणीय राजेंद्र जी, हार्दिक अभिनन्दन! के साथ नव वर्ष 2013 की शुभकामनायें तथा सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बनने की बधाई। अब आपके आलेख ज्यादा से ज्यादा लोग पढेंगे भी और सोचेंगे भी क्योंकि सोच ही तो बदलनी है. स्त्री पुरुष दोनों की बराबरी की मांग लगातार है . फिर बदनामी केवल औरतों (महिलाओं) की ही क्यों हो! वह भी संभ्रांत घरों की महिलाओं की … जो ‘बदनाम’ हैं वह ‘मशहूर’ हैं और जो गुमनाम हैं उन्हें ही बदनामी का डर है. हमारी मानसिकता में बदलाव जरूरी है और हर मौकों पर इन दुष्कर्मियों की अवहेलना, प्रतारणा होनी चाहिए … देखें कब तक परिवर्तन आता है और हमारा समाज इन बुराइयों के प्रति सजग हो पाता है. घटनाएँ अभी भी घाट रही है बल्कि लगता है दिल्ली वाली घटना के बाद इस तरह की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है ..वह भी कही पुलिस कर्मियों द्वारा तो कही सेना के जवानों द्वारा … कहाँ जा रहा है हमारा समाज … त्वरित सजा नहीं मिलने का ही यह परिणाम है … निश्चित ही इसके लिए हमारी न्यायिक प्रक्रिया जिम्मेवार है! आपने शशि थरूर के पहले इस बात को सबके सामने रखकर निश्चित ही एक स्वस्थ अवधारना स्थापित करने की कोशिश की है! आप बार बार बधाई के पात्र हैं!

    January 4, 2013

    आदरणीय सिंह साहब, आपकी पुनः प्रतिक्रया और समर्थन के लिए पुनः धन्यवाद| आपको भी नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ! आपने ठीक कहा कि जो ‘बदनाम’ हैं वह ‘मशहूर’ हैं और जो गुमनाम हैं उन्हें ही बदनामी का डर है| यही हमारे समाज की वह मानसिकता है जिसमें बदलाव जरूरी है| इस हालिया मामले का संज्ञान लेते हुए सरकार और क़ानून के पास कुछ बेहतर प्रतिमान स्थापित करने का मौका था लेकिन अफ़सोस कि मामला धीरे-२ ठंडा होता दिख रहा है| जिन लोगों को संसद में क़ानून बनाने का अधिकार प्राप्त है वही अब इस पर भिन्न-२ राय देने लगे हैं| देखते हैं आगे क्या होता है….

January 3, 2013

सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के स्थान पर जगह देने के लिए जागरण जंक्शन बधाई का पात्र है क्योंकि इससे मेरे विचार निश्चित ही ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगे| जब मैंने यह लेख लिखा था तब तक शशि थरूर ने जब से इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया था| लेकिन जब से शशि थरूर ने इस मुद्दे पर बयान दिया है तब से ही इस पर चर्चा छिड़ गई है और बहुत से लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं| यानी कि मुद्दे उठाने के लिए वीआईपी होना जरूरी होता है| लेकिन धन्यवाद देता हूँ जेजे को कि इस मंच पर आम आदमी के विचारों को प्रमुखता से रखने की जगह दी|

विवेक मनचन्दा के द्वारा
January 3, 2013

राजेंद्र जी, नव वर्ष 2013 की शुभकामनायें तथा सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बनने की बधाई।

    January 3, 2013

    विवेक जी आपका हार्दिक धन्यवाद| सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के स्थान पर जगह मिलने से मेरे विचार निश्चित ही कुछ ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगे… आपको भी नव वर्ष 2013 की बहुत-२ शुभकामनायें…

Santlal Karun के द्वारा
January 3, 2013

आदरणीय भारद्वाज जी, बलात्कार के विषय में आप ने नितांत आवश्यक तथ्यों को उठया है; हार्दिक आभार एवं सद्भावनाएँ आदरणीय भारद्वाज जी, बलात्कार के विषय में आप ने नितांत आवश्यक तथ्यों के उठाया है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! बेस्ट ऑफ द ब्लॉगर के लिए बधाई आदरणीय भारद्वाज जी, बलात्कार के विषय में आप ने नितांत आवश्यक तथ्यों के उठाया है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ द वीक’ के लिए बधाई ! नव वर्ष की मंगलकामनाएँ !

    January 3, 2013

    संतलाल जी आपकी पुनः प्रतिक्रया और समर्थन के लिए पुनः धन्यवाद| आपको भी नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 4, 2013

    क्षमा करें ! कुछ तकनीकी और कुछ नासमझी के कारण प्रतिक्रया की ३ आवृत्ति हो गई है |

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    January 5, 2013

    इसमें क्षमा वाली कोई बात नहीं है, ऐसा तो कभी-कभार किसी से भी हो जाता है|

yogeshkumar के द्वारा
January 3, 2013

राजेंद्र जी नववर्ष की शुभकामनाये.. आपका लेख पढ़ा .. आपने काफी उम्दा तरीके से अपनी बातें कही.. इस लेख से उन लोगों को विचार बदल सकता है जो ये मानते हैं कि बलात्कार पीडिता का नाम जाहिर नहीं करना चाहिए .. काफी हद तक आपने समझाने कि कोशिश की है कानून बनाने पर जोर देने के साथ अगर लोग मानसिकता बदलने पे जोर लगाये तो इन घटनाओं पे लगाम लगेगी…. बदनामी बलात्कारी की होनी चाहिए ना की पीडिता की.. अमेरिका में एक मेगन नाम का कानून है जिसमें उन बलात्कारियों का नाम और पूरी जानकारी वेबसाइट और अन्य माध्यमों से प्रचारित करने का प्रावधान है.. ताकि लोग उनसे बचे और उनका बहिष्कार हो.. भारत की पुरानी मानसिकता इसके उलट है जब पीडिता का नाम जाहिर होता है तो उसकी बदनामी समझी जाती है.. नाम छिपाने से इस मानसिकता को और बल मिलता है.. महिला को बलात्कार की घटना को एक बुरे हादसे की तरह लेना चाहिए…. ये सब बदलने में वक्त लगेगा … और महिलाएं ही इस तरह की मानसिकता को बदल सकती जहाँ वो अपनी वर्जनाये और अपनी शक्तियां पहचानेगी … आजकल कुछ सरकारों एक चलन सा शुरू कर दिया है कि पीडिता को या परिवार को मुआवजे के तौर कुछ रकम देने का.. ये भी अपने आप में समस्या है …जब कि पीडिता को इन्साफ और सही इलाज़ कि जरूरत है..

    January 3, 2013

    योगेश जी आपके विचार बहुत सार्थक हैं| सच में बलात्कारियों का नाम और पूरी जानकारी वेबसाइट और अन्य माध्यमों से समाज में प्रचारित करने का प्रावधान होना ही चाहिए ताकि लोग उनसे बचे और उनका बहिष्कार करें| हैरत की बात है कि इस लिव इन रिलेशनशिप और समलिंगी संबंधों के बढ़ते फैशन के बावजूद बलात्कार के मामले अभी भी छुपाये जाते हैं और सरकार और क़ानून भी इसमें सहयोग देता है|  जब युवतियां वर्षों तक लिव इन रिलेशनशिप में रहती हैं और समय-२ पर पार्टनर भी बदलती रहती हैं तब क्यों उनको बदनामी का डर नहीं लगता? जब पूनम पांडे और शर्लिन चोपड़ा जैसी युवतियां पैसे और शोहरत के लिए निर्वस्त्र होने को तैयार है तब क्यों उनको बदनामी का डर नहीं लगता? जब सारी अभिनेत्रियाँ पैसे के लिए स्वेच्छा से अपने कपडे उतारने को तैयार हैं तब क्यों उनको बदनामी का डर नहीं लगता? यानी कि जो व्यभिचार आप अपनी इच्छा से करते हैं उससे आपको पैसा और प्रसिद्धि मिलती है, और जो व्यभिचार आपकी इच्छा के विरुद्ध होता है उसे आप छुपाते है कि इससे आपकी बदनामी होगी| ऐसी मानसिकता क्यों है? ऐसी ही सोच समाज की भी है| स्वैच्छिक व्यभिचार को तो समाज ने स्वीकार कर लिया है पर इच्छा के विरुद्ध व्यभिचार को समाज बदनामी से जोड़ता और छुपाता है| इस सोच और मानसिकता को बदलने की जरूरत है| आपको भी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये..

Vandana Baranwal के द्वारा
January 3, 2013

सार्थक आलेख और सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बननेपर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

    January 3, 2013

    वन्दना जी आपका हार्दिक धन्यवाद| सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के स्थान पर जगह मिलने से मेरे विचार निश्चित ही कुछ ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगे…

Sushma Gupta के द्वारा
January 3, 2013

राजेन्द्र जी, आपका आलेख आज के समाज की सोच को बदलने हेतु बहुत महत्वपूर्ण है,अब समाज को अपनी मानसिकता को बदलना ही होगा तभी इन दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर रोक लग सकेगी ,साथ ही एक बात मै यह भी कहूगी कि इन वलात्कारिओं के चेहरे भी छिपाने की वजाय सबके सामने दिखाने चाहिये …

    January 3, 2013

    शुषमा जी आपके विचारों का मैं समर्थन करता हूँ और यही बात मैंने लेख में भी लिखी है| शायद इस विचार मंथन का सन्देश कुछ सकारात्मक लेकर आये| प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद|

yogi sarswat के द्वारा
January 3, 2013

लात्कार या छेड़-छाड के मामलों में हमारे समाज की यही गलत अवधारणा ही इस दिनोंदिन बढ़ती समस्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है| इस गलत मानसिकता की वजह से ही बलात्कार या छेड़-छाड के अधिकाँश मामले सार्वजनिक नहीं हो पाते और दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है| यह तथ्य दीगर है कि बलात्कार और छेड़-छाड की कई घटनाएं घरों में, रिश्तेदारों, पड़ोसियों या करीबी परिचितों द्वारा होती हैं पर इसी पीड़ित की बदनामी वाली मानसिकता की वजह से इस तरह के अधिकांशतः मामले सामने नहीं आ पाते| कई मामलों में तो अपराधी पीड़ित का फोटो या वीडियो बनाकर उसे निरंतर ब्लैकमेल करता रहता है| इसका परिणाम यही होता है कि बलात्कारी या छेड़छाड़ करने वाला और निर्भय होकर लगातार पीड़ित का शोषण करता रहता है| यानी कि जिस जुर्म की सजा पहली बार में ही अपराधी को मिल जानी चाहिए, वही जुर्म बार-बार होता रहता है| सही और सार्थक सवाल उठती पोस्ट !

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    January 3, 2013

    समर्थन के लिए धन्यवाद योगी जी, साथ ही आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…

अरुण कान्त शुक्ला के द्वारा
January 1, 2013

राजेन्द्र जी एक सारगर्भित और विचारोत्तेजक लेख के लिए धन्यवाद और बधाई .. नव वर्ष की शुभकामनाएं..

    राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
    January 2, 2013

    धन्यवाद शुक्ल जी, आपको भी नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…

jlsingh के द्वारा
January 1, 2013

आदरणीय राजेंद्र जी, सादर अभिवादन! मैंने आपका पिछला आलेख भी पढ़ा था … प्रतिक्रिया नहीं दी …अभी तक शायद किसी ने नहीं दी! मैंने भी चुप रहना ही बेहतर समझा… आपके विचार क्रांतिकारी हैं … आपके सवाल भी वाजिब हैं, पर बदलाव में थोड़ा समय तो लगता है. बदलाव आ रहे हैं … अब महिलाएं मुखर हुई है ..पुलिस थाने से लेकर मीडिया में भी बयान देने लगी है … आज ही आपने देखा/सुना होगा– एक महिला जो प्रदर्शन करने गयी थी, पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले गयी और उसके साथ दुर्व्यवहार किया …वह मीडिया के सामने आयी… मुंह खोली …पुलिस की तरफ से खंडन भी किया गया …पर अब जांच बैठा दी गयी … मेरा मतलब है कि परिवर्तन हो रहा है ..धीरे धीरे! पहचान छिपाने का कारण स्पष्ट है … बदनामी! पर यह गुमनामी जो करामत दिखा गयी है वह हम सबके सामने है! मैंने अपनी राय रक्खी है …आशा आप इसे अन्यथा न लेंगे!

    January 1, 2013

    आदरणीय सिंह साहब, सादर अभिवादन|  आप लेख पढकर इसका विश्लेषण करते हैं, इसके लिए आप प्रशंसा के पात्र हैं| मैं भी आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ कि बदलाव में समय लगता है और बदलाव आ भी रहे हैं … महिलाएं मुखर होने लगीं हैं…और होना भी चाहिएऑ मैं तो सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और बलात्कार के लिए अपराधी की बदनामी और सजा होनी चाहिए, पीड़ित उसके लिए शर्मिंदगी क्यों उठाए? जहां तक लोगों द्वारा प्रतिक्रियाओं का सवाल है, इस मंच पर प्रतिक्रियाओं, ज्यादा पठित, अधिमूल्यित, चर्चित आदि का खेल इस मंच पर बहुत पहले से देखता आया हूँ और किसी समय खुद भी उसका हिस्सा रहा हूँ| इस बीच में बहुत से अच्छे लेखक इस मंच से दूर भी हो गए| मैं स्वयं भी कभी-कभार ही लिखता हूँ जब कि कोई ऐसा विषय सामने आता है| प्रतिक्रियाओं की मैं अपेक्षा नहीं करता क्योंकि मैं खुद भी प्रतिक्रियाएं करने से बचता हूँ| उसका कारण यही है कि इसी मंच पर मैंने लोगों को प्रतिक्रियाओं में उलझते, लड़ते-झगडते और अभद्र भाषा का प्रयोग करते भी देखा है| कई बार तो स्थिति बहुत ही शर्मनाक होते भी देखी है| लेकिन कभी आप जैसे साथी विचारात्मक प्रतिक्रया देते हैं तो उसका जवाब अवश्य देता हूँ| ये मेरे विचार हैं, जरूरी नहीं कि सभी उससे सहमत हों, हो सकता है कि आप के विचार और सुझाव बेहतर हों|  आपने अपने स्पष्ट विचारों से अवगत कराया, इसके लिए मैं आपकी प्रशंसा करता हूँ| धन्यवाद….

    January 1, 2013

    आपको नव वर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएँ !

Santlal Karun के द्वारा
December 31, 2012

“आज ही समाचारों में पढ़ा कि आरोपी राम सिंह और मुकेश के घर वालों का उसके गाँव ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया है और वे भी अपने लड़कों की करतूत पर शर्मिंदा हैं| इस तरह तरह का नजरिया और मानसिकता सरकार और समाज बलात्कार के प्रत्येक मामले में क्यों नहीं अपनाता? सरकार इस मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में मान रही है, वाकई यह केस ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ है| लेकिन उन मामलों का क्या जहां छह माह या साल भर की बच्ची से बलात्कार और हत्या होती है? जहां विक्टिम इस लायक ही नहीं होता कि उसे यह महसूस भी हो सके कि उसके साथ क्या हुआ और किसने किया| क्या ऐसे मामले ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं है, बल्कि ये तो उससे भी कहीं जघन्य और वीभत्स श्रेणी के अपराध है|” व्यवस्था पर विचारणीय आलेख; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ !


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