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२३ मार्च- शहीद दिवस

Posted On: 23 Mar, 2013 Others में

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शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते भारत की आजादी  के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था. इन शहीदों की पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष शहीद दिवस मनाया जाता है.

तो आइये इन शहीदों का स्मरण कर लें.

शहीद भगत सिंह

bhagat_singh

भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है

सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं.

भगत सिंह मूलतः मार्क्ससमाजवाद के सिद्धांतो से प्रभावित थे. इस कारण से उन्हें अंग्रेजों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी. ऐसी नीतियों के पारित होने के खिलाफ़ विरोध प्रकट करने लिए क्रांतिकारियों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची.

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा ना हो तथा अंग्रेजो तक उनकी आवाज़ पहुंचे. निर्धारित योजना के अनुसार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंक दिया. वे चाहते तो भाग सकते थे पर भगत सिंह की सोच थी की गिरफ्तार होकर वे अपना सन्देश बेहतर ढंग से दुनिया के सामने रख पाएंगे.

करीब २ साल जेल प्रवास के दौरान भगत सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े रहे और लेखन व अध्ययन भी जारी रखा. इसी दौरान उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ. फांसी पर जाने से पहले तक भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हडताल की.

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई. फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे -

दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी .

फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में भगत सिह ने लिखा था -

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें.

इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है. शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए. चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर उन्होने कसम खाई कि उनका जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा.

खैर, भगत सिंह के बारे में तो सभी जानते हैं पर भगत सिंह का नाम राजगुरु और सुखदेव के बिना अधूरा है. हालांकि राजगुरु और सुखदेव का नाम हमेशा भगत सिंह के बाद ही आया है पर आजादी के इन दीवानों का योगदान भगत सिंह से किसी भी मायने में कमतर नहीं था. तो आइये राजगुरु और सुखदेव के बारे में भी कुछ जान लें.

शहीद राजगुरु

Shivaram_rajguru

शहीद राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरुथा. राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पुणे ज़िले के खेड़ा गाँव में हुआ था, जिसका नाम अब राजगुरु नगरहो गया है. उनके पिता का नाम श्री हरि नारायण और माता का नाम पार्वती बाईथा. बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी आ गए थे. यहाँ वे संस्कृत सीखने आए थे. इन्होंने धर्मग्रंथों तथा वेदो का अध्ययन किया तथा सिद्धांत कौमुदी इन्हें कंठस्थ हो गई थी. इन्हें कसरत का शौक था और ये शिवाजी तथा उनकी छापामार शैली के प्रशंसक थे. वाराणसी में इनका सम्पर्क क्रंतिकारियों से हुआ. ये हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए और पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथके छद्म नाम से जाना जाने लगा. चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और जतिन दास इनके मित्र थे. वे एक अच्छे निशानेबाज भी थे.

राजगुरु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे. 1919 में जलियांवाला बाग़ में जनरल डायर के नेतृत्व में किये गये भीषण नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी और निर्भीक बना दिया तथा उन्होंने उसी समय भारत को विदेशियों के हाथों आज़ाद कराने की प्रतिज्ञा ली और प्रण किया कि चाहे इस कार्य में उनकी जान ही क्यों न चली जाये वह पीछे नहीं हटेंगे.

जीवन के प्रारम्भिक दिनों से ही राजगुरु का रुझान क्रांतिकारी गतिविधियों की तरफ होने लगा था. अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक प्रदर्शन में पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी. लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में अंग्रेज़ सहायक पुलिस अधीक्षक जे. पी. सांडर्सको गोली मार दी थी और ख़ुद ही गिरफ़्तार हो गए थे.

शहीद सुखदेव

sukhdev2

15 मई, 1907 को पंजाब के लायलपुर, जो अब पाकिस्तान का फैसलाबाद है, में जन्मे सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आज़ादी का सपना पाले हुए थे। भगतसिंह और सुखदेव के परिवार लायलपुर में पास-पास ही रहा करते थे. ये दोनों लाहौर नेशनल कॉलेजके छात्र थे. दोनों एक ही सन में लायलपुर में पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हो गए. इन्होने भगत सिंह, कॉमरेड रामचन्द्र एवम् भगवती चरण बोहरा के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया था. सांडर्स हत्या कांड में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था. १९२९ में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में व्यापक हड़ताल में भाग लिया था.

भगत सिंह और सुखदेव दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी. चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में पब्लिक सेफ्टीऔर ट्रेड डिस्प्यूट बिलके विरोध में सेंट्रल असेंबलीमें बम फेंकने के लिए जब हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) की पहली बैठक हुई तो उसमें सुखदेव शामिल नहीं थे. बैठक में भगतसिंह ने कहा कि बम वह फेंकेंगे, लेकिन आज़ाद ने उन्हें इज़ाज़त नहीं दी और कहा कि संगठन को उनकी बहुत ज़रूरत है. दूसरी बैठक में जब सुखदेव शामिल हुए तो उन्होंने भगत सिंह को ताना दिया कि शायद तुम्हारे भीतर जिंदगी जीने की ललक जाग उठी है, इसीलिए बम फेंकने नहीं जाना चाहते. इस पर भगतसिंह ने आज़ाद से कहा कि बम वह ही फेंकेंगे और अपनी गिरफ्तारी भी देंगे.

अगले दिन जब सुखदेव बैठक में आए तो उनकी आंखें सूजी हुई थीं. वह भगत को ताना मारने की वजह से सारी रात सो नहीं पाए थे. उन्हें अहसास हो गया था कि गिरफ्तारी के बाद भगतसिंह की फांसी निश्चित है. इस पर भगतसिंह ने सुखदेव को सांत्वना दी और कहा कि देश को कुर्बानी की ज़रूरत है. सुखदेव ने अपने द्वारा कही गई बातों के लिए माफी मांगी और भगतसिंह इस पर मुस्करा दिए थे.

जब-जब हम शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे शहीदों को याद करते हैं तो बरबस ये पंक्तियाँ याद आ ही जाती हैं-

कभी वो दिन भी आयेगा,
कि जब आजाद हम होंगे,
ये अपनी ही जमीं होगी,
ये अपना आसमां होगा,
शहीदों कि चिताओं पर,
लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का,
यही नामों-निशां होगा.

पुण्यतिथि के अवसर पर देश के इन वीर सपूतों को शत शत नमन !

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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
March 23, 2013

काश कि शहीदों का भी उसी प्रकार पुनर्जन्म हो पाता, जैसा इस ब्लाग का हुआ है । ‘शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा’ । उम्मीद है कि अगले बरस भी हम आज ही के दिन आज के इसी ब्लाग पर अपने सपूतों को ठीक इसी प्रकार श्रद्धांजलि दे रहे होंगे । धन्यवाद ! (आपने सही समय पर निकाल कर बिल्कुल सही चीज़ सबको दिखाई है । अब आशा रहेगी कि आप महानुभाव का शुभागमन ‘जागरण-चलचित्र-गृह’ में आज ही लगी फ़िल्म ‘शोले’ का शो देखने हेतु भी अवश्य होगा, और आप वहाँ उपस्थित मूर्ख समुदाय (जिसमें आप भी हैं) को अपने दो शब्दों से भी नवाज़ेंगे । बस इतना ध्यान रहे कि बसन्ती मेरी है, और मेरी ही रहेगी । इसमें कोई कम्प्रोमाइज नहीं होने का, क्या !)

    March 23, 2013

    आपने सही कहा गुरुदेव, पिछले २-३ सालों से इस लेख को रिपीट कर रहा हूँ| इस माध्यम से ही मैं इन अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने की कोशिश कर रहा हूँ| सीमित ही सही पर कुछ लोगों का इस ओर ध्यान तो चला जाता है| आगे भी मेरी कोशिश जारी रहेगी|

jlsingh के द्वारा
March 25, 2012

शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का, यही नामों-निशां होगा. वन्दे मातरम! अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं!…. महँ सपोतों को शत शत नमन!

    jlsingh के द्वारा
    March 25, 2012

    महँ सपोतों को शत शत नमन!= महान सपूतों को शत शत नमन !

rahulpriyadarshi के द्वारा
March 24, 2012

भारत माँ के साहसी बेटों की यह अमर कथा हर काल में पढ़ी एवं सुनाई जाएगी,जीवन के चार दिन भले ही मिले,पर उसमे भी वतन के लिए ऐसा कर गए जो उन्हें अमर कर गया,और गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने हेतु बड़ा ही प्रेरक सिद्ध हुआ.

dineshaastik के द्वारा
March 24, 2012

मान्यवर वो बुद्धिजीवी नहीं हैं अपितु, सत्ता के लोलुप भेड़िये, स्वतंत्र भारत के कलंक, एवं खद्दर धारी कुत्ते हैं।

    dineshaastik के द्वारा
    March 24, 2012

    निवेदन है कि इस टिप्पणी को नीचे दी गई आदरणीय दीपक पाण्डे जी द्वारा दी गई टिप्पणी के साथ जोड़ा जाये। गलती से यह टिप्पणी  रिप्लाई की जगह न जुड़ कर नवीनतम प्रतिक्रिया में जुड़ गई।   आदरणीय राजेन्द्र जी आपके आलेख ने आँखें नम कर दी, अमर शहीदों की जीवनी से अंशों से अवगत कराने के लिये आभार……

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 23, 2012

वन्देमातरम……. स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों पर लिखा सार्थक एवं ज्ञानवर्धक लेख. बधाई…….

March 23, 2012

वो तो सिर्फ वो ही हो सकते थे. उन तीनों की, और उन हज़ारों की शहादत को सलाम, जो वतन के नाम मिट गए. जय हिंद… नव सम्वत्सर, एवं पावन नवरात्र की शुभकामनाएं, सादर.

ashok kumar dubey के द्वारा
March 23, 2012

देश के लिए शहीद हुए तीनो महापुरुषों को मेरा शत शत नमन . काश इस क़ुरबानी को आज के नेता ,मंत्री और विधायक याद कर पाते ! अगर उन्हें इसका जरा भी अंदाजा होता की देश को आजाद करने के लिए ये भारत माँ के सपूतों ने अंग्रेजों द्वारा कितना जुल्म सहा और अंत में हसते हँसते फांसी पर चढ़ गए आज अपना देश इन्हीं वीर सपूतों की क़ुरबानी का फल आजादी के रूप में भोग रहा है और भोग में इतना मशगुल है की देश की सुरक्छा एवं प्रभुसत्ता को बचाने के लिए ख़रीदे जानेवाले हथियारों की दलाली खाता है वर्षों तक सुरक्छा में काम आनेवाले अहम् हथियार केवल इसलिए ख़रीदे नहीं जाते क्यूंकि नेताओं एवं मंत्रियों को उसका कमीशन नहीं मिला सुदूर आकाश में बैठे ये वीर सपूत अपनी क़ुरबानी पर अफ़सोस करते होंगे कीजसी अपने देश को आजाद करने के लिए वे शहीद हुए उस देश के हीं विद्वान् अफसर एवं नेता अपने ही देश को इस तरह बर्बाद करेंगे . जरुर इस गंभीर मसले पर चर्च होनी चाहिए .एक अछे देशप्रेम से जुड़े यादगार दिन को ताजा करते हुए आपने एक सुन्दर लेख लिखा है बधाई

Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
March 26, 2011

आज के इस युग में जब हम शहीदों को भूलते जा रहे हैं .आपका लेख सार्थक है .बहुत बहुत धन्यवाद .

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 25, 2011

बीत गई है होली , अब ना मैं कोई भी मजाक करूँगा करूँगा सबके साथ , पर ना तुम्हारे साथ करूँगा सजती रहेंगी यह महफिले सदा यूँ ही हमारे जाने के बाद भी आयेंगे यादो में , हसायेंगे यूँ ही हम जाने के बाद भी ************************************************************* जुबली कुमार जी ….नमस्कार ! होली के रंग पर देशभक्ति का रंग मुबारक हो

    March 26, 2011

    वन्देमातरम राजकमल जी. वही शेर जो हमेशा कहता आया हूँ और कभी पहले भी आपको लिखा था, फिर से कहना चाहूंगा- इन्सां वो नहीं जो हवा के साथ बदले, इन्सां वो है जो हवा का रूख बदल दे.

    jlsingh के द्वारा
    March 25, 2012

    एक बच्चा, ‘कमल’ की पंखुरी सा, निकला है बाहर अँधेरा चीरता हुआ यह कोई ‘राज’ की बात है या वह ‘शर्मा’ रह है! आदरणीय गुरुदेव को चरण वन्दन! बदली से निकला है चाँद!………सादर!

आर.एन. शाही के द्वारा
March 25, 2011

सखेद राजेंद्र जी, कुछ थकानवश विगत चन्द दिनों में जो रचनाएं मुझसे छूटी हैं, दुर्भाग्यवश आपका दुर्लभ व गम्भीर यह आलेख भी उन्हीं में से एक है । शहीदों की याद में अर्पित की गई इस माला के फ़ूल तारीफ़ के मोहताज़ नहीं हैं । बधाई ।

    March 25, 2011

    आदरणीय शाही जी वन्देमातरम, पिछले दिनों आपने लोगों की टांग-खिंचाई करने में जो ऊर्जा खर्च की है, उससे थकान हो जाना तो लाजिमी ही था. कुछ दिन मुसम्मी के जूस का सेवन करें और नई ऊर्जा प्राप्त करें. अभी बहुतों का बेडा पार लगाना है आपने. आपके इस सुकृत्य की वजह से लोग मंच से छलांग लगा-लगाकर भाग रहे हैं. शुक्र है गुरूजी कि अगली होली तक सम्मलेन स्थगित कर दिया आपने, वर्ना आधा मंच तो इस होली कांटेस्ट की समाप्ति तक ही खाली हो जाता. पर हम भी अंगद हैं गुरूजी……..ये सितम यहीं रहकर उठाएंगे. प्रणाम.

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 25, 2011

श्री राजेन्द्र जी, इतने गंभीर लेख पर देर से आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ… ******************************************** कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा… ******************************************** सभी अमर वीर सपूतों को शत-शत नमन……… आकाश तिवारी

    March 25, 2011

    आकाश जी वन्देमातरम, आजकल आपकी इस मंच पर उपस्थिति कम देखने को मिल रही है या मैं ही देख नहीं पा रहा हूँ. शहीदों को हम सबकी और से श्रद्धांजलि.

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 25, 2011

विद्वान् राजेन्द्र जी राष्ट्र के लिए आत्म बलिदान करने वाले इन महान सपूतो पर यह स्मरण निश्चय ही प्रशंसनीय है स्वतंत्रता की यह महक माता के इन्ही लालो को देन है | इनके इस बलिदान की इस विरासत को बनाये रखना ही इनके प्रति सच्ची श्रधांजलि होगी |

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 24, 2011

भ्राता राजेन्द्र जी, बहुत ही शोध परक जानकारी दी आपने. वैसे आपने पढ़ा ही होगा की आज के बुद्धिजीवियों ने उन्हें किस ख़िताब से नवाजा है.

    March 24, 2011

    दीपक जी वन्दे मातरम्. मैंने आपका लेख पढ़ लिया था, वाकई ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.

shiromanisampoorna के द्वारा
March 23, 2011

राजेंद्रजी,आपने गौरवशाली इतिहास को जानने की आज की पीढ़ी को सखत आवश्कता है क्योकि हम भारतीय उस माँ भारती की कोख में जन्में है जहाँ ऐसे वीर सपूतों ने अपनी जवानी और जिन्दगी हंसते-हंसते माँ भारती के चरणों में अर्पित की बहुत- बहुत साधुवाद -शिरोमणि सम्पूर्णा,वात्सल्य

Alka Gupta के द्वारा
March 23, 2011

राजेन्द्र जी , शहीदों की पुन्य स्मृति पर स्मरण कराने के लिए बहुत धन्यवाद देश के इन वीर सपूतों को श्रद्धानत शत-शत नमन !

rajeev dubey के द्वारा
March 23, 2011

लेख पर साधुवाद राजेंद्र जी.

Deepak Sahu के द्वारा
March 23, 2011

भ्राता राजेंद्र जी! भारत माता के इन वीर सपूतों को मेरा भी नमन है!

vinitashukla के द्वारा
March 23, 2011

शहीदों की पावन स्मृति में लिखा गया सुन्दर और ज्ञानवर्धक लेख. धन्यवाद.

allrounder के द्वारा
March 23, 2011

राजेंद्र जी, नमस्कार शहीद दिवस पर ऐसे महान योद्धाओं का स्मरण कराने के लिए हार्दिक आभार ! शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वरस मेले वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ! किसी शायर की लिखी गई इन पंक्तियों से बेहतर श्रधांजलि शब्दों मैं व्यक्त करना मुमकिन नहीं है !

razia mirza के द्वारा
March 23, 2011

उन शहीदों को सलाम जिन्हों ने अपने देश की खातिर/ आजादी के लिए अपने प्राण की वेदी दे दी| सार्थक पोस्ट| राजेन्द्रजी | सही है .. शहीदों कि चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का, यही नामों-निशां होगा.

Harish Bhatt के द्वारा
March 23, 2011

rajendra ji सादर pranaam, लेख के लिए हार्दिक बधाई.

div81 के द्वारा
March 23, 2011

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालों का यही निशान होगा। राजेंदर जी, आप का बहुत बहुत धन्यवाद

    div81 के द्वारा
    March 23, 2011

    इन वीर सपूतों को कोटिश नमन जिनकी वजह से हम खुली फिजा में सांस ले पा रहे है

    March 23, 2011

    वाकई दिव्या जी, इन वीर सपूतों के बलिदान की जिनकी वजह से ही हम खुली फिजा में सांस ले पा रहे है. मेरा भी इनको कोटिश नमन है.

Nikhil के द्वारा
March 23, 2011

aaj ke samyanukul aur aaj ki jarurat hai aapka yah lekh. yuvaon ke aadarsh hain raajguru, bhagat singh aur sukhdev. hamare aadarshon ka aadarsh parichay dene ke liye aabhar.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 23, 2011

भईया, आज इस पुनीत अवसर पर देश के वीर सपूतों को समर्पित आपका यह लेख कोटिशः प्रशंसनीय है। आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं और जो स्वच्छंद जीवन जी रहे हैं वह इन्हीं महानुभावों, शस्य-श्यामला भारत माँ के शूर सुपुत्रों की देन है। यदि आज वर्ष के इस एकमात्र अवसर पर भी हम इन्हें नहीं याद कर सके  तो ये हमारी कृतघ्नता होगी। यदि हम कुछ करने में अपने आप को अक्षम पाते हैं तो हमें प्रेरणा लेनी चाहिए इनकी महान गाथा सेजिन्होंने सीमित संसाधनों और अत्याचारी व दमनकारी शासन के विरुद्ध ऐसा बगावती बिगुल फूंका कि सम्पूर्ण देश में एकता की अलख एक लहर की तरह फ़ैल गयी और अंततः दुष्ट विभाजनकारियों को हमारे हाथों में सौंप कर यहाँ से अपना बोरिया बिस्तर समेत कर भागने पर मजबूर कर दिया। इन महान राष्ट्रभक्तों को पुनः नमन करते हुए आपको भी सर झुका कर वंदन इनका स्मरण करने हेतु। साभार,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 23, 2011

    “सीमित संसाधनों के बावजूद अत्याचारी व दमनकारी शासन के विरुद्ध ऐसा बगावती बिगुल फूंका कि सम्पूर्ण देश में एकता की अलख एक लहर की तरह फैल गयी और अंततः दुष्ट विभाजनकारियों को हमारे वतन को हमारे हाथों में सौंप कर यहाँ से अपना बोरिया बिस्तर समेट कर भागने पर मजबूर कर दिया। इन महान राष्ट्रभक्तों को पुनः नमन करते हुए आपको भी सर झुका कर वंदन इनका स्मरण करवाने हेतु।” ******************************* कृपया सुधार कर पढ़ें.

    March 23, 2011

    सही कहते हो वाहिद भाई, अगर भारत माता के इन वीर सपूतों ने अपने जीवन की कुर्बानी न दी होती तो शायद हमें कई साल और गुलामी सहनी पड़ती. हमारा फर्ज बनता है की हम इन्हें न तो कभी भूलें और न ही भूलने दें, .धन्यवाद.


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