अंगार

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फेसबुकिया कीड़ा

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वैसे तो उसने गुरु को कभी

दिल से नहीं पसंद किया

पर फेसबुक पे देखो उसका

वही गुरु भगवान हैं  

 

घर पर पिता से अपने

उसकी कभी बनी नहीं

पर फेसबुक पे देखो उसका  

वही पिता कितना महान है

 

घर पे उसकी माँ बेचारी

लाचार दर्द से तड़प रही है

और वो बेचारा माँ के लिए

फेसबुक पे कितना परेशान है

 

माता-पिता-गुरूजी के नाम पर  

लाइक्स और कमेन्ट को तरसने वाला

वो फेसबुकिया कीड़ा देखो

सुबह से शाम तक हैरान-परेशान है…

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

September 10, 2013

haqikat bayan karti prastuti .

yogi sarswat के द्वारा
September 9, 2013

हकीकत और वर्चुअल का सही आकलन किया है आपने !

    jlsingh के द्वारा
    September 9, 2013

    सहमत!

udayraj के द्वारा
September 6, 2013

सच में भारद्वाज जी, आपकी िकविता जो दिलों में आग लगा देने वाली है, आज हमारी सारी भावनाएं इंटरनेट पर उलझ कर रह गई है । वास्तविक जिंदगी से इसका लोप हो रहा है ।


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